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क्या भारत में भी बच्चों के सोशल मीडिया यूज पर लगेगा बैन?

31/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
फिलहाल भारत में बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर केंद्र या राज्य सरकारों का कोई विशेष प्रतिबंध नहीं है। यह पूरी तरह से अभिभावकों (पेरेंट्स) के विवेक पर निर्भर करता है। आंध्र प्रदेश अगर इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो वह भारत का ऐसा पहला राज्य होगा जो बच्चों के डिजिटल जीवन को कानून के दायरे में लाएगा। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार है। देश में हर साल 75 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन की बिक्री होती है। रिसर्च फर्म डाटारिपोर्टल के अनुसार, भारत में एक अरब से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं।50 करोड़ से अधिक यूट्यूब यूजर 40 करोड़ से ज्यादा फेसबुक उपयोगकर्ता 48 करोड़ से अधिक इंस्टाग्राम यूजर आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, इन प्लेटफॉर्म्स पर 75 प्रतिशत से अधिक उपयोगकर्ता कम उम्र के हैं। इस विशाल डिजिटल उपस्थिति के चलते बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माण का विषय बन गया है। देश में तेजी से बढ़ती डिजिटल लत को लेकर केंद्र सरकार ने गंभीर चिंता जताई है। संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि इंटरनेट मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों और किशोरों की बढ़ती निर्भरता उनके मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक प्रदर्शन और सामाजिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। सर्वेक्षण में इस समस्या से निपटने के लिए स्पष्ट नीति हस्तक्षेप, उम्र सत्यापन प्रणाली और ऑनलाइन कंपनियों की जवाबदेही तय करने की सिफारिश कीगईहै। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने रिपोर्ट में कहा है कि डिजिटल लत केवल तकनीकी या कानूनी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और पारिवारिक चुनौती भी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों को डिजिटल निर्भरता से बचाने में परिवारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि कम उम्र के उपयोगकर्ता डिजिटल कंटेंट के नकारात्मक प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इंटरनेट मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग, जुआ एप्स, ऑटो-प्ले वीडियो और लक्षित विज्ञापनों तक बच्चों की आसान पहुंच गंभीर चिंता का विषय बन गई है। रिपोर्ट के अनुसार, छोटे बच्चे और किशोर लंबे समय तक स्क्रीन के संपर्क में रहने के कारण अवसाद, चिंता, ध्यान की कमी और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। पढ़ाई पर ध्यान कम होना और वास्तविक सामाजिक संबंधों में दूरी बढ़ना भी इसके प्रमुख दुष्प्रभावों में शामिल ।सर्वेक्षण में स्पष्ट कहा गया है कि अब यह जिम्मेदारी केवल माता-पिता और स्कूलों तक सीमित नहीं रह सकती। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उपयोगकर्ताओं की उम्र का सटीक सत्यापन हो, बच्चों के लिए डिफॉल्ट रूप से सुरक्षित सेटिंग्स लागू हों, उम्र आधारित कंटेंट फिल्टर अनिवार्य हों, टारगेटेड विज्ञापनों और जुए से जुड़े कंटेंट तक पहुंच सीमित की जाए, रिपोर्ट में उम्र के आधार पर प्लेटफॉर्म एक्सेस सीमित करने की नीति पर गंभीर विचार करने का सुझाव दिया गयाहै। आर्थिक सर्वेक्षण में बच्चों को स्मार्टफोन देने के बजाय वैकल्पिक डिजिटल उपकरणों के उपयोग की सलाह दी गई है। इसमें बेसिक मोबाइल फोन या केवल पढ़ाई के लिए उपयोग किए जाने वाले टैबलेट शामिल हैं, जिनमें कंटेंट फिल्टर और स्क्रीन-टाइम सीमा पहले से निर्धारित हो। इस कदम का उद्देश्य बच्चों को हिंसक, अश्लील या जुए से जुड़े कंटेंट से बचाना है। साथ ही स्कूलों से अपील की गई है कि वे ऑनलाइन शिक्षा पर अत्यधिक निर्भरता कम करें और पारंपरिक शिक्षण विधियों को प्राथमिकता दें। रिपोर्ट में वैश्विक उदाहरणों का भी उल्लेख किया गया है। ऑस्ट्रेलिया और फिनलैंड ने 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध संबंधी कानून लागू किए हैं। फ्रांस की नेशनल असेंबली में भी ऐसा कानून लाने पर सहमति बनी है। ब्रिटेन, डेनमार्क और ग्रीस इस मुद्दे पर व्यापक अध्ययन कर रहे हैं। भारत में भी आंध्र प्रदेश और गोवा जैसे राज्य ऑस्ट्रेलिया के नियामक ढांचे का अध्ययन कर छोटे बच्चों के लिए स्मार्टफोन प्रतिबंध की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इसे सकारात्मक पहल बताया और कहा कि राज्यों में भी जागरूकता बढ़ रही है। हालांकि कुछ टेक विशेषज्ञों और एक्टिविस्टों ने यह चिंता जताई है कि उम्र आधारित प्रतिबंध पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकते। नकली पहचान दस्तावेजों के जरिए सिस्टम को बाइपास करने की आशंका बनी रहती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि कानूनी उपायों के साथ-साथ डिजिटल साक्षरता अभियान भी चलाए जाने चाहिए, ताकि बच्चे और माता-पिता इंटरनेट के सुरक्षित और संतुलित उपयोग को समझ सकें। तकनीकी समाधान के साथ व्यवहारिक और शैक्षणिक पहल भी जरूरी मानी जा रही है। मोटापे के कारण डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। यह समस्या केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी फैल रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आहार सुधार को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। लोगों को संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का निष्कर्ष स्पष्ट है कि डिजिटल लत और मोटापा दोनों ही आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी चुनौतियां हैं, जिनका समाधान केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि नीति और सामाजिक स्तर पर भी किया जाना चाहिए। सरकार ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए सख्त दिशानिर्देश, उम्र सत्यापन प्रणाली और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। साथ ही परिवारों, स्कूलों और समुदायों की भागीदारी को भी इस दिशा में अहम माना गया है। डिजिटल क्रांति ने जहां भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी है, वहीं इसके दुष्प्रभाव अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण की चेतावनी बताती है कि यदि समय रहते संतुलित और सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर सकती है। डिजिटल सशक्तिकरण और डिजिटल अनुशासन के बीच संतुलन ही भविष्य की कुंजी होगी। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि मोटापा खतरनाक दर से बढ़ रहा है और आज भारत में एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। सर्वेक्षण में इस बात पर जोर दिया गया है कि लोगों को अपने आहार में सही पोषण का सेवन करने पर ध्यान देना चाहिए और आहार संबंधी सुधारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में लेना चाहिए।रिपोर्ट के अनुसार, अस्वास्थ्यकर आहार, गतिहीन जीवनशैली, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन और पर्यावरणीय कारकों के चलते मोटापा सभी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है और डायबिटीज, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा रहा है।इससे शहरी और ग्रामीण, दोनों आबादी प्रभावित हो रही है। 2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुषों का वजन मानक से ज्यादा है। 2020 में 3.3 करोड़ बच्चे मोटापे का शिकार थे, जो 2035 तक 8.3 करोड़ पहुंचने का अनुमान है। हेल्थ सप्लीमेंट्स के अंधाधुंध इस्तेमाल को लेकर भी जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। आंध्र प्रदेश भारत का पहला राज्य है जो इस तरह के सोशल मीडिया प्रतिबंध पर विचार कर रहा है। गोवा भी अब इसी तरह के प्रतिबंध पर चर्चा कर रहा है। विभिन्न देशों में समय-समय पर किए गए कदमों और नीतियों से डिजिटल लत के प्रभाव को कम किया जा सकता है। यदि समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए, तो इन हानिकारक आदतों को रोका जा सकता है, जिससे बच्चों और युवाओं का मानसिक और सामाजिक विकास सुरक्षित रह सके। भारत के लिए चुनौती दुनिया के सबसे बड़े और सबसे जटिल इंटरनेट बाजारों में से एक में बाल सुरक्षा, डिजिटल अधिकार, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और प्रवर्तनीयता के बीच संतुलन स्थापित करने में निहित है। बच्चों आदर्शों पर अग्रसर हों।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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