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हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता ब्लैक कार्बन आपदाओं का जनक

15/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हिमालय की शांत वादियों में आपदाओं का खतरा गहराने लगा है। यह संकट इंसानी गतिविधियों से पैदा हुए ब्लैक कार्बन का परिणाम भी है। हिमालयी क्षेत्र में जम रही ब्लैक कार्बन की परत हिमनदों के पिघलने की गति बढ़ा रही है। इससे हिमनद झीलों के फटने, जलस्रोतों के सूखने और फसल चक्र गड़बड़ाने जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। हिमालय भू-विज्ञान सेवानिवृत्त वरिष्ठ विज्ञानी का कहना है कि अगर यह प्रवृत्ति जारी रही तो आने वाले समय में हिमालयी पारिस्थितिकी गहरे संकट में पड़ सकती है।हिमालय में जलवायु परिवर्तन, एरोसोल व प्रदूषण के बढ़ते प्रभाव पर से शोध कर रहे हैं। गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र में ब्लैक कार्बन की मात्रा 4.62 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर पहुंच गई है, जबकि 50 वर्ष पहले इस क्षेत्र में ब्लैक कार्बन की उपस्थिति ना के बराबर थी। हिमालयी क्षेत्र में ब्लैक कार्बन की उपस्थिति का पता लगाने के लिए की ओर से भोजवासा व चीड़वासा में स्थापित वेधशालाओं से पहले देश के हिमालयी क्षेत्र में एक भी वेधशाला नहीं थी, जिससे ब्लैक कार्बन मापा जा सके। विज्ञानी का कहना है कि अब देश में 22 वेधशालाएं संचालित हैं। हिमालयी क्षेत्र में अधिकाधिक वेधशालाओं का होना जरूरी है। शोध में यह भी पता चला कि अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका जैसे महाद्वीपों से भी ब्लैक कार्बन भारत के वातावरण में पहुंच रहे हैं। वैश्विक मंच पर जब भी जलवायु परिवर्तन की बात होती है तो बड़ी आसानी में दूसरे देश यह कह देते हैं कि भारत की बड़ी आबादी खाना पकाने के लिए लकडिय़ां जलाती हैं, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ रहा है और ग्लेशियरों पर खतरा बढ़ रहा है। हालांकि, पहली बार हिमालयी ग्लेशियरों पर ब्लैक कार्बन की स्थिति पता लगाने के लिए गंगोत्री ग्लेशियर में लगाए गए एथलोमीटर से नई कहानी सामने आई है।  अंटार्कटिका में वैज्ञानिकों ने हाल ही में ब्लैक कार्बन के अंश पाए हैं, जो ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का प्रमुख कारण बन रहे हैं। शोध के अनुसार, यह ब्लैक कार्बन मुख्य रूप से जंगलों में लगी आग और औद्योगिक प्रदूषण से निकलता है, जो वायुमंडल के माध्यम से दूर-दूर तक पहुँचता है। जब यह कार्बन ग्लेशियर की सतह पर बैठता है, तो यह सूर्य की किरणों को अवशोषित करता है और बर्फ को तेजी से पिघलाने में मदद करता है।वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अंटार्कटिका में ग्लेशियरों का यह तेज पिघलना समुद्री स्तर में वृद्धि और वैश्विक जलवायु परिवर्तन को और बढ़ावा देगा। इसके प्रभाव से समुद्र किनारे बसे शहरों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। शोध में यह भी पाया गया कि ब्लैक कार्बन ग्लोबल वायुमंडलीय परिवहन के कारण अंटार्कटिका जैसे दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच रहा है।विशेषज्ञों ने कहा कि ग्लेशियरों की रक्षा और वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने के लिए जंगल की आग और औद्योगिक प्रदूषण को कम करना आवश्यक है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदूषण नियंत्रण और सतत ऊर्जा स्रोतों के उपयोग पर जोर दिया। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर वैश्विक स्तर पर कार्रवाई नहीं की गई, तो अंटार्कटिका के ग्लेशियर आने वाले दशकों में और तेजी से पिघल सकते हैं, जिससे पूरे विश्व की जलवायु पर गंभीर असर पड़ेगा। अभी तक विश्वभर में वायु प्रदूषण के जो भी अधिकतम सीमा तय की गई है, वह सांस लेने के हिसाब से है। ग्लेशियर जैसे उच्च क्षेत्रों में पारिस्थितक तंत्र की सुरक्षा के लिए यह सीमा कितनी होनी चाहिए, इस पर विश्वभर में कोई मानक निर्धारित नहीं है। ताकि ग्लेशियर क्षेत्रों में भी ब्लैक कार्बन की उच्चतम सीमा तय की जा सके। भारत की  प्रमुख नदियों में पानी के मुख्य स्रोत ये ग्लेशियर ही हैं। ये नदियां करोड़ों लोगों की खेती और पीने की जरूरत को पूरा करती हैं। हाल ही में साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक अध्ययन में दावा किया गया है कि अगर मौजूदा हालात जितने भी तापमान स्थिर रहे तब भी 2020 की तुलना में 2100 तक दुनिया भर के ग्लेशियर अपना लगभग 39 फीसदी हिस्सा खो देंगे। रिपोर्ट के मुताबिक अगर 2100 तक तापमान में 2.7 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो जाती है तो ग्लेशियर 75 फीसदी तक गायब हो सकते हैं। ग्लेशियर गलने के मामले में भारत में स्थिति और भयावह है। हिन्दू कुश-हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर हर साल औसतन 14.9 मीटर की रफ्तार से पीछे हट रहे हैं। इससे आने वाले समय में पानी, कृषि और बिजली के लिए करोड़ों लोगों की सुरक्षा को सीधा खतरा पैदा हो सकता है।ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके चलते इसे “तीसरा ध्रुव” भी कहा जाता है। ग्लेशियर दक्षिण एशिया में मीठे पानी की आपूर्ति के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कश्मीर विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ ज्योग्राफी और डिजास्टर मैनेजमेंट के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि गंगोत्री और सियाचिन जैसे प्रमुख भारतीय ग्लेशियर भी तेजी से सिमट रहे हैं। शोधकर्ता के मुताबिक हाल के दशकों में, जलवायु परिवर्तन और ब्लैक कार्बन के बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। उदाहरण के तौर पर गढ़वाल के हिमालय वाले क्षेत्र में गंगोत्री जैसे ग्लेशियरों का काफी हद तक पीछे हटना देखा गया है। हिमालयी नदियों जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु में पानी का स्तर काफी तेजी से बढ़ रहा है। यह प्रवाह अस्थायी रूप से ज्यादा है। जिसे विशेषज्ञ “पीक वाटर” कहते हैं। ग्लेशियरों का लगातार सिकुड़ना भविष्य में इन नदियों में पानी की कमी का कारण बन सकता है। इससे न केवल बाढ़ का खतरा बढ़ेगा, बल्कि गर्मियों में जल संकट भी गहरा सकता है।
राष्ट्रीय ध्रुवीय और महासागर अनुसंधान केंद्र (एनसीपीओआर) की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में पश्चिमी हिमालय के सुत्री ढाका ग्लेशियर की बर्फ की गहराई 50% घट गई, जबकि माउंट एवरेस्ट के ऊपरी हिस्से का हिम आवरण 150 मीटर सिकुड़ गया। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि बढ़ती गर्मी, ब्लैक कार्बन, माइक्रोप्लास्टिक और असामान्य बारिश के कारण यह गति और तेज हो सकती है, जिससे भविष्य में विनाशकारी बाढ़, जलस्रोतों में भारी कमी और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। क्लाइमेट चेंज के चलते पूरी दुनिया में ग्लेशियर पिघल रहे हैं। कुछ अध्ययनों में ये भी दावा किया गया है कि जल्द ही आर्कटिक में जमा ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएंगे। ऐसे में वहां का पूरा इकोसिस्टम ध्वस्त हो जाएगा। राष्ट्रीय ध्रुवीय और महासागर अनुसंधान केंद्र के पूर्व निदेशक रहे कहते हैं कि आर्कटिक में बर्फ पूरी तरह पिघल गई तो वहां समुद्र बन जाएगा। इससे वहां रहने वाले जीव जंतुओं के लिए भी संकट पैदा होगा। जहां तक हम हिमालय की बात करें तो यहां भी बढ़ती गर्मी के चलते ग्लेशियर पिघल रहे हैं। ग्लेशियर पिघलने से कई कृत्रिम झीलें बन रही हैं जो आने वाले समय में बड़ी तबाही ला सकती हैं। वहीं पहाड़ी नदियों में भी आने वाले समय में पानी का प्रवाह बढ़ जाएगा। नदियों के अगल बगल रहने वाले लोगों को बड़ी तबाही का भी सामना करना पड़ सकता है। वहीं मैदानी इलाकों में बाढ़ भी बढ़ेगी। इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए हमें आज की तैयारी करनी होगी। एनसीपीओआर के वरिष्ठ वैज्ञानिक कहते हैं कि ग्लेशियरों के पिघलने से डाउनस्ट्रीम जल उपलब्धता पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा और समुद्र का स्तर बढ़ेगा। ग्लेशियरों के लगातार गर्म होने और तेजी से पिघलने के कारण, हिमालयी क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में ग्लेशियरों का क्षेत्र और मात्रा तेजी से कम हो रही है। बर्फ और ग्लेशियर क्षेत्रों में ये बदलाव कई बारहमासी नदियों के जल बजट पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं जो भारत के प्रमुख आबादी वाले क्षेत्र की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हैं।” बढ़ता ब्लैक कार्बन ग्लेशियर के गलने का एक बड़ा कारण बन रहा है। पहाड़ों में गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, जंगलों की आग की वजह से निकलने वाला काला धुआं और उसके साथ कार्बन के छोटे छोटे कण ग्लेशियर तक पहुंच कर उसे तेजी से गला रहे हैं। वैज्ञानिक के अनुसार हवा में ब्लैक कार्बन का स्तर बढ़ा है। ये ब्लैक कार्बन हवा के साथ ग्लेशियर तक पहुंच रहा है। ब्लैक कार्बन ग्लेशियर की सतह पर जमा हो कर उसका तापमान तेजी से बढ़ा देता है। इससे भी ग्लेशियरों के गलने की गति में इजाफा हुआ है। पार्वती ग्लेशियर पर किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि ब्लैक कार्बन यहां पहुंच कर बर्फ को तेजी से गला रहा है। ब्लैक कार्बन और अन्य प्रदूषण कणों की वातावरण में उपस्थिति यह तय करती है कि सूरज की किरणें कितनी मात्रा में धरती तक पहुंचेगी। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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