डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से अब तक सत्ता में रहे प्रमुख दल पर गैरसैंण के मुद्दे को सिर्फ चुनावी ढाल बनाने एवं पहाड़ की अनदेखी करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं. स्थानीय जनता का मानना है कि जो गैरसैंण कभी राज्य की अस्मिता और खुशहाली का प्रतीक था, वो आज केवल एक ‘पिकनिक स्पॉट’ और सियासी पर्यटन का जरिया बनकर रह गया हैउत्तराखंड राज्य का इतिहास संघर्षों और ऐतिहासिक घोषणाओं से जुड़ा है. 15 अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने लाल किले की प्राचीर से उत्तरांचल राज्य के गठन की ऐतिहासिक घोषणा की थी. इसके बाद 15 अगस्त 1997 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने भी इसी संकल्प को दोहराया. 3 अगस्त 1998 को केंद्र की बीजेपी नेतृत्व में बनी सरकार के मंत्रिमंडल ने राज्य गठन को मंजूरी दी. जिसके बाद 7 दिसंबर 1999 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्य विधेयक को अपनी हरी झंडी दी. संसदीय इतिहास में 1 अगस्त 2000 को लोकसभा और 10 अगस्त 2000 को राज्यसभा में यह विधेयक पारित हुआ.तत्कालीन राष्ट्रपति की ओर से 28 अगस्त को अधिसूचना जारी होने के बाद आखिरकार 9 नवंबर 2000 को देश के मानचित्र पर उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) का जन्म हुआ. सुरजीत सिंह बरनाला ने राज्य के प्रथम राज्यपाल के रूप में शपथ ली और नित्यानंद स्वामी सूबे के पहले मुख्यमंत्री बने. वहीं, दशकों पुरानी पृथक राज्य की मांग पूरी होने पर आम उत्तराखंडी बेहद खुश था. लोगों को उम्मीद थी कि अब पहाड़ के नीति-नियंता अपने होंगे. भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी से मुक्ति मिलेगी. गांव-गांव तक खुशहाली आएगी और पलायन थमेगा, लेकिन 26 साल बाद आज जनहित के मुद्दे हाशिए पर हैं.यूकेडी जैसे क्षेत्रीय दलों ने भी सत्ता में हिस्सेदारी तो पाई, लेकिन गैरसैंण को उसका हक दिलाने में वो भी नाकाम रहे. राज्य गठन के बाद प्रदेश में तेजी से शहरीकरण हुआ. जिससे शहर तो विकसित होते गए, लेकिन विकास की दौड़ में पहाड़ी क्षेत्र कहीं पीछे छूट गया. गैरसैंण को राजधानी बनाने के नाम पर सरकारों ने जनता के पैसों को पानी की तरह बहाया, लेकिन इच्छाशक्ति की कमी के कारण सिर्फ ‘आयोगों का खेल’ खेला गया.जहां एक तरफ कौशिक समिति ने गैरसैंण को राज्य के केंद्र में होने के कारण राजधानी के लिए सबसे उपयुक्त स्थान बताया था, तो वहीं इसके ठीक विपरीत दीक्षित आयोग ने भौगोलिक और तकनीकी कारणों का हवाला देकर इसे खारिज कर दिया था. इस राजनीतिक अनिर्णय के बीच भराड़ीसैंण में बुनियादी ढांचे के नाम पर अब तक लगभग 300 करोड़ रुपS की भारी-भरकम राशि खर्च की जा चुकी है. इस निर्माण कार्य की नींव साल 2014 में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा उपाध्यक्ष और पूर्व कांग्रेसी नेता सतपाल महाराज ने रखी थी.जून 2014 में करीब 30 एकड़ भूक्षेत्र में 106 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से निर्माण कार्य शुरू हुआ था. गैरसैंण के भराड़ीसैंण में स्थायी विधानसभा भवन बनने के बाद पहला सत्र सरकार में 17 नवंबर 2016 को आहूत हुआ था. वहीं, 4 मार्च 2020 को तत्कालीन मुख्यमंत्री ने भराड़ीसैण से विधानसभा बजट सत्र के दौरान गैरसैंण को सूबे की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया था. इसके बाद 8 जून 2020 को राज्यपाल की मंजूरी के बाद नोटिफिकेशन जारी किया गया था.दूसरी ओर 4 मार्च 2021 को विधानसभा बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्रीने गैरसैंण को उत्तराखंड की तीसरी कमिश्नरी बनाए जाने की घोषणा की, लेकिन नेतृत्व परिवर्तन के बाद 9 अप्रैल 2021 को तत्कालीन मुख्यमंत्री कैबिनेट ने कमिश्नरी के इस निर्णय को स्थगित कर दिया.वर्तमान में भराड़ीसैंण विधानसभा परिसर 130 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है. इसमें से 8 एकड़ में मुख्य भव्य विधानसभा भवन निर्मित है. इसके अलावा परिसर में शानदार विधायक आवास, मुख्यमंत्री निवास, मंत्रियों के बंगले, ऑफिसर हॉस्टल और कर्मचारी आवास बनकर तैयार हो चुके हैं.इसी परिसर में 65 एकड़ भूमि सचिवालय निर्माण के लिए भी प्रस्तावित की गई है, लेकिन विडंबना देखिए कि मिनी सचिवालय के लिए शुरुआती काम के लिए साल 2015 में ही 3 करोड़ रुपए की पहली किस्त भी जारी कर दी गई थी, लेकिन निर्माण कार्य आज तक शुरू ही नहीं हो सका है. उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही पहाड़ के मुद्दे एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आने लगे हैं। राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग, पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, सड़क संपर्क, भू-कानून और मूल निवास, महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे पर्वतीय क्षेत्रों में लोगों की प्रमुख चिंताएं बने हुए हैं। माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में इन्हीं मुद्दों पर राजनीतिक दलों की परीक्षा होगी।
पर्वतीय क्षेत्रों में लंबे समय से गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग उठती रही है। राज्य आंदोलनकारियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों का मानना है कि पर्वतीय राज्य की राजधानी पहाड़ में होने से विकास का संतुलन बनेगा और पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं को प्राथमिकता मिलेगी। हालांकि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा मिल चुका है, लेकिन स्थाई राजधानी का मुद्दा मौजूदा दौर में भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसके साथ ही पलायन पहाड़ का सबसे बड़ा संकट बना हुआ है। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में हजारों युवा गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं। कई गांवों में आबादी लगातार घट रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचा प्रभावित हो रहा है।स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चुनावी बहस का प्रमुख विषय बन सकती है। पर्वतीय जिलों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव लोगों की परेशानी बढ़ा रहा है। सड़क संपर्क, भूस्खलन और बरसात के दौरान मार्गों के बार-बार बाधित होने की समस्या भी जनता के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है।युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और स्वरोजगार के सीमित अवसर भी चुनावी मुद्दों में शामिल रहेंगे। पर्यटन, कृषि, बागवानी और स्थानीय उत्पादों पर आधारित रोजगार सृजन की मांग लगातार उठ रही है। इसके अलावा शिक्षा, पेयजल, आपदा प्रबंधन और पुनर्वास के मुद्दे भी राजनीतिक दलों के एजेंडे में प्रमुखता से शामिल हो सकते हैं।भू-कानून, मूल निवास और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे विषय भी पहाड़ में संवेदनशील मुद्दे माने जाते हैं। वहीं चारधाम यात्रा से जुड़े क्षेत्रों में स्थानीय व्यापारियों और युवाओं को मिलने वाले लाभ तथा यात्रा प्रबंधन पर भी चुनावी चर्चा होने की संभावना है।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बदरीनाथ, केदारनाथ, कर्णप्रयाग, थराली, गंगोत्री, यमुनोत्री, श्रीनगर, पौड़ी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और चम्पावत जैसी सीटों पर इन मुद्दों का सीधा प्रभाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि पहाड़ की पहचान, विकास और भविष्य से जुड़े सवालों का भी चुनाव माना जा रहा है। 27 अक्टूबर से विधानसभा सत्र शुरू होने जा रहा है. जहां एक बार फिर से नेताओं और अधिकारियों का जमावड़ा लगने वाला है, जिसे लेकर वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी का कहना है कि, आज तक जितने भी सत्र गैरसैंण में हुए हैं, राज्य आंदोलनकारियों समेत क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की ओर से बड़ी आशा के साथ अपने क्षेत्र की आवश्यक समस्याओं से मुख्यमंत्री समेत सभी विभागीय मंत्रियों से व्यक्तिगत संपर्क कर मांग पत्र दिए गए. गैरसैंण की जनता का मानना है कि गैरसैंण को जिला बनाए जाने से यहां प्रशासनिक सुदृढ़ता आएगी. बुनियादी सुविधाओं का विकास होगा और पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं का वास्तविक समाधान हो सकेगा. अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट इस सत्र में गैरसैंणवासियों की इस जायज मांग पर क्या रूख अपनाती है या फिर यह सत्र भी हर बार की तरह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी व घोषणाओं तक ही सीमित रह जाएगा? गैरसैंण को राजधानी बनाने के नाम पर सरकारों ने जनता के पैसों को पानी की तरह बहाया, लेकिन इच्छाशक्ति की कमी के कारण सिर्फ ‘आयोगों का खेल’ खेला गया. लेकिन इस सरकारी हलचल के बीच पहाड़ का एक बुनियादी और सबसे बड़ा सवाल फिर से गूंजने लगा है. आखिर जन आंदोलनों और 42 शहादतों की बुनियाद पर बने उत्तराखंड को 26 साल बाद भी अपनी स्थायी राजधानी क्यों नहीं मिल सकी? गैरसैंण की जनता का मानना है कि गैरसैंण को जिला बनाए जाने से यहां प्रशासनिक सुदृढ़ता आएगी. बुनियादी सुविधाओं का विकास होगा और पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं का वास्तविक समाधान हो सकेगा. अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट इस सत्र में गैरसैंणवासियों की इस जायज मांग पर क्या रूख अपनाती है या फिर यह सत्र भी हर बार की तरह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी व घोषणाओं तक ही सीमित रह जाएगा? लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














