*प्रसून जोशी प्रसार भारती के अध्यक्ष नियुक्त* डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला मशहूर गीतकार, कवि, लेखक, पटकथा लेखक, उनकी शख़्सियत के बहुत आयाम हैं । प्रसून जोशी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के दन्या गांव में 16 सितंबर 1968 को हुआ। उनके पिता प्रसून जोशी ने अपना प्रारम्भिक जीवन अल्मोड़ा, उत्तर भारतीय राज्य उत्तराखंड में बिताया था. उनके पिता डी.के. जोशी, एक पीसीएस अधिकारी थे और बाद में राज्य की शिक्षा सेवा के निदेशक बने. ये शुरुआती साल पूरे उत्तर भारत में ही रहे, जैसे -अल्मोड़ा, नैनीताल, यहाँ आज भी उनके रिश्तेदार रहते हैं. इसके बाद इन्होने टिहरी, चमोली गोपेश्वर और बाद में रामपुर, मेरठ और देहरादून जैसी जगहों पर समय बिताया जिससे उन्हें कई अनुभव प्राप्त हुए जो हमें उनके लिरिक्स में देखने को मिलते हैं. इनकी माता का नाम सुषमा जोशी है जो राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर हैं. इनकी माता ने आल इंडिया रेडिओ में लगभग तीन दशकों तक कार्य किया. प्रसून अपने माता – पिता से काफी प्रेरित हैं। उनकी शुरुआती शिक्षा गोपेश्वर और नरेंद्रनगर गढ़वाल में हुई। भौतिकशास्त्र में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट ग़ाज़ियाबाद से मैनेजमेंट की पढ़ाई की। एमबीए करने के बाद प्रसून 1992 में विज्ञापन की दुनिया से जुड़ गए। प्रसून मूल रूप से कवि हैं। 1996 में उनका पहला एलबम ‘अब के सावन आया’ निकला। एमएससी और उसके बाद एमबीए की पढ़ाई के बावजूद हिंदी के प्रति उनका लगाव इन पंक्तियों से समझा जा सकता है – हिन्दी की उँगली पकड़ कर खड़ा हुआ हूँ इसी आँगन की मिट्टी में बड़ा हुआ हूँ पर माँ को धन्यवाद कौन देता है… प्रसून ने एक बार कहा था- प्रकृति अद्भुत है। यह हमें आपको संघर्ष करना सिखाती है। चुनौतियों से निपटने की प्रेरणा देती है। पहाड़ी जीवन जी चुके वह बताते हैं कि जटिल भूगोल वाले पहाड़ का जीवन आसान नहीं होता, मगर पर्वतीय वादियों में अध्यात्म की अनुभूति ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया। यहां से सीखे संघर्ष ने ही उन्हें जीवन जीने की प्रेरणा दी और वह अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमकने लगे। प्रसून को बचपन से ही साहित्य से लगाव रहा है। प्रसून का कहना है कि प्रकृति से प्रेम ही व्यक्ति की रचनात्मकता को धार मिलती है। उनके गीतों में लयात्मकता है, गति है। उन्होंने यह साबित किया कि चालू या वल्गर मुहावरों और फूहड़ता के बिना भी मानवीय संवेदनाओं को झकझोरा जा सकता है। ऐसा उन्होंने फ़िल्म ‘तारे ज़मीन पर’ का गाना ‘तुझे सब है पता मेरी माँ’ लिखकर साबित भी किया, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। 2008 में फ़िल्म फ़ना के गीत ‘चाँद सिफारिश जो करता हमारी’ के लिए भी फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। प्रसून जोशी के गीतों और विज्ञापनों में पहाड़ और प्रकृति का विशेष स्थान रहता है। उन्होंने अपने कई गीतों और विज्ञापनों में पहाड़ का चित्रण करने के साथ ही यहां के परिवेश को संजोया है। कुछ साल पहले अल्मोड़ा में अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा था कि किसी क्षण जब वह अटक जाते हैं तब प्रकृति का सहारा लेकर ही आगे बढ़ते हैं। उनका कहना था कि पहाड़ सबको अपना लेता है और इस अंचल ने उन्हें खुली सोच दी है। राजकुमार संतोषी की फ़िल्म ‘लज्जा’ से उन्हें फ़िल्मों में शुरुआत की। उसके बाद से उन्होंने मौला, ‘ कैसे मुझे तू मिल गई’ ‘तू बिन बताए’, ‘खलबली है खलबली’, ‘सांसों को सांसों’ जैसे मशहूर गाने लिखे। ‘तारे ज़मीन पर’, ‘रंग दे बसंती’, ‘हम तुम’ और ‘फना’ जैसी फ़िल्मों के लिए कई सुपरहिट गाने लिखे हैं. प्रसून ने फ़िल्म लज्जा, आँखें और क्योंकि के लिए संगीत भी दिया। बतौर प्रसून जोशी हवन करेंगे, मस्ती की पाठशाला और ससुराल गेंदा फूल जैसे गीत किसी भी इंसान को थिरकने के लिए मजबूर कर सकते हैं। एमबीए करने के बाद प्रसून ने 10 साल एक कंपनी में काम किया। अभी वे अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापन कंपनी ‘मैकऐन इरिक्सन’ में कार्यकारी अध्यक्ष हैं। इसी कंपनी ने केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी परियोजना ‘मेक इन इंडिया’ और उनके विदेशी कैम्पेन और जिंगल को डिजाइन किया। ‘ठण्डा मतलब कोका कोला’ एवं ‘बार्बर शॉप-ए जा बाल कटा ला’ जैसे प्रचलित विज्ञापनों के कारण उन्हें अन्तरराष्ट्रीय लोकप्रियता मिली।प्रसून जोशी को 2006 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सहयोगी संस्था द्वारा ‘यंग ग्लोबल लीडर’ के ख़िताब से नवाज़ा गया। 2008 में प्रसून को बतौर कान्स ज्यूरी चेयरमैन आमंत्रित किया गया और 2009 में उन्हें कान्स लायन्स अंतर्राष्ट्रीय विज्ञापन महोत्सव में उन्हें 10 सदस्यीय कान्स टाइटेनियम और इंटीग्रेटेड जूरी में नामित किया गया था। प्रसून जोशी 2010 राष्ट्रमण्डल खेलों के शुरुआत और समापन सत्र में श्याम बेनेगल और जावेद अख्तर के साथ तीन सदस्यीय कोर क्रिएटिव सलाहकार समिति में शामिलथे।प्रसून जोशी को दो बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। ये अवार्ड उन्हें तारे जमीं पर और चिटगॉन्ग फ़िल्मों के गीतों के लिए दिया गया है। इसके अलावा दो बार आइफा अवार्ड्स समेत कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। 2015 में कला, साहित्य और एडवरटाइजिंग के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। प्रसून जोशी ने भारतीय पॉप संगीत के क्षेत्र में भी उन्होंने कई हिट एलबम्स दिए। 1999 में ‘अबके सावन’ नाम का गानों का एलबम आया जिसे शुभा मुद्गल ने गाया था और ये बहुत हिट हुआ था। 2000 में शुभा मुद्गल की ही आवाज़ में एलबम आया ‘मन के मंजीरे’ जो महिलाओं के स्वप्नों पर आधारित था। ये एलबम भी बहुत हिट हुआ था। मोहित चौहान के बैंड ‘सिल्क रूट’ के लिए ‘डूबा डूबा रहता हूँ’ भी जोशी की कलम से निकला था जो बहुत हिट रहा। आधुनिक फ़िल्मी गीतों के अटपटे बोल या शब्दों पर प्रसून का कहना है की दर्शक ही इस प्रक्रिया में बदलाव ला सकते हैं। अगर वो ऐसी चीजों को नकार दें तो फिर कौन लिखेगा? प्रसून अपने लेखन में भाषा के प्रति बहुत सतर्क रहते हैं। उनकी भाषा सरल, सुगम्य और सबको समझ में आने वाली होती है। प्रसून का मानना है कि मनोरंजन के लिए आप किसी भी चीज़ से समझौता नहीं कर सकते। प्रसून जोशी एक विलक्षण रचनात्मक प्रतिभा हैं जिन्हें विज्ञापन, साहित्य, कला और सिनेमा जगत में विश्व स्तर पर सराहा जाता है, फिर भी उनका हृदय भारत के लिए धड़कता है। उनके शब्दों में हमारी मिट्टी की सुगंध है और उनकी दृष्टि हमारी संस्कृति के शाश्वत सार को दर्शाती है। उनके नेतृत्व में प्रसार भारती को नई ऊर्जा, गहरा उद्देश्य और एक नई रचनात्मक आवाज मिलेगी। उनके आगामी कार्यकाल के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।’ श्री जोशी इससे पहले अगस्त 2017 से मुंबई स्थित केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत थे।“सीबीएफसी में उनका कार्यकाल रचनात्मक अभिव्यक्ति और नियामक उत्तरदायित्व के प्रति संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है। इससे पहले, वे मैक्कैन वर्ल्ड ग्रुप इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और मैक्कैन वर्ल्ड ग्रुप एशिया पैसिफिक (मैक्कैन एरिक्सन की सहायक कंपनी) के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। वे 2016 से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के न्यासियों में से एक हैं,” मंत्रालय ने एक बयान में कहा।इसमें आगे कहा गया है, “रचनात्मक उद्योगों और सार्वजनिक संचार में अपने व्यापक अनुभव के साथ, श्री जोशी से प्रसार भारती के नेतृत्व में एक अनूठा दृष्टिकोण लाने की उम्मीद है, ऐसे समय में जब सार्वजनिक प्रसारण तीव्र तकनीकी परिवर्तन और विकसित होती श्रोताओं की अपेक्षाओं का सामना कर रहा है।”दिसंबर 2025 में, तत्कालीन प्रसार भारती बोर्ड के अध्यक्ष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











