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उत्तराखण्ड की संस्कृति का प्रतीक है रसीला फल बेडू

19/09/19
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखण्ड का प्रसिद्ध लोकगीत बेडु पाको बारामासा सुनते ही मन में इस मीठे रसीले फल का स्वाद याद आ जाता है, बारामासा का मतलब ही यह है कि यह बेडु बारह मास पाया जाता है, जबकि अन्य मौसमी फल होते हैं। उत्तराखण्ड में फाईकस जीनस के अर्न्तगत एक और बहुमूल्य जंगली फल जिसे बेडु के नाम से जाना जाता है, यह निम्न ऊँचाई से मध्यम ऊँचाई तक पाया जाता है। बेडु उत्तराखण्ड का एक स्वादिष्ट बहुमूल्य जंगली फल है जो Moraceae परिवार का पौधा है तथा अंग्रेजी में wild fig के नाम से भी जाना जाता है। उत्तराखण्ड तथा अन्य कई राज्यों में बेडु को फल, सब्जी तथा औषधि के रुप में भी प्रयोग किया जाता है, साथ ही बेडु का स्वाद इसमें उपलब्ध 45 प्रतिशत जूस से भी जाना जाता है। बेडु का प्रदेश में कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं किया जाता है, अपितु यह स्वतः ही उग जाता है तथा बच्चों एवं चारावाहों द्वारा बड़े चाव से खाया जाता है। यह उत्तराखण्ड में बेडु, फेरू, खेमरी, आन्ध्र प्रदेश में मनमेजदी, गुजरात मे पिपरी, हिमाचल प्रदेश में फंगरा, खासरा, फागो आदि नामो से जाना जाता है।
बेडु उत्तरी. पश्चिमी हिमालय के निम्न ऊँचाई से मध्यम ऊँचाई वाले क्षेत्रों मे पाये जाने वाला एक बहुमूल्य पौधा है। यह उत्तराखण्ड के अलावा पंजाब, कश्मीर, हिमाचल, नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, सोमानिया, इथीयोपिया तथा सुडान में भी पाया जाता है। विश्व में बेडु की लगभग 800 प्रजातियां पाई जाती है। वैसे तो बेडु का सम्पूर्ण पौधा ही उपयोग में लाया जाता है जिसमें छाल, जड़, पत्तियां, फल तथा चोप औषधियों के गुणों से भरपूर होता है, जिसकी वजह से कई बीमारियों के निवारण में यह सहायक होता है। मूत्राशय रोग विकार में भी बेडु कारगर पाया जाता है। बेडु के फल सर्वाधिक मात्रा में organic matte होने के साथ.साथ इसमें बेहतर antioxidant गुण भी पाये जाते हैं। जिसकी वजह से बेडु को कई बिमारियों जैसे तंत्रिका तंत्र विकार तथा hepatic बिमारियों के निवारण में भी प्रयुक्त किया जाता है।
जहां तक बेडु के वैज्ञानिक विश्लेषण की बात की जाय तो यह पोष्टिक एवं औषधीय दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण पौधा है। पारम्परिक रूप से बेडु को उदर रोग, हाइपोग्लेसीमिया, टयूमर, अल्सर, मधुमेह तथा फंगस सक्रंमण के निवारण के लिये प्रयोग किया जाता रहा है। आयुर्वेद में बेडु के फल का गुदा (Pulp) कब्ज, फेफड़ो के विकार तथा मूत्राशय रोग विकार के निवारण में प्रयुक्त किया जाता है। प्रसिद्ध उत्तराखंडी लोकगीत बेडु पाको बारामासा सुनते ही जीभ में बेडु वाइल्ड फिग के मीठे रसीले फलों का स्वाद घुल जाता है। बारामासा यानी बारह महीनों पाया जाने वाला।
जहां तक बेडु के फल की पौष्टिक गुणवत्ता का सवाल है तो इसमें प्रोटीन 4.06 प्रतिशत, फाइबर 17.65 प्रतिशत, वसा 4.71 प्रतिशत, कॉर्बोहाइड्रेट 20.78 प्रतिशत, सोडियम 0.75 मिग्रा प्रति सौ ग्राम, कैल्शियम 105.4 मिग्रा प्रति सौ ग्राम, पोटेशियम 1.58 मिग्रा प्रति सौ ग्राम, फॉस्फोरस 1.88 मिग्रा प्रति सौ ग्राम और सर्वाधिक ऑर्गेनिक मैटर 95.90 प्रतिशत तक पाए जाते हैं। बेडु के पके हुए फल में 45.2 प्रतिशत जूस, 80.5 प्रतिशत नमी, 12.1 प्रतिशत घुलनशील तत्व व लगभग छह प्रतिशत शुगर पाया जाता है। बेडु का प्रदेश में कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं किया जाता है, अपितु यह स्वतः ही उग जाता है तथा बच्चों एवं चारावाहों द्वारा बड़े चाव से खाया जाता है। यह उत्तराखण्ड में बेडु, फेरू, खेमरी, आन्ध्र प्रदेश में मनमेजदी, गुजरात मे पिपरी, हिमाचल प्रदेश में फंगरा, खासरा, फागो आदि नामो से जाना जाता है। बेडु उत्तरी.पश्चिमी हिमालय के निम्न ऊँचाई से मध्यम ऊँचाई वाले क्षेत्रों मे पाये जाने वाला एक बहुमूल्य पौधा है। यह उत्तराखण्ड के अलावा पंजाब, कश्मीर, हिमाचल, नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, सोमानिया, इथीयोपिया तथा सुडान में भी पाया जाता है। विश्व में बेडु की लगभग 800 प्रजातियां पाई जाती है। वैसे तो बेडु का सम्पूर्ण पौधा ही उपयोग में लाया जाता है जिसमें छाल, जड़, पत्तियां, फल तथा चोप औषधियों के गुणो से भरपूर होता है, जिसकी वजह से कई बीमारियों के निवारण में यह सहायक होता है। मूत्राशय रोग विकार में भी बेडु कारगर पाया जाता है। बेडु के फल सर्वाधिक मात्रा में organic matter होने के साथ.साथ इसमें बेहतर antioxidant गुण भी पाये जाते हैं जिसकी वजह से बेडु को कई बिमारियों जैसे दृ तंत्रिका तंत्र विकार तथा hepatic बिमारियों के निवारण में भी प्रयुक्त किया जाता है। उत्तराखण्ड तथा अन्य कई राज्यों में बेडु को फलए सब्जी तथा औषधि के रुप में भी प्रयोग किया जाता हैए साथ ही बेडु का स्वाद इसमें उपलब्ध 45 प्रतिशत जूस से भी जाना जाता है। बेडु का प्रदेश में कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं किया जाता हैए अपितु यह स्वतः ही उग जाता है तथा बच्चों एवं चारावाहों द्वारा बड़े चाव से खाया जाता है। यह मार्किट में सेब और अनार के दामो के दुगनी कीमत पर उपलब्द होता है। जहां तक बेडु के वैज्ञानिक विश्लेषण की बात की जाय तो यह पोष्टिक एवं औषधीय दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण पौधा है। पारम्परिक रूप से बेडु को उदर रोगए हाइपोग्लेसीमियाए टयूमरए अल्सरए मधुमेह तथा फंगस सक्रंमण के निवारण के लिये प्रयोग किया जाता रहा है। आयुर्वेद में बेडु के फल का गुदा कब्ज, फेफड़ो के विकार तथा मूत्राशय रोग विकार के निवारण में प्रयुक्त किया जाता है। यूरोपियन जनरल ऑफ बायोमेडीकल एव फार्मास्यूटीकल साइन्सेज 2016 के अनुसार बेडु के फल में alkaloids, steroids, flavonoids, tannins, beta-sitosterol के मौजूद होने के कारण antioxidant, anti coagulantतथा फेफडो एवं मूत्राशय रोग विकार के निवारण मे प्रयुक्त होता है तथा बेडु की छाल तथा पत्तियों में beta-sitosterol, triterpenes glaunol, galic acid, rutin alpha, beta-amyrin के मौजूद होने की वजह से nephro-protective, anti-diabetic, anti-microbial तथा बंतकपव cardio protective गुण पाये जाते है। एक परिपक्व बेडु के पेड़ से एक मौसम में लगभग 25 किग्रा तक फल प्राप्त कर सकते है तथा बेडु की पत्तियां पशुचारे के साथ.साथ कृषि वानिकी अर्न्तगत बेहतर पेड़ माना जाता है। राज्य के परिप्रेक्ष्य में इसका व्यवसायिक उत्पादन किया जा सकता है जो विभिन्न खाद्य एवं फार्मास्यूटिकल उद्योग में उपयोग को देखते हुये स्वरोजगार के साथ.साथ बेहतर आर्थिकी का साधन बन सकता है।

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