डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हर्षिल घाटी का रसीला सेब देश-प्रदेश की मंडियों व बाजारों में छाने को तैयार है। घाटी में सेब की तुड़ाई अंतिम चरण में पहुंच गई है, वहीं ग्रेडिंग, छंटाई और पैकेजिंग का काम भी तेजी से चल रहा है। हर्षिल घाटी के आठ गांवों में करीब छह हजार मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है। यहां के चटक लाल रंग के रायल डिलिसियस और हरे रंग के गोल्डन डिलिशियस सेब की बाजार में विशेष मांग रहती है।उत्तराखंड में प्रतिवर्ष करीब 62 हजार मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है। इसमें लगभग 27 हजार मीट्रिक टन योगदान के साथ उत्तरकाशी जनपद प्रदेश में पहले स्थान पर है। सेब उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हर्षिल घाटी के हर्षिल, झाला, सुक्की, बगोरी, मुखवा, जसपुर, पुराली और धराली गांवों के अलावा यमुनाघाटी की स्योरी फल पट्टी, नैटवाड़ और आराकोट क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर सेब की खेती होती है। उत्तरकाशी में रायल डिलिशियस, गोल्डन डिलिशियस, रेड डिलिशियस, गाला, रेड चीफ, आर्गन स्पर, सुपर चीफ और हेपका सहित कई किस्मों के सेब का उत्पादन होता है। इनकी मांग प्रदेश की मंडियों के साथ दिल्ली, कानपुर, चंडीगढ़ और अहमदाबाद जैसे बड़े बाजारों में भी रहती है। कई बड़ी कंपनियां और सेब कारोबारी बागवानों से सीधे संपर्क कर तुड़ाई शुरू होने से पहले ही फसल का सौदा कर लेते हैं। पिछले कुछ वर्षों से मौसम की अनिश्चितता और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण सेब उत्पादन प्रभावित हुआ है। हालांकि, इस वर्ष बीते कुछ वर्षों की तुलना में उत्पादन बेहतर बताया जा रहा है। सुक्की बेल्ट में उत्पादन अपेक्षाकृत कम रहा है। यहां के सेब बागवान के अनुसार, इस वर्ष करीब 70 प्रतिशत उत्पादन हुआ है। वहीं, धराली के बागवान संजय पंवार और राजेश पंवार ने बताया कि अधिक वर्षा के कारण सेब का ड्राप-फाल यानी फलों के समय से पहले गिरने की समस्या बढ़ी, लेकिन इसके बावजूद घाटी में कुल उत्पादन अच्छा रहा है। बागवानों के अनुसार, हर्षिल घाटी में सेब करीब 125 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। घाटी में दो हजार से अधिक सेब बागवान हैं। इस वर्ष यहां करीब डेढ़ लाख पेटियों से अधिक सेब उत्पादन होने की जानकारी दी गई है। बागवानों के मुताबिक, सेब की तुड़ाई लगभग 80 प्रतिशत पूरी हो चुकी है। अब ग्रेडिंग, छंटाई और पैकेजिंग के बाद सेब को विभिन्न मंडियों तक पहुंचाने की तैयारी चल रही है। फल विक्रेता तस्दीक खान ने बताया कि हर्षिल के रायल व गोल्डन डिलिसियस सेब की प्रति दस किलो की पेटी 1200 से अधिक मूल्य पर बिक रही है।उत्तरकाशी के मुख्य उद्यान अधिकारी ने बताया कि हर्षिल घाटी में इस वर्ष सेब की अच्छी पैदावार हुई है, यहां के रसीले सेब की देशभर की मंडियों और बाजारों में मांग रहती है।विभाग की ओर से बागवानों को सब्सिडी पर सेब पैकिंग के लिए पेटियां उपलब्ध कराई गई है। अभी कुल उत्पादन के आंकड़े नहीं लिए गए हैं, जल्द आंकड़े जुटाये जायेंगे। उत्तरकाशी में रायल डिलिशियस, गोल्डन डिलिशियस, रेड डिलिशियस, गाला, रेड चीफ, आर्गन स्पर, सुपर चीफ और हेपका सहित कई किस्मों के सेब का उत्पादन होता है। इनकी मांग प्रदेश की मंडियों के साथ दिल्ली, कानपुर, चंडीगढ़ और अहमदाबाद जैसे बड़े बाजारों में भी रहती है। कई बड़ी कंपनियां और सेब कारोबारी बागवानों से सीधे संपर्क कर तुड़ाई शुरू होने से पहले ही फसल का सौदा कर लेते हैं। हर्षिल घाटी का रसीला सेब देश-प्रदेश की मंडियों व बाजारों में छाने को तैयार है। घाटी में सेब की तुड़ाई अंतिम चरण में पहुंच गई है, वहीं ग्रेडिंग, छंटाई और पैकेजिंग का काम भी तेजी से चल रहा है। हर्षिल घाटी के आठ गांवों में करीब छह हजार मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है। यहां के चटक लाल रंग के रायल डिलिसियस और हरे रंग के गोल्डन डिलिशियस सेब की बाजार में विशेष मांग रहती है। ‘हर्षिल घाटी’ पूरे भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व भर में अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता है. समुद्र तल से 2800 मीटर की ऊंचाई पर बसे हर्षिल घाटी में खूबसूरती के साथ-साथ यहां से सेब और उनकी मिठास पूरे विश्व की जुबान पर हैं. हर्षिल घाटी में रॉयल डिलीशियस, रेड डिलिशियस और गोल्डन डिलिशियस प्रजाति के सेब होते हैं. बताया जा रहा है कि हर्षिल घाटी के 8 गांव में करीब 10, 000 मीट्रिक टन सेबों का उत्पादन होता है. जिसमें अलग-अलग प्रजाति के सेब होते हैं. हर्षिल घाटी के साथ-साथ उत्तरकाशी जिले के आराकोट, बंगाण, सांकरी क्षेत्र में भी सेब की अच्छी पैदावार होती है. हर्षिल घाटी के टकनोर क्षेत्र के सुक्खी, झाला, पुराली, जसपुर, बगोरी, हर्षिल, धराली और मुखबा में सेब की पैदावार की जाती है. सेब की पैदावार में काश्तकारों (वह व्यक्ति जो कृषि या खेती करता हो) के लिए मौसम और जंगली जानवरों की चुनौतियां रहती है. जिसके बावजूद क्षेत्र में काश्तकार सेब की खेती करते हैं हर्षिल घाटी में सेब को लेकर एक बात खास है। यहां का सेब रसीला और मीठा है। जिसे लोग बेहद पसंद करते है, लेकिन सेब की पैकेजिंग और ब्रांडिंग को लेकर उद्यान विभाग ने कोई ठोस पहल नहीं की है।सीमांत जनपद उत्तरकाशी में सेब का उत्पादन वर्षों से होता आ रहा है। 1960 के बाद सेब के उत्पादन में लोगों की रूचि बढ़ी। आज यह स्थिति है कि हर वर्ष 15 हजार मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है और यहां रॉयल डिलिस्स, रेड डिलिस्स सहित आठ किस्म हैं उन सभी किस्मों के सेब के बाग हैं। झाला में पीपीपी मोड में सरकारी कोल्ड स्टोर संचालित कर रही कैंप फ्रूट्स कंपनी के किरण पाल ने बताया कि इस बार क्षेत्र में सेब को अपेक्षित आकार एवं रंग नहीं मिला है, लेकिन उत्पादन काफी अच्छा हुआ है। कंपनी किसानों से औसत 32 से 47 रुपये प्रतिकिलो की दर से सेब खरीद कर कोल्ड स्टोर में जमा कर रही है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














