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उत्तराखंड की वर्षों पुरानी परंपरा नंदा देवी लोकजात यात्रा

15/09/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
उत्तराखंड की नंदा देवी राजजात धार्मिक यात्रा ही नहीं बल्कि लोगों को प्रकृति का नजदीकी से साक्षत्कार करने का मौका भी मिलता है. देश-विदेश के लोग जिसकी पौराणिक और सांस्कृतिक विरासत को देखने के लिए हमेशा लालायित रहते हैं. यात्रा के हर पड़ाव का अपना ऐतिहासिक महत्व है. गढ़वाल की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा की हर वर्ष ऐतिहासिक लोकजात यात्रा कुरुड़ से कैलाश की ओर भादपद्र माह में रवाना होती है. हर वर्ष यह ऐतिहासिक यात्रा लोकजात के रूप में होती है. वहीं, 12 वर्षो में एक बार वृहद यात्रा एशिया की सबसे लंबी यात्रा राजजात यात्रा के रूप में आयोजित होती है. हर वर्ष होने वाली लोकजात यात्रा कुरुड़ से विभिन्न पड़ावों को पार करते हुए वेदनी कुंड में डोली स्नान और पूजा अर्चना के बाद मां नंदा की डोली विभिन्न पड़ावों को पार करते हुए अपने ननिहाल यानी देवराड़ा पहुंचती है और 6 मास तक विराजमान होती हैं. धार्मिक महत्व के बाद भी मां नंदा का ननिहाल अब तक यात्रा का पड़ाव नहीं बन सका है. देवराड़ा मंदिर समिति के अध्यक्ष का कहना है कि स्थानीय लोग लंबे समय से देवराड़ा सिद्धपीठ को यात्रा पड़ाव में शामिल करने की मांग रही है. जिसे लेकर 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री से भी बातचीत हुई थी. तत्कालीन सरकार से देवराडा को यात्रा पड़ाव में शामिल होने का आश्वासन मिला, लेकिन अभी तक योजना को अमलीजामा नहीं पहनाया गया. सरकार में स्थानीय ग्रामीणों को एक बार फिर से मदद की उम्मीद जगी है. ऐसे में पर्यटन मंत्री ने ग्रामीणों की मांग सुनते हुए देवराड़ा को नंदा देवी यात्रा के पड़ाव के रूप में शामिल किया जाना चाहिए. स्थानीय लोगों की मांग है कि 14 अगस्त से मां नंदा देवी की लोकजात यात्रा शुरू होने जा रही है. ऐसे में सूबे की सरकार और पर्यटन मंत्री से ग्रामीणों को आस जगी है. लोकजात यात्रा में वेदनी पूजा अर्चना के बाद देवी की डोली 6 मास देवराड़ा में ही विराजमान होती है. मां नंदा देवी के बधाण आगमन पर श्रद्धालुओं द्वारा हर्षोउल्लास के साथ स्वागत किया जाता है. नए अनाज का देवी को भोग लगाया जाता है. सिद्धपीठ देवराडा में विराजमान होने के बाद अगले 6 मास तक ननिहाली भक्त मंदिर में मां नंदा की पूजा-अर्चना करते हैं और 6 माह बाद नंदा देवी की डोली को मायके यानी कुरुड़ के लिए रवाना किया जाता है. 7वीं शताब्दी में गढ़वाल के राजा शालिपाल ने राजधानी चांदपुर गढ़ी से देवी श्रीनंदा को 12वें वर्ष में मायके से कैलाश भेजने की परंपरा शुरू की थी. राजा कनकपाल ने इस यात्रा को भव्य रूप दिया. इस परंपरा का निर्वहन 12 वर्ष या उससे अधिक समय के अंतराल में गढ़वाल राजा के प्रतिनिधि कांसुवा गांव के राज कुंवर, नौटी गांव के राजगुरु नौटियाल ब्राह्मण सहित 12 थोकी ब्राह्मण और चौदह सयानों के सहयोग से होता है. कथा के अनुसार, नंदा के मायके वाले नंदा को कैलाश विदा करने जाते थे और फिर वापस लौटते थे. भगवान शिव नंदा के पति हैं. यह राजजात यात्रा बारह साल में एक बार होती थी. इससे जाहिर होता है‍ कि नंदा अपने मायके हर बारह साल में आती थी. यह परम्परा पौराणिक काल से चली आ रही है और आज भी पहाड़ के लोग इस पर्व को धूमधाम से मनाते हैं. इससे पहले यह राज जात यात्रा वर्ष 2000 में हुई थीचौसिंगा खाडू (काले रंग का भेड़) श्रीनंदा राजजात की अगुवाई करता है. मनौती के बाद पैदा हुए चौसिंगा खाडू को ही यात्रा में शामिल किया जाता है. राजजात के शुभारंभ पर नौटी में विशेष पूजा-अर्चना के साथ इस खाडू के पीठ पर फंची (पोटली) बांधी जाती है, जिसमें मां नंदा की श्रृंगार सामग्री सहित देवी भक्तों की भेंट होती है. खाडू पूरी यात्रा की अगुवाई करता है.यात्रा का शुभारंभ स्थल है नौटी सिद्धपीठ नौटी में भगवती नंदादेवी की स्वर्ण प्रतिमा पर प्राण प्रतिष्ठा के साथ रिंगाल की पवित्र राज छतोली और चार सींग वाले भेड़ (खाडू) की विशेष पूजा की जाती है. कांसुवा के राजवंशी कुंवर यहां यात्रा के शुभारंभ और सफलता का संकल्प लेते हैं. मां भगवती को देवी भक्त आभूषण, वस्त्र, उपहार, मिष्ठान आदि देकर हिमालय के लिए विदा करते हैंराजजात समिति के अभिलेखों के अनुसार हिमालयी महाकुंभ श्रीनंदा देवी राजजात वर्ष 1843, 1863, 1886, 1905, 1925, 1951, 1968, 1987 तथा 2000 में आयोजित हो चुकी है. वर्ष 1951 में मौसम खराब होने के कारण राजजात पूरी नहीं हो पाई थी. जबकि वर्ष 1962 में मनौती के छह वर्ष बाद वर्ष 1968 में राजजात हुई. नौटी से शुरू होने वाली नंदादेवी राजजात में 20 पड़ाव हैं. इसमें बाण तक ग्रामीण अंचल है. नौटी से लेकर बाण तक भक्त गांवों की परंपरा से भी अवगत हो सकेंगे. असली यात्रा होती है बाण गांव के बाद. इस गांव के बाद यात्रा घने जंगलों के बीच से बढ़ती है. रोमांच से भरी यह यात्रा प्राकृतिक सौंदर्य से भी भक्तों को रूबरू करवाती है. नंदादेवी राजजात यात्रा के पड़ावों में वेदनी बुग्याल, वेदनी कुंड, राज्यपुष्प ब्रह्मकल और राज्य पक्षी मोनाल सहित अनेक जड़ी बूटियां देखने को मिलते हैं. उत्तराखंड की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक नंदा देवी राज जात यात्रा के स्वरूप को बचाने के लिए समय रहते कारगर कदम उठाए जाने की जरूरत है
लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत है.

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