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पांडवों की बदरी-केदार भूमि से जुड़ी अमर गाथा

16/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हिमालय की पर्वत शृंखलाओं का धवल क्रम पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहा है। स्वच्छ स्निग्ध पर्वत शृंखलाओं के निचले पर्वतीय व वन क्षेत्र अपने शांत वातावरण के कारण ऋषि-मुनि व ज्ञानियों की जिज्ञासा बढ़ाते रहे हैं। इन वन क्षेत्रों को उन्होंने कठिन तपस्याएं कर अनेक मंत्र सिद्धियां व ज्ञान की प्राप्ति की। भौतिकवाद की तीव्र रफ्तार के बीच यहाँ पहुँच कर हर पर्यटक एक अभूतपूर्व आत्मिक सुख की अनुभूति करता है और वह स्वयं का समस्त सांसारिक उद्विग्‍नता से मुक्ति पाकर प्रकृति से गहराई के साथ जुड़ता जाता है। पौराणिक कथानुसार इस तपोभूमि में सर्वप्रथम महात्मा उपमन्यु ने शंकर की आराधना की थी। द्वापर में जब शास्त्रों में हिमालय विभाजन पाँच खंडो में किया गया तब नेपाल, कूर्मांचल, जालन्धर, कश्मीर, जो कि अमरनाथ के नाम से प्रसिद्ध है और पाँचवा खण्ड केदारखण्ड था। केदार खण्ड को शिव की ‘क्रीड़ा स्थली’ माना जाता है। ये तीर्थ स्थल देश की सांस्कृतिक एवं भावनात्मक एकता, श्रद्धा तथा सम्मान का महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। दक्षिण से आकर स्वामी शंकराचार्य ने उत्तर में बदरीनाथ की मूर्ति की स्थापना की और आज भी केरल राज्य के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण मुखय पुजारी रावल ही मंदिर की पूजा-शृंगार के अधिकारी हैं। इस भाँति ये पावन तीर्थ राष्ट्रीय एकता का भी प्रेरणा स्रोत हैं और साथ ही भारतीय संस्कृति एवं साहित्य का उद्गम स्थल भी हैं।महाभारत काल वर्ष पर्व में गंगा द्वार से श्री धमों की यात्रा का जो रोचक वर्णन है वह प्राचीन होने के साथ-साथ कौतूहलपूर्ण भी है। धर्म ग्रन्थों में चार धाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ की यात्रा का विशेष महत्व बताया गया है। सैकड़ों वर्षो से मनुष्य सुख, समृद्धि की कामना, रोग, शोक तथा दरिद्रता का नाश तथा पितरों के तारण और अपने मोक्ष की कामना के साथ चारधम की यात्रा करता रहा है। सदियों से इन पवित्र धमों के दर्शन और पूजा अर्चना के लिए लाखों श्रद्धालु अनेकों कष्ट उठा कर यहाँ आते रहे हैं। प्राचीन समय में मध्य हिमालय में स्थित उत्तराखण्ड से जुड़े इन तीर्थों की यात्रा किस तिथि से और किसने प्रारम्भ की तथा इसके मूल में क्या प्रयोजन था? इसका पता लगाना कठिन है। क्योंकि हिमालय के प्रति श्रद्धा और पूज्य भाव तो भारतीय पूर्वजों के अन्दर प्राचीन युग से ही प्रारम्भ हो गया था।प्राचीन काल में ऋषियों को हिमालय के विराट स्वरूप की अनुभूति होने लगी थी। आगे चलकर महाभारत काल में इसकी पुष्टि हो गयी। भगवान कृष्ण ने जब विराट स्वरूप से स्थिरता नाम के महान तत्व की चर्चा की तो कहा कि, हे अर्जुन! स्थिर वस्तुओं मे मैं हिमालय हूँ। हिमालय के अलौकिक सौन्दर्य ने मानव को आकर्षित कर लिया था। हिमालय की गोद में तप करने से उन्हें अपार शांति मिलने लगी। धीरे-धीरे यहाँ तपोवनों का विकास होने लगा। हिमालय की अलौकिक छटा से परिपूर्ण और सुषमायुक्त उसके पर्वत शिखरों की गोद में इन मंदिरों और तीर्थों के लिए जो उपयुक्त है वह और कहाँ हो सकता है? पुराणों में भी इसका कापफी वर्णन है।मानव शास्त्र का इतिहास यह प्रमाणित करता है कि मानव-जाति अपने आरम्भिक काल में उसी प्रकार जिया करती रही होगी, जिस प्रकार पशु जिया करते हैं। समय पाकर मानव का प्रकृति से उषा, सूर्य, चन्द्र, संध्या, नदी, निर्क्षर, पर्वतों एवं समतल भूमि पर हरियाली, छिटकते वनों से और इसी प्रकार विभिन्न प्राणियों से सम्पर्क स्थापित हुआ, जिससे मानव की ज्ञान चेतना जागृत हुई। ज्ञान चेतना की इसी जागृति ने मानव के हृदय में यह उमंग भर दी कि वह विश्व के साथ घुल-मिल जाये और प्रेम का विस्तार करे, उसकी जीवन-भूमि उल्लास, पवित्रता और सुन्दरता से परिपूर्ण हो उठे। मानव की यही उमंग आध्यात्मिकता का चोला पहन पवित्र धर्मों की यात्रा के रूप में उभरी।उत्‍तराखंडयूं तो पहाड़ में लोकनृत्यों का खजाना बिखरा पड़ा है, लेकिन इनमें सबसे खास है पांडव (पंडौं) नृत्य। पांडवों का गढ़वाल से गहरा संबंध माना जाता है। महाभारत युद्ध से पूर्व और युद्ध समाप्ति के बाद भी पांडवों ने गढ़वाल में लंबा अर्सा गुजारा।यहीं, लाखामंडल में पांडवों को माता कुंती समेत जिंदा जलाने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह बनवाया। महाभारत युद्ध के बाद कुल, गोत्र व ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को शिव की शरण में केदारभूमि जाने की सलाह दी थी। पांडवों ने केदारनाथ में महिष रूपी भगवान शिव के पृष्ठ भाग की पूजा-अर्चना कर वहां बाबा केदार को प्रतिष्ठित किया। इसी तरह मध्यमेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ व कल्पेश्वर में भी उन्होंने भगवान शिव की आराधना की। इसके बाद वह द्रौपदी समेत बदरीशपुरी होते हुए स्वर्गारोहिणी प्रस्थान कर गए। लेकिन, युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्ग पहुंच पाए, अन्य पांडवों व द्रौपदी ने भीम पुल, लक्ष्मी वन, सहस्त्रधारा, चक्रतीर्थ व संतोपंथ में शरीर का त्याग कर दिया।पांडवों के बदरी-केदार भूमि के प्रति इसी अलौकिक प्रेम ने उन्हें गढ़वाल का लोक देवता बना दिया। इसलिए यहां शीतकाल में पांडव नृत्य की धूम रहती है। पांडव नृत्य का सबसे विविधतापूर्ण आयोजन रुद्रप्रयाग जिले के तल्ला नागपुर क्षेत्र में होता है। हर साल नवंबर-दिसंबर के मध्य यह पूरा क्षेत्र पांडवमय हो जाता है। अन्य क्षेत्रों, खासकर देहरादून जिले के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर का भी पांडव नृत्य एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। गढ़वाल क्षेत्र में नवंबर-दिसंबर के दौरान खेतीबाड़ी का काम पूरा हो जाता है। इस अवधि में लोग पांडव नृत्य में बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाते हैं। पांडव नृत्य के पीछे लोग विभिन्न तर्क देते हैं। इनमें गांव की खुशहाली व अच्छी फसल की कामना प्रमुख हैं। पांडव नृत्य का पहाड़वासियों से गहरा पारिवारिक संबंध है। इस दौरान गांवों में प्रवासियों की चहल-पहल रहती है और बंद घरों के ताले खुल जाते हैं। यह ऐसा अनुष्ठान है, जब दूर रहने वाली धियाण (ब्याहता बेटी) भी अपने मायके लौट आती हैं। पांडव नृत्य के आयोजन से पूर्व इसकी रूपरेखा तय करने को लोग गांव के पांडव चौक (पंडौं चौरा) में एकत्रित होते हैं। यह वह स्थान है, जहां पांडव नृत्य का आयोजन होता है। ढोल-दमाऊ, जो उत्तराखंड के लोकवाद्य हैं, उनमें अलौकिक शक्तियां निहित होती हैं।जैसे ही ढोली (औजी या दास) ढोल पर विशेष ताल बजाते हैं, नृत्य में पांडवों की भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों पर पांडव अवतरित हो जाते हैं। इन्हें पांडवों का पश्वा कहा जाता है। पांडव पश्वों के अवतरित होने के पीछे भी एक रहस्य छिपा है, जिस पर शोध चल रहे हैं। महत्वपूर्ण यह कि पांडव पश्वा गांव वाले तय नहीं करते। वह ढोली के नौबत बजाने (विशेष ताल) पर स्वयं अवतरित होते हैं।युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी के अवतरित होने की विशेष ताल होती है। बताते हैं कि पांडव पश्वा उन्हीं पर अवतरित होते हैं, जिनके परिवारों में वह पहले भी अवतरित होते रहे हैं। इन आयोजनों में पांडव पश्वों के बाण निकालने का दिन, धार्मिक स्नान, मोरु डाळी, लाफुलारी, चक्रव्यूह, कमल व्यूह, गरुड़ व्यूह आदि सम्मिलित हैं। पांडव नृत्य में कुल 13 पश्वा होते हैं।इनमें कुंती, द्रौपदी, भगवान नारायण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, हनुमान, अग्निवाण, मालाफुलारी, भवरिक व कल्या लुहार शामिल हैं। डा. विलियम एस.सैक्स की पुस्तक ‘डांसिंग विद सेल्फ’ में पांडव नृत्य के हर पहलू को रोचक ढंग से उजाकर किया गया है। गढ़वाल की यमुना घाटी में अनेक स्थान पांडवों के साथ कौरवों से भी जुड़े हुए हैं। इन्हीं में प्रमुख है लाखामंडल। कहते हैं कि लाखामंडल में कौरवों ने षड्यंत्र के तहत लाक्षागृह का निर्माण किया था, ताकि माता कुंती समेत पांडवों को जिंदा जलाया जा सके।लाखामंडल में आज भी सैकड़ों गुफायें हैं, जिनमें लाक्षागृह से सुरक्षित निकलकर पांडवों ने लंबा समय गुजारा था। जौनसार के इस इलाके में हर वर्ष पांडव लीला एवं नृत्य का आयोजन होता है। पांडव नृत्य कोई सामान्य नृत्य न होकर नृत्य, गीत व नाटकों का सम्मिलित स्वरूप है। इसमें ढोल की अहम भूमिका है।ढोली व सहयोगी वार्ताकार पांडवों की जीवन शैली, खान-पान, हास्य, युद्ध, कृषि जैसे अनेक क्रियाकलापों को नृत्य, गीत व नाटिका के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। इस नृत्य में जहां हास्य-व्यंग्य शामिल है, वहीं युद्ध कौशल व पांडवों के कठिन जीवन, रोष-क्षोभ का भी समावेश होता है। इस नृत्य, गीत व नाटिका के सफल संचालन का जिम्मा गांव के ढोली का होता है। ढोली ही वह लोग हैं, जो महाभारत की कथाओं के एकमात्र ज्ञाता हैं। वह गीत व वार्ताओं से पांडव नृत्य में समा बांध देते हैं।बीच-बीच में गांव के अन्य बुजुर्ग, जिन्हें पांडवों की कहानियां ज्ञात होती हैं, लयबद्ध वार्ता व गायन के जरिये इसका हिस्सा बनते हैं। महत्वपूर्ण बात यह कि पांडव नृत्य के लिए गायन की कोई पूर्व निर्धारित स्क्रिप्ट नहीं होती।ढोली अपने ज्ञान के अनुसार कथा को लय में प्रस्तुत करता है और उसी हिसाब से सुरों में उतार-चढ़ाव लाया जाता है। पांडवों ने केदारनाथ से स्वर्गारोहणी जाते समय गढ़वाल के कई जगहों पर अपने अस्त्र-शस्त्रों को त्यागा था। पांडवों के इन्हीं शस्त्रों की पूजा अर्चना के बाद नृत्य की परंपरा आज भी जिंदा है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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