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अपणु बाजार कब देंगे पहाड़ों में किसानों को राहत!

03/05/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखण्ड आदि काल से ही महत्वपूर्ण जड़ी.बूटियों व अन्य उपयोगी वनस्पतियों के भण्डार के रूप में विख्यात है। इस क्षेत्र में पाये जाने वाले पहाड़ों की श्रृंखलायें, जलवायु विविधता एवं सूक्ष्म वातावरणीय परिस्थितियों के कारण प्राचीन काल से ही अति महत्वपूर्ण वनौषधियों की सुसम्पन्न सवंधिनी के रूप में जानी जाती हैं। प्राचीन काल से ही वनस्पतियों का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार हेतु किया जाता है। कुदरत ने उत्तराखंड को कुछ ऐसे अनमोल तोहफे दिए हैं, जिनमें अद्भुत गुणों की भरमार है। पौष्टिक व्यंजन और लाजवाब जायका मौसम को खाने.पीने के लिहाज से सबसे बेहतरीन माना गया है। इस मौसम में जठराग्नि बहुत तेजी से काम करती है, जिसकी वजह से बहुत ज्यादा भूख लगती है। हम जो भी खाते हैं, पाचन क्षमता दुरुस्त रहने की वजह से वह आसानी से पच जाता है। लेकिन सर्दियों में ठंड बढऩे के साथ जहां सर्दी.जुकाम समेत अन्य बीमारियां दस्तक देने लगती हैं, वहीं सुस्ती और आलस की समस्या भी घेरे रहती है। उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अब उत्तराखंड में भी किसान बाजार विकसित होंगे। इसके लिए राज्य में पूर्व में तैयार किए गए अपणु बाजार अपना बाजार को किसान बाजार में तब्दील किया जाएगा। इसके लिए सरकार ने कसरत शुरू कर दी है।
गांवों के नजदीक विकसित होने वाले इन बाजारों में किसानों को अपने कृषि उत्पादों को बेचने के लिए मार्केट तो मिलेगा ही, उत्पाद को मंडी तक ले जाने के झंझट से भी मुक्ति मिलेगी। साथ ही उपभोक्ताओं को ताजे फल और सब्जियां उचित दाम पर उपलब्ध हो सकेंगे। किसानों को राहत देने के लिए उत्तराखंड में वर्ष 2012 में अपणु बाजार की शुरुआत की गई थी। देहरादून, पौड़ी, चमोली व नैनीताल जिलों में नौ स्थानों पर अपणु बाजार तैयार किए गए। इनमें भी मंडियों की तरह स्टाल बनाकर किसानों को उपलब्ध कराए गए गए। इस पहल के मिले.जुले परिणाम सामने आए। हालांकि इन चार जिलों के बाद मुहिम आगे नहीं बढ़ पाई।
अब जबकि किसानों से मंडियों में लिए जाने वाले मंडी शुल्क को खत्म कर दिया गया है तो किसान कहीं भी अपने उत्पादों को बेच सकता है। ऐसे में उसे गांव के नजदीक ही बाजार उपलब्ध हो जाए तो उसे फल.सब्जी जैसे उत्पादों की बिक्री को इधर.उधर जाने के झंझट से निजात मिलेगी। यानी मंडी अथवा बाजारों तक उत्पाद ले जाने के लिए परिवहन में आने वाला खर्च भी बचेगा।इसे देखते हुए सरकार ने अब अपणु बाजार को किसान बाजार के रूप में तब्दील करने का निश्चय किया है।
कृषि एवं उद्यान मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार पहले से तैयार अपणु बाजारों को किसान बाजार के तौर पर विकसित कर वहां किसानों को भंडारण समेत अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। किसान बाजार में किसानों को क्या-क्या सुविधाएं दी जा सकती हैं, इस संबंध में प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश अधिकारियों को दिए गए हैं। उप्र में किसान बाजारों में उपलब्ध कराई गई सुविधाओं का अध्ययन करने को भी कहा गया है। लॉकडाउन खुलने के बाद इस दिशा में कदम बढ़ाए जाएंगे। दून की बात करें तो यहां अभी तीन बाजारों के लिए जगह निश्चित हुई है। सात और अपने बाजार अभी यहां खोले जाने बाकी हैं। कृषि उत्पादन मंडी परिषद की है। परिषद के सचिव के अनुसार अभी तक बाजार की व्यवस्था न होने के चलते किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा था उसके पास इनकी मार्केटिंग के लिए भी कोई जगह नहीं थी, लिहाजा उसके उत्पाद औने.पौने में निकल रहे थे।
अपने बाजारों के बन जाने से उसके पास अपने उत्पादों को सही ग्राहक तक पहुंचाने के लिए एक स्थान होगा। यह बाजार किसानों को आगे बढ़ाने में मददगार साबित होंगे। इसके साथ ही ग्राहकों को भी एक छत के नीचे कई उत्पाद हासिल हो सकेंगे। आमतौर पर पहाड़ी शादियों में इसे बनाया जाता है। इसमें गुड़, चावल और सरसों के तेल का इस्तेमाल होता है। पहले चावल को कम से कम तीन.चार घंटे तक भिगोया जाता है और फिर उसे बारीक कूटकर गुड़ की चासनी के साथ पेस्ट बनाया जाता है। इस मिश्रण को छोटे.छोटे गोलों के रूप में तैयार कर तेल में तला जाता है। कहीं.कहीं अरसे तलने के बाद दोबारा गुड़ की चासनी में डाला जाता है। इसे पाक लगाना कहते हैं। इस बीच हैरानी की बात तो ये भी है कि आधुनिकता की इस दौड़ में हम लगातार इन उत्पाद अनमोल संपदाओं को भूलते जा रहे हैं। ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी। कुल मिलकर पर्वतीय राज्य की जिस अवधारणा के साथ उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई लड़ी गयी थी वह धरातल से कोसों दूर ही है। पलायन ने हिमालयी राज्य की अवधारणा को ध्वस्त कर दिया है।
20 साल पहले राज्य बना लेकिन परंपरागत पर्वतीय जनजीवन की खुशहाली के लिए कुछ भी ठोस दिशा नीति तय नहीं की गई। चूंकि उत्तराखंड उत्तर प्रदेश के पर्वतीय हिस्सों को अलग करके एक पर्वतीय राज्य बनाया गया लेकिन व्यावहारिक तौर पर पर्वतीय प्रदेश की जीवन पद्धति के हिसाब से विकास का आधारभूत ढांचा बनाने के बारे में सिर्फ जुबानी जमा खर्च होता रहाण्असल में अतीत से ही इस संवेदनशील पर्वतीय अंचल की समस्याएं बाकी उत्तर प्रदेश से एकदम जुदा थीं, लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि राज्य बनने के बाद यहां बदला कुछ भी ज्यादा नहीं। देहरादून में राजधानी उत्तर प्रदेश की राजधानी के एक्सटेंशन कांउटर की तरह काम कर रही है। निर्वाचन आयोग विधानसभा क्षेत्रों की परीसीमन प्रक्रिया को आबादी के घनत्व के हिसाब से ही पूरा करेगा तो पर्वतीय हिस्सों पर्वतीय की विधानसभा क्षेत्रों में लोकतंत्र का बुनियादी ढांचा सबसे गम्भीर समस्या है।

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