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भारत-पाकिस्तान यूद्ध के विजय दिवस की जय गाथा

17/12/25
in उत्तराखंड, दुनिया, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पाकिस्तान के खिलाफ 1971 का युद्ध महज 14 दिनों में हमने आज ही के दिन जीता था। इस युद्ध ने भूगोल और इतिहास को नए सिरे से गढ़ डाला। 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को चित कर देने के बाद भारतीय योद्धाओं ने उसकी टेढ़ी पूंछ को काफी हद तक सीधा कर दिखाया था आजाद भारत के इतिहास की उस स्वर्णिम घटना का स्वर्ण जयंती वर्ष आज शुरू हो रहा है। एक ऐसी घटना, जिसने भारतीय सेना के पराक्रम को इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज कर दिया। इस युद्ध और विजय का श्रेय जांबाज भारतीय सेना के साथ भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री को भी जाता है, जिन्होंने पड़ोसी मुल्क में शांति बहाली और अपनी सीमाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए युद्ध का फैसला लिया। 16 दिसंबर 1971 की तिथि हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है। 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारतीय सेनाओं ने एक ऐतिहासिक विजय हासिल की थी। इस युद्ध में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। यह एक ऐसी जीत थी, जिसने भारत के सैन्य इतिहास को बदल दिया। वहीं, इस जीत ने दक्षिण एशिया का नया नक्शा भी बनाया और एक नए राष्ट्र यानी ‘बांग्लादेश’ को जन्म दिया। विजय दिवस के रूप में आज पूरा देश उस दिन को याद कर रहा है। स्वयं भारतीय सेना का मानना है कि विजय दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि यह 1971 के युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की ऐतिहासिक और निर्णायक जीत का प्रतीक है।भारतीय सेना ने इस अवसर पर बताया कि यह वह विजय थी, जिसमें मुक्ति बहिनी और भारतीय सशस्त्र बल कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए और मिलकर बांग्लादेश की स्वतंत्रता की लड़ाई को निर्णायक मोड़ दिया। सेना के मुताबिक इसके साथ ही, इस युद्ध ने पाकिस्तानी सेना द्वारा एक पूरे समुदाय पर चल रहे अत्याचार, उत्पीड़न और क्रूरता को भी समाप्त कर दिया।सेना का कहना है कि केवल 13 दिनों में भारतीय सशस्त्र बलों ने अद्भुत साहस, मजबूत इरादा और श्रेष्ठ सैन्य कौशल दिखाया। इसके परिणामस्वरूप 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया – जो दुनिया के सबसे बड़े सैन्य आत्मसमर्पणों में से एक है। यह दिन भारत की मित्रों के प्रति निष्ठा और शत्रुओं के लिए स्पष्ट संदेश का प्रमाण है। सेना के अनुसार तब से अब तक – जब भारत न्याय के लिए खड़ा होता है, तो विजय निश्चित होती है।विजय दिवस के अवसर पर सीडीएस ने अपने संदेश में कहा, “विजय दिवस के इस गौरवपूर्ण और भावपूर्ण अवसर पर मैं भारतीय सशस्त्र बलों के सभी रैंकों, पूर्व सैनिकों तथा उनके परिवारों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई देता हूं। यह दिन 1971 की निर्णायक विजय का स्मरण कराता है और हमारे वीर सैनिकों, नाविकों एवं वायु सैनिकों के अद्वितीय साहस, पेशेवर दक्षता तथा अटूट समर्पण का प्रतीक है, जिन्होंने कर्तव्य और सम्मान के सर्वोच्च आदर्शों को बनाए रखा।”उन्होंने आगे कहा कि इस ऐतिहासिक उपलब्धि को स्मरण करते हुए, हम उन वीर शहीदों को गहन श्रद्धा के साथ नमन करते हैं, जिन्होंने कर्तव्य पथ पर अपने प्राणों की आहुति दी। उनके पराक्रम और दृढ़ संकल्प ने हमारे सैन्य इतिहास के सबसे निर्णायक अध्यायों में से एक को आकार दिया। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी और हमें स्वतंत्रता की कीमत तथा राष्ट्र सेवा की शाश्वत भावना का स्मरण कराती है।उन्होंने कहा कि 1971 का युद्ध संयुक्त युद्धक कौशल और राष्ट्रीय संकल्प का उत्कृष्ट उदाहरण था। इसने त्रि-सेवा समन्वय, एकीकृत नेतृत्व और समन्वित सैन्य रणनीति की परिवर्तनकारी शक्ति को उजागर किया। 1971 में प्रदर्शित स्थायी सिद्धांतों से प्रेरणा लेते हुए, हम संयुक्तता को सुदृढ़ करने, संरचनाओं का अनुकूलन करने, स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को अपनाने तथा सभी क्षेत्रों में अपनी परिचालन तत्परता को सशक्त बनाने की दिशा में निरंतर अग्रसर हैं। 1971 की विजय को परिभाषित करने वाली एकीकरण, नवाचार और निर्णायक कार्रवाई की भावना, एक आधुनिक, चुस्त और भविष्य के लिए तैयार बल के निर्माण की हमारी यात्रा का केंद्र बनी रहनी चाहिए।उन्होंने कहा, “भविष्य की ओर देखते हुए, मैं देशवासियों को आश्वस्त करता हूं कि भारतीय सशस्त्र बल राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा हेतु पूर्णत: प्रतिबद्ध, सतर्क और सदैव तैयार हैं। अपने वीर नायकों की गौरवशाली विरासत से शक्ति प्राप्त करते हुए, हम शांति, स्थिरता और राष्ट्रीय प्रगति सुनिश्चित करने के अपने सामूहिक प्रयासों को निरंतर आगे बढ़ाते रहेंगे। 16 दिसंबर 1971 को भारतीय सशस्त्र बलों के शौर्य, दृढ़ संकल्प और अटूट साहस ने भारत को पाकिस्तान के विरुद्ध एक ऐतिहासिक विजय दिलाई। इसी विजय के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उदय हुआ।गौरतलब है कि 1971 के इस युद्ध में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। यह एक ऐसी जीत थी जिसने भारत के सैन्य इतिहास को बदल दिया। वहीं इस जीत ने दक्षिण एशिया का नया नक्शा भी बनाया और एक नए राष्ट्र यानी ‘बांग्लादेश’ को जन्म दिया।सभापति ने कहा कि यह निर्णायक जीत न केवल क्षेत्र के भू-राजनीतिक परिदृश्य को बदलने वाली साबित हुई, बल्कि इसने न्याय, मानव गरिमा और स्वतंत्रता के प्रति भारत की अडिग प्रतिबद्धता को भी दोबारा सुदृढ़ किया। उन्होंने बताया कि 13 दिनों तक चले इस युद्ध में भारतीय सेना, भारतीय वायु सेना और भारतीय नौसेना ने अद्भुत तालमेल, तीव्र रणनीति और निर्भीक क्रियान्वयन का परिचय देते हुए अपनी सैन्य श्रेष्ठता सिद्ध की।दरअसल, 1971 के युद्ध ने पाकिस्तान सेना द्वारा एक पूरे समुदाय पर चल रहे अत्याचार, उत्पीड़न और क्रूरता को भी समाप्त कर दिया था। राज्यसभा के सभापति ने भारतीय सशस्त्र बलों के उस अद्वितीय साहस, कर्तव्यनिष्ठा और बेजोड़ पेशेवर दक्षता की सराहना की।उन्होंने कहा कि हमारे जवानों की वीरता और बलिदान देश के करोड़ों नागरिकों, विशेषकर युवा पीढ़ी को सदैव ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना से प्रेरित करते रहेंगे। इस पावन अवसर पर सभापति और सदन के सभी सदस्यों ने देशवासियों के साथ मिलकर उन वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने राष्ट्र की सेवा में सर्वोच्च बलिदान दिया।सदन में उन्होंने यह कामना की कि शहीदों का साहस और पराक्रम की विरासत आज भी हमें भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए सामूहिक संकल्प के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहे। मां भारती के सपूतों को कोटि-कोटि नमन किया। प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा,आज विजय दिवस पर हम उन बहादुर सैनिकों के साहस और बलिदान का सम्मान करते हैं जिन्होंने 1971 में भारत की ऐतिहासिक जीत में योगदान दिया। उनके निस्वार्थ समर्पण और अटूट संकल्प ने हमारे राष्ट्र की रक्षा की और हमें गौरव दिलाया। यह दिन उनकी असाधारण वीरता और उनकी अटल भावना को श्रद्धांजलि है। उनका बलिदान पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करेगा और हमारे देश के इतिहास में गहराई से अंकित रहेगा। यह युद्ध विजय प्रधानमंत्री  की कूटनीतिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रमाण भी बना। कितना भी समय बीत जाए, यह विजय भारतीय इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित रहेगी। भारत के लिए यह युद्ध एक ऐतिहासिक घटना मानी जाती है. इस वजह से, पाकिस्तान पर भारत की जीत का सम्मान करने के लिए 16 दिसंबर को देश भर में “विजय दिवस” ​​​​के रूप में मनाया जाता है. रिपोर्टों के अनुसार, माना जाता है कि 1971 की लड़ाई के दौरान 3,900 भारतीय सैनिक मारे गए थे और 9,851 घायल हुए थे. 16 दिसंबर की सुबह सवा नौ बजे जनरल जैकब को जनरल मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुँचे। उसी दिन शाम को चार बजे पूर्वी पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल एके नियाज़ी और जैकब ढाका में भारतीय कमांडर ले. जनरल जगदीश सिंह अरोड़ा को लेने ढाका हवाई अड्डे पहुँचे। रास्ते में जैकब ने दो भारतीय जवानों को भी अपने पीछे आने के लिए कहा। तभी जैतूनी हरे रंग की मेजर जनरल की वर्दी पहने हुए एक व्यक्ति उनकी तरफ़ बढ़ा। जैकब समझ गए कि वह मुक्ति बाहिनी के टाइगर सिद्दीकी हैं। उन्हें कुछ ख़तरे की बू आई। उन्होंने वहाँ मौजूद भारतीय जवानों से कहा कि वह नियाज़ी को कवर करें और सिद्दीकी की तरफ़ अपनी राइफ़लें तान दें। जैकब ने विनम्रतापूर्वक सिद्दीकी से कहा कि वह हवाई अड्डे से चले जाएं। टाइगर टस से मस नहीं हुए। जैकब ने अपना अनुरोध दोहराया। टाइगर ने तब भी कोई जवाब नहीं दिया। जैकब ने तब गुर्राते हुए कहा कि वह फ़ौरन अपने समर्थकों के साथ हवाई अड्डा छोड़ कर चले जाएं। तब टाइगर सिद्दीकी वहां से हटा।साढ़े चार बजे अरोड़ा अपने दल बल के साथ पाँच एम क्यू हेलिकॉप्टर्स से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे। रेसकोर्स मैदान पर पहले अरोड़ा ने गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण किया। अरोडा और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्मसमर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए। नियाज़ी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। नियाज़ी की आँखें नम हो गयी थीं। वहां मौजूद भीड़ नारे लगा रही थी। भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी को एक जीप में बैठा कर एक सुरक्षित जगह पहुंचा दिया। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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