देहरादून, 4 मई, 2026. दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के तत्वाधान में सर्वोदय नेता भवानी भाई की जीवन यात्रा पुस्तक का लोकार्पण और उनके सामाजिक योगदान पर एक कार्यक्रम किया गया.
इस कार्यक्रम में पुस्तक की परिकल्पना और लेखन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रेम पंचोली ने कहा कि उनका संपर्क भवानी भाई से मात्र दश वर्षों का रहा है। 1996 में जब वह इंटर के छात्र थे उन दिनों वे टिहरी में सांस्कृतिक प्रोग्राम करने गए। जहां भवानी भाई की नजर उन पर पड़ी और रात्रि विश्राम के लिए पूरी सांस्कृतिक टीम को ठक्कर बाबा आश्रम में आमंत्रित किया। बस यहीं से भवानी भाई से उनका संपर्क रहा। लेकिन 1997 में जब वह बीए प्रथम वर्ष के छात्र से तब उनका परिचय सुरेश भाई सेवा हुआ और सुरेश भाई के कारण प्रेम पंचोली का भवानी भाई के साथ बहुत नजदीक का रिश्ता हो गया। उन्होंने कहा कि भवानी भाई को उन्होंने जितना नजदीक से देखा वह बहुत ही काम था। 10 वर्षों में उन्होंने भवानी भाई को पूर्ण रूप से नहीं समझ पाया। लेकिन एक बात सच है कि जहां भवानी भाई खड़े हो जाते थे, पूरा समाज उनके साथ खड़ा हो जाता था। प्रेम पंचोली ने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि जब एक दिन वन बचाओ आंदोलन को चौरंगी खाल में भवानी भाई संबोधित कर रहे थे, तो एक बार पूरा जनसमूह रोता हुआ नजर आया और उसके बाद भवानी भाई ने जब अपने भाषण को आगे बढ़ाया तो पूरा जनसमूह उनके साथ नारेबाजी करते हुए खड़ा हो गया। तत्काल इस जनसमूह ने प्रणय किया कि जंगलों में वन माफियाओ को नहीं घुसने दिया जाएगा।
पुस्तक के संपादक और भवानी भाई के बहुत ही करीबी रहे रक्षासूत्र आंदोलन के प्रणेता सुरेश भाई ने कहा कि भवानी भाई ने हमेशा उन्हें एक गार्जियन के तौर पर संरक्षण दिया है। सुरेश भाई ने कहा कि जब-जब उन्होंने जनता के समस्याओं पर पैरवी की है यह वन बचाओ के लिए रक्षासूत्र आंदोलन खड़ा किया, तब तब भवानी भाई उनके साथ एक संरक्षक के तौर पर हमेशा खड़े रहे। उन्होंने रक्षा सूत्र आंदोलन के कई संस्मरण सुनाए। कहा कि यदि भवानी भाई उनके साथ खड़े नहीं होते तो शायद आज सुरेश भाई यहां नहीं होते। क्योंकि कई बार वन माफियाओ ने सुरेश भाई पर जानलेवा हमला किया है। ऐसे वक्त भवानी भाई सीधे उनके आंदोलन तक पहुंच गए। सुरेश भाई ने कहा कि भवानी भाई सर्वोदय विचार के व्यक्ति थे सीधे और सरल व्यक्तित्व थे। उन्हें कभी गुस्सा नहीं हुआ करता था और कभी किसी से नाराजगी भी नहीं थी। सदा उनके विचार सकारात्मक ही हुआ करते थे। उन्होंने चिपको आंदोलन से लेकर तमाम उत्तराखंड में परिवर्तन की लड़ाई का नेतृत्व किया है। उनके कई गतिविधियों पर हम लोग नहीं लिख पाए लेकिन कुछ कुछ गतिविधियों पर इस पुस्तक का हमने संपादन किया है।
प्रो. शेखर पाठक ने वन आंदोलन, शराब आंदोलन के संदर्भ में भवानी भाई के योगदान को अद्वितीय बताते हुए उत्तरकाशी, लम्बगांव,टिहरी, जलकुर घाटी के समाज व भवानी भाई के जन आंदोलन के प्रबल नेतृत्व के अनुभव बताये.
इस दौरान भवानी भाई के पास रहे ठक्कर बाबा आश्रम के छात्र और उत्तराखंड जल निगम के प्रबंधक पद से सेवानिवृत हुए इंजीनियर किशनलाल ने कहा कि उनकी भवानी भाई के साथ कई तरह की नजदीकियां थी। उन्होंने कहा कि जब वह पढ़ने टिहरी आए, उन दिनों उनके पास खर्चों की भी समस्या हुआ करती थी। ठक्कर बाबा आश्रम में भवानी भाई के सानिध्य में रहकर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और वह उत्तराखंड जल निगम के प्रबंधक पद से सेवानिवृत हुए। उन्होंने कहा कि भवानी भाई के सानिध्य में रहकर सैकड़ों छात्र आज सफलता की सीढ़ी चूम रहे है।
पूर्व ब्लाक प्रमुख और वरिष्ठ अधिवक्ता जयप्रकाश शाह ने कहा कि भवानी भाई जैसा व्यक्ति शायद कभी इस दुनिया में आए, “भूतों न भविष्यति” वाली बात कहते हुए जयप्रकाश। शाह ने कहा कि उनके जैसे नौजवानों के लिए ठक्कर बाबा आश्रम एक गार्जियनशिप वाला आश्रम था इस आश्रम में शिक्षा के साथ-साथ पठन-पाठन करने वाले छात्रों को संस्कार भी दिए जाते थे। सर्वोदय विचार से जुड़ने के बाद जयप्रकाश शाह ने कहा कि उनके जीवन में एक नई ऊर्जा पैदा हुई है।
लंबे समय तक महिला समाख्या जुड़ी रही सामाजिक कार्यकर्ता प्रभा रतूड़ी ने कहा कि भवाई भाई जैसे व्यक्ति कभी दुबारा पैदा होने, कदापि नहीं। दबे, कुचले और महिला हिंसा के प्रति सदैव सजग रहने वाले भवानी भाई को कोई कैसे भूल सकता है। युवाओं और महिलाओं के लिए भवानी भाई हमेशा एक पिता के तौर पर सामने आए। कहा कि ठक्करबप्पा आश्रम एक छात्रावास ही नहीं था बल्कि युवाओं को दिशा देने का भी एक प्रमुख केंद्र रहा है।
इस दौरान कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ती पत्रकार रमेश कुड़ियाल, लेखक गजेन्द्र नौटियाल, वरिष्ठ पत्रकार व लेखक सोमवारी लाल उनियाल तथा दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने भी विचार व्यक्त किये और भवानी भाई के जुड़े कई संस्मरण भी लोगों के बीच साझा किये.
कार्यक्रम का संचालन सामाजिक इतिहासकार डॉ. योगेश धस्माना ने किया.
कार्यक्रम में प्रतीक पंवार, आलोक सरीन, वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल कमलेश भट्ट, पुस्तकालयाध्यक्ष, डॉ. डी. के. पाण्डे, देवेन्द्र काण्डपाल, शैलेन्द्र नौटियाल, संदीप गुसाईं, भगवान प्रसाद घिल्डियाल, कुसुम नौटियाल सहित कई लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।











