
शंकर सिंह भाटिया
नंदा की जात को लेकर पूरे उत्तराखंड और उत्तराखंड के बाहर रहने वाले उत्तराखंडियों में एक असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी। धीरे-धीरे मां नंदा की कृपा से अब उसमें कुछ चीजें साफ हो रही हैं। कुरूड़ नंदाधाम से 5 सितंबर को बड़ी जात शुरू हुई है। यह राजजात नहीं है। राजजात आयोजन समिति 2027 में राजजात का आयोजन करेगी। दोनों आयोजनों को लेकर आयोजकों के बीच अंदरखाने मनमुटाव होता होगा, लेकिन सामने कोई किसी पर किसी तरह के आरोप प्रत्यारोप नहीं लगा रहा है।
2014 में जब राजजात का आयोजन हुआ था, तब यात्रा विसर्जन के समय घोषणा की गई थी कि अगली राजजात बाहर साल बाद 2026 में आयोजित होगी। राजजात समिति से जुड़े लोगों की जब राजजाता 2026 की तैयारियों को लेकर पिछले वर्ष बैठकें हुई, उसके बाद बताया गया कि कुल पुरोहितों ने 2026 में राजजात को लग्नानुसार अच्छा नहीं बताया था, इसलिए निर्णय लिया गया कि राजजात 2027 में आयोजित की जाएगी। आयोजन कमेटी ने इसकी सूचना शासन-प्रशासन को भी दे दी और माना गया कि अब 2027 में ही राजजात आयोजित होगी।
नंदा राजजात को लेकर दो केंद्रीय बिंदु रहे हैं। एक नौटी और दूसरा कुरूड़। कुरूड़ से जुड़े लोग हमेशा आरोप लगाते रहे हैं कि नौटी को अधिक महत्व दिया जाता है, जबकि कुरूड़ को अपेक्षित महत्व नहीं दिया जाता है। उनका आरोप है कि नौटी से सिर्फ एक छंतोली यात्रा में शामिल होती है, जबकि कुरूड़ नंदाधाम से मां नंदा की डोली का प्रस्थान होता है। इस तरह के आरोप प्रत्यारोप और खींचतान हर बार चलती रहती है। इस बार यह इसलिए अधिक विभाजनकारी हो गई क्योंकि राजजात समिति ने यात्रा को एक साल आगे बढ़ा दिया, कुरूड़ वालों ने इसे एकतरफा निर्णय बताते हुए बड़ी जात इसी साल निकालने का निर्णय ले लिया। अब 5 सितंबर 2026 से कुरूड़ से बड़ी जात कैलाश के लिए निकल पड़ी है।
बड़ी जात कुरूड़ के आयोजकों ने पहले 26 पड़ावों वाली बड़ी जात की घोषणा करते हुए कार्यक्रम भी जारी कर दिया था। जो कुरूड़ से निकलने वाली जात के पड़ावों को निर्धारित करती है। 5 सितंबर को कुरूड़ से शुरू हुई यात्रा 30 सितंबर को सिद्धपीठ देवराड़ा में हवन यज्ञ के साथ समापन होने का कार्यक्रम तय किया गया था। बाद में कुछ और कार्यक्रम भी जारी किए गए। जिसमें घोषित किया गया कि बड़ी जात वेदनी बुग्याल पड़ाव तक जाएगी, उसके बाद आली बुग्याल होते हुए वापसी के लिए प्रस्थान करेगी। इससे असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। 5 सितंबर को यात्रा प्रारंभ हुई है, तो यात्रा के साथ दो चौसिंग्या खाड़ू भी चल रहे हैं। स्वाभाविक है खाड़ू का विसर्जन होमकुंड में ही होगा। वेदनी से आप उन्हें विसर्जित नहीं कर सकते। इसलिए अब तय माना जा रहा है कि यात्रा पूर्व घोषित अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही चलेगी। कमेटी से जुड़े लोगों ने भी इस बात को दोहराया है।
कुरूड़ में जब 5 सितंबर 2026 को यात्रा प्रारंभ हुई, वहां एक दो दिन पहले से ही बड़ी संख्या में बाहर से लोगों का आना शुरू हो गया। सैकड़ों की संख्या में लोग कुरूड़ पहुंच गए थे। शासन-प्रशासन की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं हो पाई थी। इसलिए बड़ी जात समिति को उनके रहने खाने की व्यवस्था करने में पसीने छूट गए। कुरूड़ में अमूमन राजजात के दौरान जितने लोग जुटते हैं, इस बार जुटने वालों की संख्या अपेक्षा से कहीं अधिक थी। इतनी भीड़ कुरूड़ में कभी नहीं देखी गई।
चूंकि नंदा राजजात समिति ने जिला प्रशासन और शासन को बता दिया था कि राजजात 2027 में होगी, इसलिए शासन प्रशासन की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं की गई। अब जिस तरह भीड़ जुट रही है, उससे यह बात साफ हो गई है कि यदि शासन-प्रशासन सक्रिय नहीं हुआ तो हालात ज्यादा खराब हो सकते हैं। कुरूड़ बड़ी जात समिति ने जिला प्रशासन को इसकी सूचना दे दी है। क्योंकि इस बार मौसम अधिक खराब है, सितंबर तक लगातार बारिश हो रही है, उच्च हिमालयी क्षेत्र में तो हालात और खराब होंगे, कीचड़ से रास्तों की हालत ज्यादा खराब हो जाएगी। इसलिए शासन-प्रशासन के सहयोग की जरूरत पड़ेगी। प्रशासन के सहयोग और देखरेख के बिना उच्च हिमालयी क्षेत्रों में यात्रा में कई तरह की दिक्कतें आ सकती हैं।
नंदा उत्तराखंड में सबकी अराध्य देवी है। जौहार मुंस्यार से लेकर उत्तरकाशी चमोली तक गांव-गांव में मां नंदा का पूजन होता है। सभी जगह नंदा के मंदिर मौजूद हैं, लोग अपने घरों में भी नंदा के मंदिर बनाकर मां को पूजते हैं। इसलिए पूरे उत्तराखंड को जोड़ने में मां नंदा को सबसे मजबूत कड़ी माना जाता है। सन 2000 में जब नंदा राजजात के कार्यक्रमों की घोषणा हुई, उसके ठीक बात उत्तराखंड राज्य की भी केंद्र सरकार ने आधिकारिक घोषणा की थी। इसलिए उत्तराखंड राज्य को नंदा का बरदान कहा जाने लगा। 2000 की राजजात में पूरी यात्रा में यात्रियों की बीच इस बात की चर्चा सबसे आम थी। नंदकेशरी में जहां कुमाउं और गढ़वाल की यात्रा का मिलन होता है, नंदकेशरी के पुल पर बड़े-बूढ़ों ने इसकी बकायदा घोषणा भी की थी। यात्रियों ने हर्षोल्लास के साथ इसे स्वीकार भी किया था। इस बार जब कुरूड़ बड़ी जात कमेटी ने बड़ी जात निकालने की घोषणा की और 5 सितंबर को यह शुरू भी हो गई तो लोगों के मन में इस बात को लेकर चिंता हो गई कि क्या मां नंदा की इस विरासत का विभाजन हो जाएगा? मां नंदा के भक्त दो धड़ों में बंट जाएंगे? उत्तराखंडी समाज से इस बात की आशंका उठने लगी। आजकल के सोशल मीडिया के युग में गंभीर रिपोर्टिंग जैसे कालातीत हो गई है, इसलिए मीडिया से कहीं भी साफ बात सामने नहीं आ रही थी।
यह बात शीशे की तरह साफ हो गई है कि नंदा की विरासत का कोई विभाजन नहीं हुआ है। कुरूड़ बड़ी जात आयोजन कमेटी ने इसे बड़ी जात नाम दिया है। वह कहीं भी इसे राजजात नहीं कह रहे हैं। पड़ावों में यात्रा की देखरेख करने वाली कमेटियों की तरफ से साफ कहा जा रहा है कि वह कुरूड़ से निकली बड़ी जात का भी स्वागत करेंगे और अगले साल होने वाली राजजात का भी उसी तरह से स्वागत करेंगे। इसलिए विभाजन का सवाल यहीं समाप्त हो जाता है।











