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बांज यानी उत्तराखंड का हरा सोना

26/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में इस समय जंगलों में भीषण आग लगी हुई है. राज्य के कई जिलों में वन क्षेत्र जल रहे हैं. आम तौर पर उत्तराखंड में 1000 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले चीड़ के जंगलों में आग लगती है. लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा गंभीर हो गई है, क्योंकि आग अब बांझ के जंगलों तक पहुंच गई है. बांझ के जंगल लगभग 4000 से 8000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं और इस बार आग करीब 6000 फीट तक फैल चुकी है.उत्तराखंड के जंगल पर्यावरण के लिए बेहद संवेदनशील माने जाते हैं, क्योंकि यहां लगने वाली आग का असर हिमालय के ग्लेशियरों तक महसूस किया जा सकता है. बढ़ते तापमान, चाहे वह जमीन का हो या वायुमंडल का, आग को तेजी से ऊंचाई वाले इलाकों तक ले जा रहा है. लंबे समय तक बारिश और बर्फबारी नहीं होने से बांझ के जंगलों की प्राकृतिक नमी खत्म हो गई है, जिससे वे भी आग की चपेट में आ गए हैं.उत्तराखंड में इस समय जंगलों में भीषण आग लगी हुई है. राज्य के कई जिलों में वन क्षेत्र जल रहे हैं. आम तौर पर उत्तराखंड में 1000 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले चीड़ के जंगलों में आग लगती है. लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा गंभीर हो गई है, क्योंकि आग अब बांझ के जंगलों तक पहुंच गई है. बांझ के जंगल लगभग 4000 से 8000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं और इस बार आग करीब 6000 फीट तक फैल चुकी है.उत्तराखंड के जंगल पर्यावरण के लिए बेहद संवेदनशील माने जाते हैं, क्योंकि यहां लगने वाली आग का असर हिमालय के ग्लेशियरों तक महसूस किया जा सकता है. बढ़ते तापमान, चाहे वह जमीन का हो या वायुमंडल का, आग को तेजी से ऊंचाई वाले इलाकों तक ले जा रहा है. लंबे समय तक बारिश और बर्फबारी नहीं होने से बांझ के जंगलों की प्राकृतिक नमी खत्म हो गई है, जिससे वे भी आग की चपेट में आ गए हैं. बांझ के जंगल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. ये मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, जमीन में नमी बनाए रखते हैं और भूमिगत जल तथा प्राकृतिक जल स्रोतों को रिचार्ज करने में अहम भूमिका निभाते हैं. बारिश और बर्फ का पानी इन पेड़ों की जड़ों के माध्यम से संरक्षित रहता है, जिससे पहाड़ों के जल स्रोत जीवित रहते हैं. लेकिन इस समय बांझ के जंगल गंभीर खतरे में हैं. अगर आग पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो प्राकृतिक जल स्रोतों को बनाए रखने वाला यह महत्वपूर्ण वन तंत्र प्रभावित हो सकता है. बांझ के जंगल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. ये मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, जमीन में नमी बनाए रखते हैं और भूमिगत जल तथा प्राकृतिक जल स्रोतों को रिचार्ज करने में अहम भूमिका निभाते हैं. बारिश और बर्फ का पानी इन पेड़ों की जड़ों के माध्यम से संरक्षित रहता है, जिससे पहाड़ों के जल स्रोत जीवित रहते हैं. लेकिन इस समय बांझ के जंगल गंभीर खतरे में हैं. अगर आग पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो प्राकृतिक जल स्रोतों को बनाए रखने वाला यह महत्वपूर्ण वन तंत्र प्रभावित हो सकता है. उत्तराखंड वन विभाग के मुख्य वन संरक्षक और वनाग्नि-आपदा प्रबंधन के नोडल अधिकारी के अनुसार गढ़वाल मंडल में 278 और कुमाऊं मंडल में करीब 69 आग की घटनाएं हुई हैं, जबकि वन्यजीव संरक्षित क्षेत्रों में 34 घटनाएं दर्ज की गई हैं. उन्होंने बताया कि कम बारिश और बर्फबारी के कारण आग तेजी से ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक फैल रही है. उन्होंने यह भी कहा कि बांझ के जंगलों में आमतौर पर नमी रहती है, लेकिन इस बार सूखे के कारण आग वहां तक पहुंच गई है और इसकी वजहों का अध्ययन किया जाएगा. राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में हाल के दिनों में उच्च शिखरीय बांज बहुल वन क्षेत्रों में आग की घटनाएं हो चुकी हैं। चिंता यह साल रही है कि यदि बांज के जंगलों में आग ने विकराल रूप धारण किया तो जैवविविधता के लिए बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। पहाड़ का हरा सोना कहलाए जाने वाला बांज अब विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुका है। उत्तराखंड में बांज के जंगलों के ऊपर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। यह तो हम सबको पता ही होगा कि बांज के जंगल पहाड़ की पारिस्थितिकी के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं और इन जंगलों को चीड़ तेजी से निकल रहा है। ऐसे में यह खतरे का अलार्म है। बता दें कि हाल ही में सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च देहरादून, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंस और इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन ने उत्तराखंड के जंगलों में शोध किया और शोध में यह पाया गया कि उत्तराखंड में बांज के घने जंगलों में 22 फीसदी और कम घने जंगलों में 29% की गिरावट आई है और चीड़ के जंगल 74 फीसदी तक बढ़ गए हैं। बांज वर्षा के पानी को अवशोषित कर भूमिगत करता है और इसी की वजह से उत्तराखंड में नदियों का जलस्तर बढ़ता है। उत्तराखंड के लिए बेहद अहम माने जाने वाले बांज के पेड़ों की कमी की वजह से धरती की कोख भी बांझ होती जा रही है। उत्तराखंड के जंगलों में लगातार जल रही जंगल की आग को दो दिन की बारिश ने भले शांत कर दिया हो लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि अभी सिर्फ शुरुआत भर है बांज के जंगल का अपना पारिस्थितिक तंत्र होता है, जिसमें अनेक प्रकार की झाड़ियां, बांस और दूसरी शाकीय प्रजाति की सैकड़ों वनस्पतियां पनाह पाती हैं। पारिस्थितिक तंत्र के लिए आवश्यक दूसरी प्रजातियों के फलने- फूलने में बांज महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बांज ऑक्सीजन का खजाना है। लेकिन बाना नाम का एक परजीवी बांज की इस महत्वपूर्ण प्रजाति की जान का दुश्मन बन गया है। बाना, बांज के पेड़ों की भोजन नलिका में अपनी जड़ें डालकर बांज के सभी पोषक तत्वों को खुद हजम कर जाता है।समय के साथ इस परजीवी का विस्तार होते रहता है और आश्रयदाता बांज के पेड़ अल्पायु में सूखने लगते हैं। इस परजीवी में छोटे-छोटे मीठे बीज लगते हैं। इन बीजों को चिड़िया, लंगूर और बंदर खाते हैं। इन्हीं के द्वारा बाना का निरंतर विस्तार होता रहता है। बाना का प्रकोप घने जंगलों के मुकाबले मानवीय हस्तक्षेप वाले क्षेत्रों में अधिक है। आबादी वाले इलाकों में जहाँ बांज की शाखाएं काटी जाती हैं, उन्हीं क्षेत्रों में बाना अधिक पनपता है। बांज के पेड़ की जिस शाख में बाना लग जाए,उसे काटकर जला देना ही इसका एकमात्र उपाय है। ताकि पेड़ के दूसरे हिस्सों को इसके कहर से बचाया जा सके।बांज के पेड़ों में बाना के रूप में मंडरा रहा यह खतरा प्राकृतिक कम, मावन जनित अधिक है। उत्तराखंड के जंगलों में दूसरी उपयोगी प्रजातियों के मुकाबले बांज के जंगल अधिक हैं। बहुउपयोगी होने के कारण पहाड़ में सबसे ज्यादा दोहन बांज का ही होता है। अति दोहन के चलते बांज के जंगलों का पारिस्थितिक तंत्र बदल रहा है। जानकारों का मानना है कि बाना उन क्षेत्रों में अधिक फैल रहा है, जहाँ बांज के साथ स्वाभाविक रूप से उगने वाली सैकड़ों प्रजाति की वनस्पतियों में से अधिकांश लुप्त हो गई हैं। इन प्रजातियों के लुप्त होने से बांज की स्वाभाविक प्रतिरोधक क्षमता घट गई है।नैनीताल इस बात का उदाहरण है। नैनीताल नगर में दूसरी प्रजातियों के बनिस्बत बांज के वृक्ष अधिक हैं। यहाँ मौजूद बांज के अधिकांश वृक्ष बाना के जानलेवा जाल की गिरफ्त में नजर आते हैं। कुछ वर्ष पूर्व वन विभाग ने नैनीताल नगर में बाना से प्रभावित बांज के पेड़ों की शाखाओं को काटकर जलाने का अभियान भी चलाया। पर सब बेकार।बाना ने दूसरे तंदुरुस्त पेड़ों को अपनी गिरफ्त में ले लिया।इधर कुछ दशकों से पहाड़ के जंगलों के ऊपर मानव दबाव बढ़ा है। इससे पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं भी पैदा होने लगी हैं। जनसंख्या वृद्धि एवं अनियंत्रित और अनियोजित विकास ने यहाँ के लचीले एवं भंगुर पर्यावरण के जटिल तंत्र को क्षति पहुँचाई है।परिणामस्वरूप यहाँ भू- स्खलन, भूमि विनाश, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और पीने के पानी का संकट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। उत्तराखंड में शक्ति और सत्ता के बदलते समीकरणों ने पारिस्थितिक और पर्यावरणीय मुद्दों को हासिए में धकेल दिया है। सरकारें यहाँ के जंगलों के प्रति संवेदनशील और सचेत नहीं दिखतीं। ऐसी स्थिति में बाना के फैलते जाल से बांज को बचा पाना एक बड़ी चुनौती है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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