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बशीर बद्र : उर्दू अदब का चमकता सितारा बुझ गया

29/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
15 फरवरी 1935 को अयोध्या के तत्कालीन फैजाबाद में जन्मे बशीर बद्र ने अपनी शुरुआती पढ़ाई के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की। बाद में वह मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष भी रहे। मगर किस्मत उन्हें भोपाल ले आई। यही शहर उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बना और यहीं उन्होंने अपनी जिंदगी की आखिरी सुबह देखी। बशीर बद्र उन शायरों में थे जिन्होंने उर्दू शायरी को मुश्किल अल्फाजों की कैद से निकालकर आम लोगों की जुबान बना दिया। उनकी गजलें सिर्फ अदबी महफिलों तक सीमित नहीं रहीं। कॉलेज की दोस्तियों, मोहब्बत की शुरुआत, टूटे रिश्तों और अकेली शामों तक उनकी शायरी पहुंची। शायद यही वजह रही कि उनका हर शेर लोगों को अपना सा लगता था।उनकी शायरी में मोहब्बत थी। तन्हाई थी। दर्द था। मगर साथ ही जिंदगी की सच्चाइयों का एहसास भी था। उन्होंने समाज के बदलते मिजाज और रिश्तों की नजाकत को बेहद आसान भाषा में पेश किया। उनके कई शेर आज भी लोगों की बातचीत का हिस्सा बने हुए हैं।
उनका एक मशहूर शेर है
,
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”

यह शेर सिर्फ रिश्तों की बात नहीं करता। यह इंसानी तहजीब और मोहब्बत की एक बड़ी सीख देता है। बशीर बद्र की यही खासियत थी। वह कम शब्दों में गहरी बात कह जाते थे।उनकी शायरी में आम आदमी की जिंदगी दिखाई देती थी। वह सिर्फ इश्क के शायर नहीं थे। उन्होंने समाज की तकलीफों को भी महसूस किया। उनका यह शेर आज भी दंगों और हिंसा की खबरों के बीच अक्सर याद किया जाताहै,“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।” यह शेर सिर्फ रिश्तों की बात नहीं करता। यह इंसानी तहजीब और मोहब्बत की एक बड़ी सीख देता है। बशीर बद्र की यही खासियत थी। वह कम शब्दों में गहरी बात कह जाते थे।उनकी शायरी में आम आदमी की जिंदगी दिखाई देती थी। वह सिर्फ इश्क के शायर नहीं थे। उन्होंने समाज की तकलीफों को भी महसूस किया। उनका यह शेर आज भी दंगों और हिंसा की खबरों के बीच अक्सर याद किया जाता है बशीर बद्र की कलम में वो जादुई ताकत थी जो दो मुल्कों के बीच की कड़वाहट और फासलों को कम करने का माद्दा रखती थी। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दर्द और दोनों देशों के रिश्तों पर उन्होंने जो कुछ भी लिखा, वो आज इतिहास के पन्नों में दर्ज है। उनकी इस राजनीतिक और कूटनीतिक प्रासंगिकता का सबसे बड़ा उदाहरण साल 1972 के ऐतिहासिक शिमला समझौते के दौरान देखने को मिला था। तब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो का स्वागत करते हुए कूटनीति के गलियारों में बशीर बद्र का ही एक मशहूर शेर सुनाया था, जिसने दोनों देशों के बीच संवाद की एक नई राह खोली थी। भले ही बद्र साहब आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी गज़लें और शेर हमेशा जिंदा रहेंगे।,लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”बशीर बद्र ने अपने अल्फाजों से समाज को आईना दिखाया। उन्होंने नफरत के खिलाफ मोहब्बत की बात की। रिश्तों को बचाने की बात की। शायद इसी वजह से उनकी गजलें हर दौर में प्रासंगिक रहीं।साल 1999 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बाद में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान भी दिया। यह सम्मान सिर्फ एक शायर को नहीं मिला था, बल्कि उस आवाज को मिला था जिसने उर्दू को घर घर पहुंचाया।भोपाल के फतेहगढ़ इलाके में स्थित उनका घर “बशीर मंजिल” सालों तक अदबी महफिलों का केंद्र रहा। देश विदेश से लोग उनसे मिलने आते थे। शायर, लेखक, पत्रकार और साहित्य प्रेमी घंटों बैठकर उनकी बातें सुनते थे। मगर वक्त के साथ सब बदलने लगा। डिमेंशिया ने धीरे धीरे उनकी याददाश्त को कमजोर कर दिया।“उर्दू का एक दौर ख़ामोश हो गयकुछ लोग बिछड़कर भी हमेशा ज़िंदा रहते हैं…” आखिरी दिनों में हालात ऐसे हो गए थे कि वह कई बार अपने ही लिखे शेर भूलने लगे थे। लफ्जों का जादूगर अल्फाज तलाशता नजर आता था। लेकिन उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र और बेटे तैय्यब हर पल उनके साथ खड़े रहे। परिवार ने उनकी देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी। चाहने वाले उनसे मिलने आते रहे। कई बार लोग उन्हें उनके मशहूर शेर सुनाते और कभी कभी वह मुस्कुरा देते थे।मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने उनके इंतकाल पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र के जाने से जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे भर पाना नामुमकिन है। दशकों तक मुशायरों में उनका साथ रहा और उन्होंने अपनी शायरी व व्यवहार से दुनिया भर के लोगों को प्रभावित किया।उधर शायर अंजुम बाराबांकी ने कहा कि नई गजल का सबसे बड़ा नाम आज दुनिया से रुखसत हो गया। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र ने गजल को नया अंदाज दिया और पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई।बशीर बद्र की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके शेर सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहे। सोशल मीडिया पोस्ट से लेकर भाषणों तक, राजनीतिक मंचों से लेकर मोहब्बत भरे खतों तक, हर जगह उनके अल्फाज सुनाई देते रहे।

उनका एक और मशहूर शेर आज फिर लोगों की आंखें नम कर रहा है,

“अगर तलाश करूं कोई मिल ही जाएगा,
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा।”

यह शेर सिर्फ मोहब्बत नहीं, बल्कि उस खालीपन का एहसास भी दिलाता है जो उनके जाने के बाद अदबी दुनिया महसूस कर रही है।बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं हैं। मगर उनकी शायरी, उनके अल्फाज और मोहब्बत का पैगाम हमेशा जिंदा रहेगा।

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
यूं ही कोई बेवफा नहीं होता
तुम्हें जरूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आंखें हमारी कहां से लाएगा
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
अगर तलाश करूं कोई मिल ही जाएगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूं उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफिर ने समुंदर नहीं देखा

 

 

 

उर्दू शायरी की दुनिया में उनका नाम हमेशा सम्मान से लिया जाएगा। उनकी गजलें आने वाली पीढ़ियों को भी इंसानियत, तहजीब और मोहब्बत का रास्ता दिखाती रहेंगी। बशीर बद्र को मॉडर्न गजल का ‘मास्टर’ माना जाता है. उन्होंने पारंपरिक उर्दू के मुश्किल शब्दों की जगह आसान, मखमली और आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया, जिससे उनकी शायरी लोगों के दिलों तक पहुंची. उनके दोहे, जैसे ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए’ और ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो’ हर पीढ़ी की जबान पर रहते हैं.साहित्य और संस्कृति में उनके बेमिसाल और ऐतिहासिक योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया. उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया. बशीर बद्र भले ही इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन वे अपनी हमेशा याद रहने वाली गजलों और दोहों के जरिए हमेशा जिंदा रहेंगेसच तो यह है कि बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे। वह एहसास का नाम थे। एक तहजीब का नाम थे। और अब जब उनकी जिंदगी की शाम हो गई है, तो उनकी यादों के उजाले बहुत लंबे समय तक हमारे साथ रहेंगे।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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