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संकट में दैवीय फूल ब्रह्मकमल, वाटिका लगाकर संरक्षित करने में जुटे वन एवं पुलिस महकमे

02/09/19
in उत्तराखंड, रुद्रप्रयाग
Reading Time: 1min read
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डा. हरीश चंद्र अन्डोला
शोध तथा आध्यात्मिक यात्रा केदारनाथ बद्रीधाम चोपता तुंगनाथ महादेव यात्रा वर्ष 2019
ब्रह्मकमल ऊँचाई वाले क्षेत्रों का एक दुर्लभ पुष्प है जो कि सिर्फ हिमालय, उत्तरी बर्मा और दक्षिण.पश्चिम चीन में पाया जाता है। धार्मिक और प्राचीन मान्यता के अनुसार ब्रह्म कमल को उत्पत्ति के देवता ब्रह्मा के नाम पर मिला है। इसका वैज्ञानिक नाम साउसिव्यूरिया ओबलावालाटा ;ैंनेेनतमं वइअंससंजंद्ध है। ब्रह्मकमल एस्टेरेसी कुल का पौधा है इसके नजदीकी रिश्तेदार हैं, सूर्यमुखी, गेंदा, गोभी, डहलिया, कुसुम एवं भृंगराज, जो इसी कुल के अन्य प्रमुख पौधे हैं। ब्रह्मकमल कमल की अन्य प्रजातियों के विपरीत पानी में नहीं वरन धरती पर खिलता है।
सामान्य तौर पर ब्रह्मकमल हिमालय की पहाड़ी ढलानों या 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है। इसकी सुंदरता तथा दैवीय गुणों से प्रभावित हो कर ब्रह्मकमल को उत्तराखंड का राज्य पुष्प भी घोषित किया गया है। वर्तमान में भारत में इसकी लगभग 60 प्रजातियों की पहचान की गई है, जिनमें से 50 से अधिक प्रजातियाँ हिमालय के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं। उत्तराखंड में यह विशेषतौर पर पिण्डारी से लेकर चिफला, रूपकुंड, हेमकुण्ड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी, केदारनाथ तक पाया जाता है। भारत के अन्य भागों में इसे और भी कई नामों से पुकारा जाता है जैसै हिमाचल में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर.पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस। साल में एक बार खिलने वाले गुल बकावली को भी कई बार भ्रमवश ब्रह्मकमल मान लिया जाता है। माना जाता है कि ब्रह्मकमल के पौधे में एक साल में केवल एक बार ही फूल आता है जो कि सिर्फ रात्रि में ही खिलता है। दुर्लभता के इस गुण के कारण से ब्रह्म कमल को शुभ माना जाता है। इस पुष्प की मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, जिसने द्रौपदी को इसे पाने के लिए व्याकुल कर दिया था। पिघलते हिमनद और उष्ण होती जलवायु के कारण इस दैवीय पुष्प पर संकट के बादल पहले ही गहरा रहे थे। भक्ति में डूबे श्रद्धालुओं द्वारा केदारनाथ में ब्रह्मकमल का अंधाधुँध दोहन भी इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है।
इसी तरह हेमकुण्ड साहिब यात्रा में भी ब्रह्मकमल को नोचने का रिवाज.सा बन गया है। पूजा.पाठ के उपयोग में आने वाला औषधीय गुणों से युक्त यह दुर्लभ पुष्प तीर्थयात्रीयों द्वारा अत्यधिक दोहन से लुप्त होने की कगार पर ही पहुँच गया है। तीर्थ स्थानों में न सिर्फ प्राकृतिक परिस्थितियों के साथ मनमानी की जा रही है, बल्कि बेशकीमती स्थानीय प्रजातियों को भी नुकसान पहुँचाया जा रहा है। जैसे बद्रीनाथ में गंधमाधन तुलसी की बहुतायत थी। इसी तुलसी का अभिषेक भगवान बद्रीनाथ को किया जाता रहा है, पर अब इसकी माला बनाने से लेकर प्रसाद के रूप में अंधाधुँध तरीके से नोच खसोट कर इसका जो अंधाधुँध दोहन किया जा रहा है, उससे इसकी स्थिति काफी दयनीय हो चली है। इसी प्रकार ब्रह्मकमल जिसे भगवान ब्रह्मा के कमल का नाम दिया गया था, का भी अंधाधुँध दोहन के चलते अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। इनकी कमी के चलते बद्रीधाम मंदिर समिति ने उत्तराखंड सरकार से इनके संरक्षण के लिए गुहार भी लगाई है। इस संकट से उबरने के लिए हिमाचल और उत्तराखंड सरकारों को अब जल्दी ही कोई कदम उठाना पड़ेगा। वन अनुसंधान केंद्र ने राज्य पुष्प ब्रह्मकमल का बीज बैंक तैयार कर लिया है। यह बुग्यालों के दुर्लभ फूलों को बचाने के लिए शुरू की मुहिम के तहत किया गया है। इसके तहत चमोली जिले के रुद्रनाथ औैर मंडल वन प्रभाग में तीन.तीन हेक्टेयर में पौधशाला तैयार हो गई है। इस पौधशाला में फूलों की घाटी के 15 दुर्लभ फूलों की पौध संरक्षित की गई है। वन अनुसंधान केंद्र के मुताबिक अब बुग्याल पर भी शोध की तरफ रुख किया गया है। हिमालय में 3000 मीटर की ऊंचाई से बुग्याल मिलना शुरू होते है। इनमें फूल, जड़ी बूटी और झाड़ियों की प्रजातियां शामिल हैं।
इसकी शुरूआत वन अनुसंधान केंद्र ने विश्व की धरोहर में शामिल चमोली के फूलों की घाटी में पाए जाने वाले राज्य पुष्प ब्रह्मकमल, हत्था जड़ी, ब्लू लिली समेत अति दुर्लभ किस्म के दो दर्जन से ज्यादा प्रजातियों के फूलों को संरक्षित करने से की गई हैं। चमोली जिले के रुद्रनाथ और मंडल रेंज में तीन.तीन हेक्टेयर वन भूमि में 15 किस्म की फूलों का बैंक बनाया गया है। ब्रह्मकमल के वन अनुसंधान केंद्र ने बीज जुटा लिए हैं। अब कोशिश ब्रह्मकमल की जड़ों को रोपने की है। वन अनुसंधान केंद्र के मुताबिक औषधीय गुणों और बुग्यालों की अत्यधिक संवेदनशीलता के कारण इन फूलों के विलुप्त हो जाने का खतरा है। उत्तरकाशी में गंगोत्री व तकनौर रेंजों में भी फूलों का जीन बैंक तैयार किया जाएगा। इस बाबत कैंपा से बजट मांगा गया है। बजट मिलते ही यहां भी काम शुरू हो जाएगा। साथ ही पिथौरागढ़ की मुनस्यारी रेंज में भी मध्य हिमालय में पाई जाने वाले फूलों को संरक्षित करने का काम शुरू होगा। चमोली की रुद्रनाथ और मंडल रेंज सहित पांच स्थानों पर राज्य पुष्प ब्रह्म कमल समेत अति दुर्लभ प्रजाति के फूलों को संरक्षित किया जा रहा है। इस योजना पर काम शुरू हो गया है। केदारनाथ पुलिस चौकी के प्रभारी बिपिन चंद्र पाठक की यह सोच और उनकी टीम के मेहनत से इसे बनाया गया है। प्रधानमंत्री चौकी प्रभारी पाठक से मिलने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें बुलाया गया। उस मुलाकात के बारे में पाठक बताते हैं, प्रधानमंत्री करीब दस मिनट तक हमसे बात करते रहे और ब्रह्मवाटिका के बारे में जानकारी लेते रहे। उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि 11 हजार फीट की ऊंचाई पर ब्रह्मकमल हो सकता है।
पाठक आगे बताते हैं कि प्रधानमंत्री ने ही बताया कि एक ब्रह्मकमल को बाजार में बेचा जाए तो एक लाख से कम नहीं बिकेगा। यह तो अनमोल है। जबकि उस दिन के पहले इसकी जानकारी हम लोगों को नहीं थी। प्रधानमंत्री मोदी इस दौरे पर जाने से पहले ब्रह्मकमल के बारे में और कई जानकारी लेकर गए थे। जिसके बाद केदारनाथ मंदिर के पीछे खाली हुई जगहों पर ब्रह्मकमल का बड़ा उद्यान लगाने का निर्देश प्रधानमंत्री ने दिया है। दरअसल, मंदिर के पीछे अब किसी भी प्रकार के निर्माण पर पूरी तरह से रोक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि मंदिर के पीछे करीब 50 से 70 मीटर की दूरी तक ब्रह्मकमल लगाएं। इसे एक उद्यान के रूप में विकसित करें। जिसमें ब्रह्मकमल के अलावा बुग्याली घास और औषधिय गुण वाले पौधे लगाए जाएं। प्रधानमंत्री ने इस प्रस्तावित उद्यान की भी प्रगति रिपोर्ट अधिकारियों से ली है।
यह उद्यान ब्रह्मवाटिका का विस्तार होगा। अब तक पुलिस की चर्चा सिर्फ नकारात्मक रूप में ही होती रही हैए उत्तराखण्ड पुलिस के जवानों ने अपने एसओ पाठक के नेतृत्व में ब्रह्मवाटिका के रूप में आश्चर्यजनक काम किया है।
केदारनाथ धाम में दूर.दूर तक पेड़.पौधे नजर नहीं आते हैं। वहीं पाठक और उनकी टीम की बनाई ब्रह्मवाटिका देश.दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही है। ब्रह्मवाटिका का निर्माण अगस्त 2015 में किया गया था। 2017 में 09 ब्रह्मकमल खिला। जबकि पिछले साल 44 फूल निकले। वाटिका में ब्रह्मकमल के अलावा भृंगराज, रुद्राक्ष, बुग्याली घास सहित कई अन्य दुर्लभ प्रजातियों के पौधे उगाए गए हैं। बाबा के दर्शन के बाद यात्री ब्रह्मवाटिका देखने अवश्य आते हैं। बिपिन चंद्र पाठक बताते हैंए ष्वाटिका में हमारी पूरी टीम की मेहनत है। ब्रह्मकमल लगाने का विचार इसलिए आया क्योंकि आम फूलों को भगवान पर चढ़ाया जाता हैए लेकिन ब्रह्मकमल ही एक मात्र ऐसा फूल है जिसकी पूजा की जाती है।ष् इस फूल के कई औषधीय उपयोग भी किये जाते हैं। इसके राइज़ोम में एन्टिसेप्टिक होता है। जले.कटे में इसका उपयोग किया जाता है। यदि जानवरों को मूत्र संबंधी समस्या हो तो इसके फूल को जौ के आटे में मिलाकर उन्हें पिलाया जाता है। गर्म कपड़ों में डालकर रखने से यह कपड़ों में कीड़ों को नही लगने देता है। इस पुष्प का इस्तेमाल सर्दी.ज़ुकाम, हड्डी के दर्द आदि में भी किया जाता है। इस फूल की संगुध इतनी तीव्र होती है कि इल्का सा छू लेने भर से ही यह लम्बे समय तक महसूस की जा सकती है और कभी.कभी इस की महक से मदहोशी सी भी छाने लगती है। इसे सुखाकर कैंसर रोग की दवा के रुप में इस्तेमाल किया जाता है। इससे निकलने वाले पानी को पीने से थकान मिट जाती है। साथ ही पुरानी खांसी भी काबू हो जाती है। भोटिया जनजाति के लोग गांव में रोग.व्याधि न होए इसके लिए इस पुष्प को घर के दरवाजों पर लटका देते हैं।

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