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लाखों रुपयों किलो में बिकने वाले कीड़ा जड़ी यारसा गंबू

04/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

चीन, हांगकांग, कोरिया व ताईवान के अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कीड़ा जड़ी का व्यापारिक नाम यारसा गंबू है. वैज्ञानिक बताते हैं, ‘उच्च हिमालयी क्षेत्रों की एक तितली के लार्वा पर फफंूद के संक्रमण से जंतु-वनस्पति की यह साझा विशिष्ट संरचना बनती है. इसका वानस्पतिक नाम ‘कार्डिसैप्स साईनोन्सिस’ है और इसे फंगस परिवार के समूह में रखा गया हैकीड़ा जड़ी का आधा भाग जमीन के नीचे व आधा ऊपर रहता है. आम तौर पर कीड़ा जड़ी की लंबाई 7 से 10 सेमी होती है लेकिन बताते हैं कीड़ा जड़ी विभिन्न जैवसक्रिय यौगिकों का खजाना है। दो सबसे सक्रिय तत्व कॉर्डीसेपिन (-3′-डीऑक्सीएडेनोसिन) और कॉर्डीसेपिक एसिड (डी-मैनिटोल) हैं, जो समग्र मानव स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाते हैं।इसके अलावा, कीड़ा जड़ी में विटामिन—मुख्य रूप से ई, के, बी1, बी2, और बी12—प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, न्यूक्लियोसाइड, स्टेरोल और ट्रेस तत्व शामिल हैं। इस बीच, कीड़ा जड़ी न्यूनतम दुष्प्रभावों के साथ एक प्राकृतिक उपचार दवा है। कि इसी साल पिथौरागढ़ जिले की जौहार घाटी में वनकटिया बुग्याल (उच्च हिमालयी घास के मैदान) में दोहन करने वालों के साथ उन्हें एक फीट लंबी यारसा गंबू भी मिली है. वैज्ञानिक के अनुसार न निकालने पर भी यह फंगस खुद ही समाप्त हो कर मिट्टी में मिल जाता है इसलिए नियंत्रित दोहन से इसके विलुप्त होने का खतरा नहीं रहता. चीन की परंपरागत चिकित्सा पद्धति के अलावा यारसा गंबू का प्रयोग दवा निर्माता यौन उत्तेजक  और शक्ति वर्धक दवाओं को बनाने में भी करते हैं. स्थानीय व्यापारी बताते हैं कि चीन में आयोजित पिछले ओलंपिक खेलों से पहले यारसा गंबू के भावों में जबरदस्त उफान आया था. उस समय चीनी खिलाड़ियों द्वारा इसे शक्ति वर्धक स्टेरॉयड के रूप में प्रयोग करने की खबरें भी प्रमुखता से छपी थीं. वैज्ञानिक के अनुसार जंतु-वनस्पति आधारित होने के यारसा गंबू डोपिंग जांच के दौरान पकड़ में नहीं आ पाती.पिथौरागढ़ जिले के भेड़ पालक व चीन युद्ध से पहले तिब्बत में व्यापार करने वाले भारत के व्यापारी यारसा गंबू के औषधीय महत्व को सदियों से जानते थे. परंतु अचानक समझ में आए व्यापारिक महत्व के बाद अब वर्ष 1991 के बाद पिथौरागढ़ जिले के धारचूला क्षेत्र के सीमांत ग्रामवासी या नेपाली बुग्यालों में कीड़ा जड़ी का दोहन व व्यापार करते हैं. उत्तराखंड में कीड़ा जड़ी के संग्रहण का कार्य मुख्यतया पिथौरागढ़, चमोली, बागेश्वर जिलों में व बहुत ही छुटपुट मात्रा में रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी जिलों में होता है. मोटे अनुमान के अनुसार स्थानीय निवासियों के द्वारा इन सभी जिलों में साल भर में लगभग 150 क्विंटल कीड़ा जड़ी का संग्रहण किया जाता है. यदि औसतन बाजार भाव चार लाख रुपए प्रति किलो भी माना जाए तो यह मोटे तौर पर यह 600 करोड़ सालाना की आर्थिकी है. यह पैसा राज्य के कुछ दर्जन सीमांत व दूरस्थ गांवों के ग्रामीणों के बीच बंटता है. इन गांवों में खेती ज्यादा नहीं हो पाती इसलिए यारसा गंबू इनके लिए वरदान बनकर आई है. एक दिन में एक ग्रामीण आम तौर पर 5-7 से 30-40 तक यारसा गंबू का संग्रह कर लेता है. बाजार में प्रति यारसा गंबू 150 रुपए के भाव से बिकती है. इस तरह 100 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी करने वाला व्यक्ति एक दिन में 4500 रुपए तक कमा सकता है और एक सीजन में किसी व्यक्ति को दो से लेकर छह लाख रुपए तक की आय हो सकती है. पिछले 10-15 साल में इस पैसे से उपजी समृद्धि  को जोशीमठ, घाट, बागेश्वर, धारचूला व मुनस्यारी तहसीलों के दूरस्थ गांवों में लोगों के जीवन स्तर में आए बदलाव से महसूस किया जा सकता है. हालांकि ग्रामीणों को इस समृद्धि की कीमत भी अच्छी-खासी चुकानी पड़ती है. यारसा गंबू ढूंढ़ने के लिए स्थानीय लोग उच्च हिमालयी बर्फीले क्षेत्र में महीनों तक खुले आसमान अथवा कपड़े के तंबुओं में रहते हैं. इस दौरान या बाद में ये ग्रामीण आम तौर पर निमोनिया, फ्रॉस्टबाईट जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं.यारसा गंबू पर न तो आयात-निर्यात शुल्क निर्धारित है न ही इसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए कोई प्रक्रिया तय हुई हैलेकिन इस मुद्दे का दूसरा पक्ष यह है कि मीडिया में करीब दो दशक से चर्चित होने के बावजूद सरकार के स्तर पर यारसा गंबू के विदोहन व विपणन की कोई सुस्पष्ट नीति नहीं बन पाई है. वन विभाग द्वारा जारी राज्य में प्रतिबंधित या विदोहन होने वाली 83 जड़ी-बूटियों की सूची में यारसा गंबू को किसी भी श्रेणी में नहीं रखा गया है. मुख्य वन संरक्षक (प्रशासन) डॉ. राकेश शाह कहते हैं, ‘यारसा गंबू राज्य में प्रतिबंधित प्रजाति नहीं है. शासन  की नीतियों व राज्य स्तरीय जड़ी-बूटी विदोहन समिति के निर्णयों के अनुसार वन पंचायतें स्थानीय ग्रामीणों द्वारा वन क्षेत्रों में यारसा गंबू का नियमतः दोहन करा सकती हैं.’राज्य बनने के बाद यारसा गंबू के विदोहन व विपणन के संबध में 10 जनवरी, 2001 को  सरकार ने एक आधा-अधूरा शासनादेश जारी किया था. इस शासनादेश में यारसा गंबू को बिना श्रेणीबद्व किए ही वन भूमि से इसके संग्रहण के अधिकार वन पंचायतों को दिए गए. वन पंचायतें अपनी सीमा के भीतर आने वाले सदस्यों द्वारा एकत्र यारसा गंबू के विक्रय मूल्य का पांच प्रतिशत बतौर रॉयल्टी वसूल कर इसकी बिक्री कर सकती थीं. आम ग्रामीण संग्रहणकर्ताओं को आंशिक अधिकार व राहत देने वाला यह शासनादेश दोहन को नियंत्रित करने के नाम पर 16 अक्टूबर, 2007 को प्रमुख सचिव व आयुक्त (वन एवं ग्राम्य विकास विभाग) द्वारा संशोधित कर दिया गया. नई प्रक्रिया में वन पंचायतों को सिर्फ संग्रहण के अधिकार दिए गए. संग्रहण के बाद यारसा गंबू के विक्रय का कार्य वन विकास निगम, भेषज संघ व कुमाऊं मंडल विकास निगम जैसी सरकारी संस्थाओं को दे दिया गया. वन विकास निगम के क्षेत्रीय प्रबंधक के अनुसार शासनादेश में वन पंचायतों को यारसा गंबू मंडी में लाते ही 45 हजार प्रति किलोग्राम का आधार मूल्य देने का प्राविधान भी रखा गया है. बाकी का धन विक्रेता वन पंचायत को यारसा गंबू की नीलामी के बाद दिया जाता है. सुबुद्वि के अनुसार पिछले साल ऋषिकेश मंडी में चमोली जिले से एकत्र कर लाया गया 1.25 किलो यारसा गंबू  1.76 लाख रु. के भाव से बेचा गया. यह बाजार मूल्य के आधे से भी कम था. 2007 में जब यह शासनादेश जारी किया गया था तो उस समय भी खुले बाजार में यारसा गंबू 2 लाख रुपए किलो बिक रहा था जो अब 4 लाख रुपए प्रति किलो तक पहुंच गया है. यों तो इस संशोधन में ग्रामीण संग्रहकर्ताओं को दिखाने के लिए राहत यह थी कि वे 5000 रु. प्रति किलोग्राम की रॉयल्टी अदा कर अपने द्वारा एकत्र यारसा गंबू को वन पंचायत से प्रमाणित कराने के बाद कहीं से भी बिक्री हेतु रवन्ना (माल परिवहन अधिकार पत्र) प्राप्त कर सकते थे. लेकिन रवन्ना जारी करने के अधिकार वन पंचायतों से छीनकर वापस वन विभाग को देने से यारसा गंबू के बड़े व्यापारियों, माफियाओं और इस काम में मोटी मलाई खा रहे वन व पुलिस अधिकारियों के मजे आ गए. पूरे सीजन में 100-200 ग्राम से अधिकतम एक-डेढ़ किलोग्राम तक यारसा गंबू एकत्र करने वाले सीमांत आम ग्रामीण के लिए सरकारी मशीनरी से रवन्ना हासिल करना खासा मुश्किल काम होता है. माफिया इसका फायदा उठाते हुए बाजार भाव से पांचवें हिस्से से भी कम मूल्य पर ग्रामीणों से यारसा गंबू खरीदते हैं. सरकारी संस्थाएं ग्रामीणों को यारसा गंबू का उचित मूल्य दिलवाने में असफल रही हैं. 2008 में कुमाऊं मण्डल विकास निगम ने मुनस्यारी तहसील की वन पंचायतों से जमा 16.6 किलोग्राम यारसा गम्बू की नीलामी कराई जिसमें 7.9 किलो जड़ी, 1.82 लाख प्रति किलो व 300 ग्राम 1.6 लाख प्रति किलोग्राम की दर से ही बिक सकी जबकि उस साल बाजार मूल्य 3.5 लाख रु. प्रति किलो चल रहा था. कम मूल्य मिलने व पैसा मिलने की कोई समय सीमा न होने के कारण कोई भी ग्रामीण या वन पंचायत सरकारी संस्थाओं को कीड़ा जड़ी देने को तैयार नहीं होती.  मुनस्यारी में फल्याटी वन पंचायत के सरपंच कहते हैं, ‘जब 3.50 से 4 लाख रु. घर बैठे ही मिल रहे हों तो भला कोई नुकसान क्यों उठाएगा?’स्पष्ट नीति न होने और सरकारी संस्थाओं द्वारा कम मूल्य मिलने और बहुमूल्य होने के कारण यारसा गंबू के पूरे कारोबार का जबर्दस्त माफियाकरण हो चुका है. सरकारी संस्थाओं को कीड़ा न देकर व्यापारियों को देने में कई ग्रामीण पकड़े जाते हैं. माफिया ग्रामीणों के हर कदम की मुखबरी करते हैं और मौका लगते ही उन्हें फंसा देते हैं. चमोली के कई गांवों में विदोहन के क्षेत्राधिकार को लेकर ग्रामीणों के बीच बुग्यालों ही में हिंसक संघर्ष भी हो चुके हैं. पिथौरागढ़ जिले के भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र के कुछ व्यवसायियों की हत्या को भी इसके कारोबार से जोड़कर देखा जा रहा है. उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग प्रतिवर्ष औसतन 8-10 लोगों की मृत्यु को यारसा गंबू संग्रहण से जुड़ी दुर्घटनाओं से जोड़कर देखता है. 2006 में धारचूला तहसील के रांथी गांव की पांच महिलाओं व बच्चों की मौत यारसा गंबू ढंूढते हुए खाई में गिरने से हो गई. ऐसे कई उदाहरण हैं.जहां ग्रामीण इसके संग्रहण में अपने स्वास्थ्य व जान का जोखिम ले रहे हैं वहीं छोटे-छोटे स्थानीय व्यापारी सरकारी व्यापारिक संस्थाओं व वन विभाग की जटिल प्रक्रिया से बच कर सीधे व्यापारियों को बेचने के लालच में पुलिस की गिरफ्त में पहुंच रहे हैं. डीडीहाट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कहते हैं, ‘यों तो कानूनन  यारसा गंबू किसी भी दृष्टिकोण से अवैध या प्रतिबंधित सामग्री नहीं है. परन्तु पुलिस यारसा गंबू के मामलों को वन अधिनियम की धाराओं  2 (4) व 4/26 में पंजीकृत करती है और मामले को अधिक जटिल बनाने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 379, 411 भी लगा देती है.’ पिथौरागढ़ के तीन न्यायालयों में 17, चंपावत में सात व बागेश्वर में 5 मामले इस वक्त विचाराधीन हैं. यारसा गंबू से जुडे़ जिन तीन मामलों में अब तक न्यायालयों से निर्णय आए हैं उन सभी में यारसा गंबू के व्यवसाय को वैध मानते हुए अभियुक्तों को बाइज्जत बरी किया गया है. फिर भी पुलिस नए मामले बनाते जा रही है.केंद्र सरकार ने यारसा गंबू पर आयात-निर्यात शुल्क भी निर्धारित नहीं किया है. न ही इसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए कोई प्रक्रिया तय हुई है. पिथौरागढ़ जिले से कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग से ही भारत-चीन व्यापार भी खुला हुआ है. एक बड़ी विडम्बना यह है कि यारसा गंबू का अंतिम बाजार चीन होने के बावजूद इसको चीन-भारत व्यापार के लिए चयनित वस्तुओं की सूची में नहीं रखा गया है.  पास में यात्रा व्यापार मार्ग और बाजार होने के बावजूद भारत के व्यापारियों को अपना माल चोरी-छिपे नेपाल ले जाकर बेचना पड़ता है. पिछले वर्षों तक दिल्ली के खारी-बावली बाजार में चल रही यारसा गंबू की खरीद-फरोख्त भी इस साल वहां के व्यापारियों ने बंद कर दी है. उनका तर्क है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की स्पष्ट नीति न होने के कारण उन्हें भी यह माल चोरी से ही नेपाल पहुंचाना होता है. हालांकि कई स्थानीय व्यापारी यह भी स्वीकारते हैं कि इस कठिनाई के बावजूद मोटे मुनाफे के चलते वे इस कारोबार को छोड़ भी नहीं सकते. कीड़ा जड़ी का काम करने वाले ग्रामीण कहते हैं कि राज्य व केंद्र सरकार की अदूरदर्शिता ने बहुमूल्य यारसा गंबू के व्यापार को ड्रग्स के काले कारोबार की तरह पेचीदा बना दिया है. उधर, दक्षिण-एशिया में यारसा गंबू की सबसे बड़ी अंतर्राष्ट्रीय मंडी में परिवर्तित हो चुके नेपाल में इसके व्यापार की एक स्पष्ट नीति है. वहां की सरकार ने यारसा गंबू को जड़ी-बूटियों के साथ सूचीबद्व करते हुए इस पर 20 हजार रु. प्रतिकिलो की रॉयल्टी निर्धारित की है. धारचूला (पिथौरागढ़) की सीमा से लगे नेपाल के दार्चूला के एक वनाधिकारी बताते हैं, ‘नेपाल सरकार ने चीन-हांगकांग, ताइवान व कोरिया के साथ यारसा गंबू के व्यापार की सहमति तय की है. इस पर निर्यात शुल्क भी तय किया गया है. इसलिए 1992 में 1.50 लाख नेपाली रु. के भाव पर खरीदा-बेचा जा रहा यारसा गंबू नेपाल में आज 10-12 लाख प्रति किलो व चीन-ताइवान में 16-20 लाख रु. प्रति किलो की ऊंचाइयां छू रहा है.’लेकिन उत्तराखंड में हालात इतने अच्छे नहीं हैं. अखिल भारतीय किसान महासभा मुनस्यारी के अध्यक्ष का मानना है कि राज्य सरकार को केंद्र से मिलकर यारसा गंबू के संग्रहण व विपणन की एक सुस्पष्ट राष्ट्रीय नीति बनवानी चाहिए. वे कहते हैं, ‘इसके संग्रहण व व्यापार पर लगने वाले सभी करों, वन रॉयल्टी, वैट व आयात-निर्यात करों का निर्धारण कर इसे चीन-भारत व्यापार में सम्मिलित किया जाना चाहिए. तभी स्थानीय ग्रामीण शोषण व उत्पीड़न से बच सकते हंै. नहीं तो जो यारसा गंबू राज्य के सीमांत क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था के लिए कहीं बड़ा संसाधन बन सकता था वह यहां के लोगों के लिए दहशत व परेशानी का सबब बन गया है.’ भारत के कई हिस्सों में, कैटरपिलर कवक का संग्रह कानूनी है, लेकिन इसका व्यापार अवैध है। पहले नेपाल में यह कीड़ा प्रतिबंधित था, लेकिन बाद में इस प्रतिबंध को हटा दिया गया। कहते हैं कि इसका इस्तेमाल जड़ी-बूटी के रूप में आज से नहीं बल्कि हजारों सालों से किया जा रहा है। नेपाल में तो लोग इन कीड़ों को इकट्ठा करने के लिए पहाड़ों पर ही टेंट लगा लेते हैं और कई दिनों तक वहीं पर रहते हैं। कीड़ा जड़ी एक दुर्लभ और पारंपरिक कवक है जिसका उपयोग पारंपरिक चीनी चिकित्सा और आयुर्वेद में किया जाता रहा है। आम तौर पर, इसका उपयोग शारीरिक सहनशक्ति और कामोत्तेजक क्रिया को उत्तेजित करने के लिए किया जाता है। शारीरिक प्रदर्शन को बढ़ाने के अलावा, यह मधुमेह, हृदय की समस्याओं और यकृत, गुर्दे और फेफड़ों की बीमारियों को ठीक करने में मदद करता है।लाभ और मांग की यह उच्च श्रृंखला भारत में कीड़ा जड़ी की कीमत बढ़ाती है। उच्च औषधीय गुणों से भरपूर उच्च हिमालय की अनूठी कीड़ाजड़ी पर बनी उत्तराखंडी फिल्म ‘यारसा गंबू’ रिलीज होने से पहले ही सुर्खियों में आ गई है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) ने सीमांत दारमा घाटी व पंचाचुली के बुग्यालों में फिल्माई गई इस फिल्म को सांस्कृतिक पहलुओं व प्रासंगिकता को दर्शाने के लिए पोस्ट प्रोडक्शन श्रेणी में स्पेशल मेंशन अवार्ड दिया है।हीं इसका चयन साउथ एशिया की टाप-फाइव फिल्मों में किया है, जो पहली पर्वतीय फिल्म है। इसमें निर्माता ने उच्च हिमालय की दुश्वारियों, कीड़ाजड़ी संग्रहण को रंग्पा समाज के मेहनतकश ग्रामीणों के संघर्ष को बखूबी दर्शाया है। साथ ही उत्तराखंड की इस दुर्लभ हिमालयी संपदा को देश की प्रयोगशालाओं तक पहुंचाने और इसे सीमांत के स्वरोजगार से जोड़ने का संदेश दिया है। हालाँकि, कीड़ा जड़ी को संरक्षित करने के लिए कुछ अनुकरणीय कार्रवाई करना महत्वपूर्ण है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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