डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
देवभूमि उत्तराखण्ड सदैव ही अपनी संस्कृति, सभ्यता, परंपरा एंव प्राकृतिक एंव आध्यात्मिक सौंदर्य के लिए विश्व विख्यात रहा है| यहाँ के गाँवों में परम्परागत एंव क्रमबद्ध निर्मित घरों को बाखलियाँ कहा जाता है, देवभूमि के ये परंपरागत घर बाखलियां सदैव ही एकता की वाहक रही हैं ।जिसमें एक ही आंगन से अनेक घर व परिवार जुड़े रहते हैं | पूर्व में इन्में अधिकाशत संयुक्त परिवार निवास करते थे| आजकल भौतिकतावादी जीवन तथा रोजगार के लिए होने वाले लगातार पलायन के कारण गाँवों की भव्य व आकर्षक बाखलियाँ वीरान होते जा रहीं है ।आजकल लगातार बढ़ रही एकल परिवार की प्रथा एंव गाँवों की मूलभूत सुविधाओं से वंचित होने के कारणों ने भी परंपरागत बाखलियों को वीरान होने के लिए विवश कर दिया है ।आधुनिकता की चकाचौंध के कारण आज पहाड़ के गाँव ईट, रेत , बजरी के ढेर में परिवर्तित होते जा रहे हैं।जबकि प्राचीन काल में निर्मित परंपरागत बाखलियों की ढालूदार छतें जो पाथर (छोटे बड़े एंव चौड़े पत्थर) को आकर्षक ढंग से पिरोकर बनाई जाती थी , आंगन व खोई (आंगन की चाहरदीवारी) के साथ साथ काष्ठकला की अनूठी मिसाल से निर्मित दरवाजे व खिड़कियों से इन्हें भव्य रूप प्रदान किया जाता था ।ये बाखलियाँ एंव परंपरागत घर न केवल भव्य एंव आकर्षक हैं अपितु पहाड़ो की भौगोलिक परिस्थितियों हिमपात, गर्म एंव ठंडे मौसम के अनुकूल निर्मित भी हैं । पहाड़ के समाज की जीवन-संस्कृति और रहन-सहन दोनों अनूठा रहा है। यहां की लोक परंपराएं व रहन-सहन प्रकृति के करीब और सृष्टि से संतुलन बनाने वाली रही है। इसकी झलक पर्वतीय समाज की हाउसिंग कालोनियां कही जाने बाखली में देखी जा सकती है। दर्जनों परिवारों को एक साथ रहने के लिए पहाड़ में बनने वाले ये भवन सामूहिक रहन-सहन, एकजुटता और सहयोग की भावना को परिलक्षित करते हैं। इनकी बनावट ऐसी होती थी कि आपदा के समय में एक साथ होकर चुनौतियां का सामना कर सकें। बताया जाता है कि कत्यूर व चंद राजाओं ने भवनों के निर्माण की इस शैली को विकसित किया था। लेकिन अंधाधुंध विकास, गांवों की उपेक्षा और भौगोलिक परिस्थतियों ने बहुत कुछ बदल दिया। कंक्रीट के जंगल में तब्दील होते जा रहे पहाड़ के हरे भरे गांव पलायन की मार झेल रहे हैं। शिक्षा और रोजगार के लिए पलयन के कारण गांव के गांव खाली हो गए।उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल की सबसे बड़ी बाखली नैनीताल जिले के रामगढ़ ब्लॉक के कुमाटी गांव में है। पारंपरिक रूप से मिट्टी और पत्थरों से बने इन घरों को दूर से देखने पर रेलगाड़ी का प्रतिबिंब बनता है। खूबसूरत खिड़की-दरवाजे और नक्काशी वाले इन मकानों को देखने से पहाड़ के समाज और सामूहिकता को समझा जा सकता है। करीब तीन सौ फीट लंबी छत वाली इस बाखली को पारंपरिक सामुदायिक घर भी कहा जाता है। यहां अब 10-12 परिवार ही रहते हैं। क्वारब से करीब 12 किमी दूर कुमाटी में अधिकांश जोशी के साथ भट्ट परिवार भी रहते हैं। इस बाखली में 25 समान घर हैं। घर के सामने घाटी का खूबसूरत दृश्य दिखाई देता है। इस बाखली में इतिहास, विरासत, संस्कृति और वास्तुकला सब एक साथ परिलक्षित होता है। कभी यहां एक साथ 125 से अधिक लोग रहते थे। बाखली में बने सभी अपार्टमेंट एक समान होते थे। मतलब हर परिवार को मिलने वाला मकान की संरचना एक जैसी होती थी। निचले हिस्से मवेशियों के लिए जबकि आगे का हिस्सा चारे के भंडारण के लिए उपयोग में लाया जाता है। कुमाटी की बाखली में पूरी संरचना में तीन सौ फीट की लंबी छत है। सभी घरों को समान रूप से डिज़ाइन किया गया है। जिसमें एक परिवार के लिए रसोई और एक बेडरूम और तहखाने हैं। ‘बाखली’ को इस तरह से डिजाइन किया था ताकि पूरा समुदाय संकट के समय एक साथ हो सके। कुमाटी की बाखली शीतला – मुक्तेश्वर मार्ग पर कफुरा और पोरा गांव के पास स्थित है। लोगों का दावा है कि यह बाखली करीब डेढ़ सौ साल पुरानी है। यह मूल रूप से मिट्टी और पत्थर से बनाई गई है। उत्तराखंड में तिबारी/बाली निर्माण में अखरोट, असीन, अंगु, उत्तीस, कीमू, कुकरकाट, खरसू, गेंठी, चीड़, तुन, तिअलंज, देवदार, पन्या-पद्म, पांगर, मेलु, सांधण, सुरई, सिरस व पर्वतीय कन्नार/साल की लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है कुमाऊं में बाखली दुपरा शैली में निर्मित है। दुपरा शैली में ज्यादातर थोकदारों या गढ़पतियों के किले बनाए गए हैं। इनमें ज्यादात्तर आयताकार हुए। चीला या गेहूं की भूसी से दीवारों पर प्लास्टर, दो पटालों के जोड़ पर भी गारा डालकर तोक बिछाई जाती है। गोबर व लाल मिट्टी के फर्श की लिपाई की जाती है। इतिहासकार बताते हैं कि कुमाऊं की भवन निर्माण शेली बेहद समृद्ध रही है। इसका श्रेय कत्यूर व चंद राजाओं को जाता है। देवभूमि के पहाड़ के गांवों के परंपरागत घर तथा बाखलियाँ भूकंपरोधी भी थे जो वर्षो पूर्व से निर्मित होने के बावजूद आज भी अपनी मजबूती महत्ता को बतलाती हैं। इन परंपरागत घरों एंव बाखलियों की लकड़ी मिट्टी एंव पत्थर से निर्मित ढालूदार छत (जिसे पाख भी कहा जाता है ) एंव मिट्टी से निर्मित फर्श जिसे पाल कहा जाता है, विभिन्न परिस्थितियों एंव रोगों से मुक्त रखने में भी सहायक है| बाखलियों में अधिकाशतः अनेक संयुक्त परिवार एक परिसर , आंगन में निवास करते थे, इसलिए एक दूसरे के सुख दुःख में पूर्ण रूप से सहभागी बने रहते थे । जिससे देवभूमि की एकता व अखण्डता का स्पष्ट अंदाजा लगाया जा सकता है । इन्हीं परंपरागत घरों बाखलियों की एकता के कारण ही देवभूमि के गाँवों का स्वतंत्रता संग्राम में भी विशेष योगदान रहा । लेकिन आज बढ़ते भौतिकतावादी जीवन एंव पाश्चात्य संस्कृति के आगमन से पहाड़ो के सुदंर एंव आकर्षक गाँव ईट सिमेंट कंक्रीट के ढेर में परिवर्तित होते जा रहे हैं । एकल परिवार की प्रथा एंव पाश्चात्य संस्कृति से भी मानवीय मूल्यों का स्तर लगातार गिरते जा रहा है | आजकल शहरों एंव सड़को के पास वाले गांवों की बाखलियाँ जीर्ण शीर्ण हो चुकी हैं किन्तु शहरों से दूर बसे गाँवों में आज भी बाखलियाँ अपने अस्तितव में देखने को मिलती हैं किन्तु यहां भी पलायन का दर्द स्पष्ट रूप से झलकता है । आज भले ही संयुक्त परिवारों एंव मानवीय मूल्यों का पतन हो रहा हो, लेकिन भव्य आकर्षक एंव कला की अनूठी मिसाल को पारंपरिक बाखलियाँ बयां करती हैं ।आज विरान होती बाखलियां अपने महत्व कलाकृति निर्माण शैली का प्रदर्शन करते नजर आती हैं। आज विरान होती इन पारंपरिक बाखलियों कलाकृति को प्राचीन धरोहरों के रूप में संरक्षित किया जाना आवश्यक है, तभी भावी पीढी़ को देवभूमि के गाँवों की एकता, अखण्डता, संस्कृति व सभ्यता का परिचय मिल पायेगा साथ ही मानवीय मूल्यों एंव मानवता का स्तर भी बना रहेगा उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप सरकारी व स्थानीय सहयोग की बड़ी आवश्यकता है.
लेखक उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुके हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं ।











