• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

भक्ति आंदोलन के प्रसिद्ध संत थे गुरु रविदास, समानता का दिया था संदेश

31/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
7
SHARES
9
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
हमारा देश साधु-संतों और ऋषि-मुनियों की धरती है। यहां अनेक महान संतों ने जन्म लेकर भारतभूमि को धन्य किया है। इन्‍हीं में से एक नाम महान संत रविदास जी का है। संत रविदास बहुत ही सरल हृदय के थे और दुनिया का आडंबर छोड़कर हृदय की पवित्रता पर बल देते थे। हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ पूर्णिमा के दिन ही रविदास जयंती मनाई जाती है।मध्यकालीन कवि, समाज सुधारक संत रविदास जी का जन्म यूपी के वाराणसी में 16 फरवरी 1398 ई० को हुआ था। वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि उनका जन्म 1450 ई० में हुआ। हालांकि एक बात पर सभी इतिहासकार सहमत हैं कि संत रविदास जी का जन्म माघ पूर्णिमा को हुआ था। इसी कारण उनकी जयंती माघ पूर्णिमा को मनाई जाती है। उन्होंने दोहों और उपदेशों के माध्यम से जाति आधारित सामाजिक भेदभाव के खिलाफ संदेश दिया।संत रविदास जी परमेश्वर कबीर जी के समकालीन थे। संत रविदास जी का जन्म भारत के उत्तर प्रदेश के बनारस (काशी) में चंद्रवंशी (चंवर) चर्मकार जाति में हुआ था ।संत रविदास जी के पिता का नाम संतोष दास और माता जी का नाम कलसा देवी था। जिस दिन रविदास जी का जन्म हुआ उस दिन रविवार था इस कारण उन्हें रविदास कहा गया। रविदास जी चर्मकार कुल में पैदा होने के कारण जीवन निर्वाह के लिए अपना पैतृक कार्य किया करते थे तथा कबीर साहेब जी के परम भक्त होने के नाते सतभक्ति भी करते थे। संत रविदास जी जूते बनाने के लिए जीव हत्या नहीं किया करते थे बल्कि मरे हुए जानवरों की खाल से ही जूते बनाया करते थे। सतभक्ति करने वाला साधक इस बात का खास ध्यान रखता है कि उसके कारण किसी जीव को कभी कोई हानि या दुख न पहुंचे। चमार जाति में पैदा होने के कारण संत रविदास जी को ऊंच-नींच, छुआछूत, जात-पात का भेदभाव देखने को मिला। संत रविदास जी ने समाज में व्याप्त बुराईयों जैसे वर्ण व्यवस्था, छुआछूत और ब्राह्मणवाद , पाखण्ड पूजा के विरोध में अपना स्वर प्रखर किया है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल माघ पूर्णिमा के दिन रविदास जयंती मनाई जाती है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन गुरु रविदास का जन्म हुआ था। जातिवाद के खिलाफ किए गए प्रयासों के कारण उन्हें आध्यात्मिक व्यक्ति के साथ एक समाज सुधारक के रूप में भी याद किया जाता है। संत रविदास जी का जन्म वाराणसी के एक गांव में हुआ था। मोची परिवार में जन्मे रविदास जी को लोग संत रविदास, गुरु रविदास, रैदास और रोहिदास जैसे कई नामों से जानते हैं। गुरु रविदास संत एक महान कवि होने के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने जीवन काल में समाज में फैली कई बुराईयों और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने समाज की उन्नति के लिए कई महत्वपूर्ण योगदान भी दिए हैं जो सराहनीय हैं। यही कारण है कि हर साल गुरु रविदास जयंती को बडे़ ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। 15वीं शताब्दी में रविदास जी द्वारा लिखे गए दोहे आज भी लोगों को प्रेरणा देने का काम करते हैं। संत रविदास जी ने समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। भक्ति और ज्ञान के लिए ही उनका जीवन समर्पित रहा है। , जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरूप रूढ़ियों एवं आडम्बरों में जकड़ा एवं अधंकारमय था तब संत गुरु रविदास एक रोशनी बनकर समाज को दिशा दी। वे अध्यात्म की सुदृढ़ परम्परा के संवाहक थे। वे ईश्वर को पाने का एक ही मार्ग जानते थे और वो है ‘भक्ति’, इसलिए तो उनका एक मुहावरा आज भी बहुत प्रसिद्ध है कि, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’। हर जाति, वर्ग, क्षेत्र और सम्प्रदाय का सामान्य से सामान्य व्यक्ति हो या कोई विशिष्ट व्यक्ति हो -सभी में विशिष्ट गुण खोज लेने की दृष्टि उनमें थी। गुणों के आधार से, विश्वास और प्रेम के आधार से व्यक्तियों में छिपे सद्गुणों को वे पुष्प में से मधु की भाँति उजागर करने में सक्षम थे। परस्पर एक-दूसरे के गुणों को देखते हुए, खोजते हुए उनको बढ़ाते चले जाना रविदासजी के सर्वधर्म समभाव या वसुधैव कुटुम्बकम् के दर्शन का द्योतक है। संत शिरोमणि गुरु रविदासजी एक महान संत और समाज सुधारक थे। भक्ति, सामाजिक सुधार, मानवता के योगदान में उनका जीवन समर्पित रहा।रविदासजी के जन्म को लेकर कई मत हैं। लेकिन रविदासजी के जन्म पर एक दोहा खूब प्रचलित है- ‘चौदस सो तैंसीस कि माघ सुदी पन्दरास, दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री गुरु रविदास- इस पंक्ति के अनुसार गुरु रविदास का जन्म माघ मास की पूर्णिमा को रविवार के दिन 1433 को हुआ था। इसलिए हर साल माघ मास की पूर्णिमा तिथि को रविदास जयंती के रूप में मनाया जाता है जोकि इस वर्ष 24 फरवरी 2024 को है। रैदास पंथ का पालन करने वाले लोगों में रविदास जयंती का एक विशेष महत्व है। रविदासजी का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी के गोवर्धनपुर गाँव में एक मोची परिवार में हुआ था। वे कबीरजी के समकालीन थे और अध्यात्म, धर्म, समाज-व्यवस्था पर कबीरजी के साथ उनके कई संवाद उपलब्ध हैं। मध्यकाल की प्रसिद्ध संत मीराबाई भी रविदासजी को अपना आध्यात्मिक गुरु मानती थीं। रविदासजी ने लोगों को एक नई राह दिखाई कि घर-गृहस्थी में रहकर और गृहस्थ जीवन जीते हुए भी शील-सदाचार और पवित्रता का जीवन जिया जा सकता है तथा आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त किया जा सकता है। अपनी सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद भी रविदासजी भक्ति आंदोलन, हिंदू धर्म में भक्ति और समतावादी आंदोलन में एक प्रमुख पुरोधा पुरुष के रूप में उजागर हुए। 15 वीं शताब्दी में रविदास जी द्वारा चलाया गया भक्ति आंदोलन उस समय का एक बड़ा आध्यात्मिक आंदोलन था।धर्म के वास्तविक स्वरूप को उजागर करने, भक्ति और ध्यान में गुरु रविदास का जीवन समर्पित रहा। उन्होंने भक्ति के भाव से कई गीत, दोहे और भजनों की रचना की। पवित्रता, मानवीयता, आत्मनिर्भरता, सहिष्णुता और एकता उनके मुख्य धार्मिक संदेश थे। हिंदू धर्म के साथ ही सिख धर्म के अनुयायी भी गुरु रविदास के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। यही कारण है कि रविदासजी की 41 कविताओं को सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव ने पवित्र ग्रंथ आदिग्रंथ या गुरुग्रंथ साहिब में शामिल कराया था। वे समाज सुधारक थे, तत्कालीन रूढियों, आडम्बरों एवं दुराचारों को समाप्त कर स्वस्थ समाज संरचना करने में भी उनका विशेष योगदान रहा। इन्होंने समाज से जातिवाद, भेदभाव और समाजिक असमानता के खिलाफ जनजागृति का वातावरण निर्मित कर समाज को समानता और न्याय के प्रति प्रेरित किया। गुरु रविदासजी ने शिक्षा के महत्व पर जोर दिया और अपने शिष्यों को उच्चतम शिक्षा पाने के लिए प्रेरित किया।रविदासजी एक सिद्ध एवं अलौकिक संत थे। एक कथा के अनुसार रविदासजी बचपन में अपने साथियों के साथ खेल रहे थे। उनमें से एक साथी अगले दिन खेलने नहीं आता है तो रविदासजी उसे ढूंढ़ते हुए उसके घर तक पहुंच जाते हैं। उसकी मृत्यु हो गई और वे मृत शरीर को देखकर बहुत दुखी होते हैं और अपने मित्र को बोलते हैं कि उठो ये समय सोने का नहीं है, मेरे साथ खेलो। इतना सुनकर उनका मृत साथी खड़ा हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संत रविदासजी को बचपन से ही आलौकिक शक्तियां प्राप्त थी। लेकिन जैसे-जैसे समय निकलता गया उन्होंने अपनी शक्तियों को भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाई। इस तरह धीरे-धीरे लोगों का भला करते हुए वे जन-जन के प्रिय अलौकिक संत बन गए।संत गुरु रविदास ने स्वयं को ही पग-पग पर परखा और निथारा। स्वयं को भक्त माना और उस परम ब्रह्म परमात्मा का दास कहा। वह अपने और परमात्मा के मिलन को ही सब कुछ मानते। शास्त्र और किताबें उनके लिये निरर्थक और पाखण्ड था, सुनी-सुनाई तथा लिखी-लिखाई बातों को मानना या उन पर अमल करना उनको गंवारा नहीं। इसीलिये उन्होंने जो कहा अपने अनुभव के आधार पर कहा, देखा और भोगा हुआ ही व्यक्त किया, यही कारण है कि उनके दोहे इंसान को जीवन की नई प्रेरणा देते थे। रविदासजी शब्दों का महासागर हैं, ज्ञान का सूरज हैं। उनके बारे में जितना भी कहो, थोड़ा है, उन पर लिखना या बोलना असंभव जैसा है। सच तो यह है कि बूंद-बूंद में सागर है और किरण-किरण में सूरज। उनके हर शब्द में गहराई है, सच का तेज और ताप है।संत गुरु रविदास सर्वधर्म सद्भाव के प्रतीक थे, साम्प्रदायिक सद्भावना एवं सौहार्द को बल दिया। उनको हिन्दू के अलावा अन्य संप्रदायों में बराबर का सम्मान प्राप्त था। उन्होंने मानव चेतना के विकास के हर पहलू को उजागर किया। श्रीकृष्ण, श्रीराम, महावीर, बुद्ध के साथ-ही-साथ भारतीय अध्यात्म आकाश के अनेक संतों-आदि शंकराचार्य, नानक, रैदास, मीरा आदि की परंपरा में रविदासजी ने भी धर्म की त्रासदी एवं उसकी चुनौतियों को समाहित करने का अनूठा कार्य किया। जातिवाद एवं सम्प्रदायवाद के खिलाफ वातावरण बनाया। जीवन का ऐसा कोई भी आयाम नहीं है जो उनके दोहों-विचारों से अस्पर्शित रहा हो। अपनी कथनी और करनी से मृतप्रायः मानव जाति के लिए रविदासजी ने संजीवनी का कार्य किया। इतिहास गवाह है, इंसान को ठोंक-पीट कर इंसान बनाने की घटना रविदासजी के काल में, रविदासजी के ही हाथों, उनकी रचनाओं-विचारों एवं कार्यो से हुई। शायद तभी रविदासजी कवि मात्र ना होकर युगपुरुष और युगस्रष्टा कहलाए। न तो किसी शास्त्र विशेष पर उनका भरोसा रहा और ना ही उन्होंने जीवन भर स्वयं को किसी शास्त्र में बाँधा। रविदासजी ने समाज की दुखती रग को पहचान लिया था। वे जान गए थे कि हमारे सारे धर्म और मूल्य पुराने हो गए हैं। नई समस्याएँ नए समाधान चाहती हैं। नए प्रश्न, नए उत्तर चाहते हैं। नए उत्तर, पुरानेपन से छुटकारा पाकर ही मिलेंगे।संत गुरु रविदास ने धरती और धरती के लोगों की धड़कन को सुना। धड़कनों के अर्थ और भाव को समझा। इन धड़कनों को वे जितना आत्मसात करते चले, उतना ही उनका जीवन ज्ञान एवं संतता का ग्रंथ बनता गया। यह जीवन ग्रंथ शब्दों और अक्षरों का जमावड़ा मात्र नहीं, बल्कि इसमें उन सच्चाइयों एवं जीवन के नए अर्थों-आयामों का समावेश है, जो जीवन को शांत, सुखी एवं उन्नत बनाने के साथ-साथ जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं। उनके अनुभवों और विचारों ने एक नई दृष्टि प्रदान की। इस नई दृष्टि को एक नए मनुष्य का, एक नए जगत का, एक नए युग का सूत्रपात कहा जा सकता है।

पूजिए चरण चंडाल के जो होने गुण प्रवीण
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात
हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा
रैदास प्रेम नहिं छिप सकई, लाख छिपाए कोय।
प्रेम न मुख खोलै कभऊँ, नैन देत हैं रोय॥
करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस
कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास
रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच
नकर कूं नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच
रविदास जी द्वारा 15 वीं शताब्दी में चलाया गया भक्ति आंदोलन उस समय का एक बड़ा आध्यात्मिक आंदोलन साबित हुआ। इस आंदोलन ने समाज में कई बड़े बदलाव लाने का काम किया। उन्होंने अपने जीवन में कई गीत, दोहे और भजनों की रचना की जो मानव जाति को आत्मनिर्भरता, सहिष्णुता और एकता का संदेश देने का काम करते हैं।इन्होंने समाज से जातिवाद, भेदभाव और सामाजिक असमानता के भाव को हटाकर भाईचारे और सहिष्णुता का भाव अपनाने के संदेश दिया। गुरु रविदास जी ने शिक्षा के विशेष जोर दिया। प्रसिद्ध संत मीराबाई भी रविदास जी को अपना आध्यात्मिक गुरु मानती थीं। सिर्फ हिंदू धर्म के ही नहीं, बल्कि सिख धर्म को मानने वाले लोग भी गुरु रविदास के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। इस बात का पता इसी से लगाया जा सकता है कि रविदास जी की 41 कविताओं को सिखों के पवित्र ग्रंथ यानी गुरुग्रंथ साहिब में शामिल किया गया है। संत रविदास जी अपना अधिकांश समय भगवान की पूजा में लगाते थे और धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए, उन्होंने एक संत का दर्जा प्राप्त किया। ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ रविदास जी का ये दोहा आज भी प्रसिद्ध है। रविदास जी का कहना था कि शुद्ध मन और निष्ठा के साथ किए काम का हमेशा अच्छा परिणाम मिलता है। संत रविदास ने देश में फैले ऊंच-नीच के भेदभाव और जाति-पात की बुराईयों को दूर करते हुए भक्ति भावना से पूरे समाज को एकता के सूत्र में बांधने का काम किया था।।मन चंगा तो कठौती में गंगा, यह वाक्य तो आपने सुना ही होगा। इस वाक्य को संत शिरोमणि रविदास जी के द्वारा कहा गया है। वे जात-पात के विरोधी थे। इसलिए उन्होंने लिखा, “जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात, रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।” गुरु रविदास जी ने समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने, अमीर-गरीब का अंतर कम करने, कर्म के आधार पर व्यक्ति को सम्मान देने, नशा की प्रवृति से दूर रहने और संस्कार व संस्कृति के विकास पर जोर दिया था।धरती पर प्रत्येक युग में ऋषि मुनियों, संतों, महंतों, कवियों और महापुरुषों का आवागमन होता रहा है। लोगों में भक्तिभाव जीवित रखने के लिए महापुरुषों का विशेष योगदान रहा है। इन महापुरुषों ने समाज सुधारक का कार्य करते हुए संसार के लोगों में भक्तिभाव बढ़ाने, श्रद्धा और विश्वास जगाने का काम किया है। ईश्वर में इनके अटूट भक्तिभाव को देखकर लोगों के अन्दर भी आस्था और श्रद्धा जागृत होती है। ऐसे ही एक महापुरुष संत रविदास जी हुए हैं। जिन्होंने खुद पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी की सतभक्ति की और संसार को सतभक्ति के बारे में बताया। संत रविदास जी की विचारधारा से प्रभावित होकर लोग इन्हें अपना गुरु तो मान लेते है परंतु उनके दिखाए मार्ग पर चलते नहीं हैं। संतों के दिखाए सतमार्ग पर चलकर ही हम अपने जीवन और समाज की विचारधारा को बदल सकते हैं। रविदासजी भारत की उज्ज्वल गौरवमयी संत परंपरा में सर्वाधिक समर्पित एवं विनम्र संत हैं। वे गुरुओं के गुरु थे, उनका फकडपन और पुरुषार्थ, विनय और विवेक, साधना और संतता, समन्वय और सहअस्तित्व की विलक्षण विशेषताएं युग-युगों तक मानवता को प्रेरित करती रहेगी।।लेखक दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

Share3SendTweet2
Previous Post

कोटद्वार में विकास और प्रकृति संरक्षण का संगम, मुख्यमंत्री ने बर्ड वाॅचिंग फेस्टिवल का किया शुभारंभ

Next Post

क्या भारत में भी बच्चों के सोशल मीडिया यूज पर लगेगा बैन?

Related Posts

उत्तराखंड

प्रदेश में कांग्रेस की मजबूती का आधार है समर्पित कार्यकर्ता: उनियाल

May 2, 2026
6
उत्तराखंड

दो दिवसीय लाटू देवता जागृति पर्यटन सांस्कृतिक महोत्सव का रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ समापन

May 2, 2026
4
उत्तराखंड

बैसाख पूर्णमासी के मौके पर वांण स्थित श्री नंदादेवी के मुंहबोले भाई लाटू देवता के विधिवत कपाटों उद्घाटन के आयोजन दो दिवसीय लाटू देवता जागृति पर्यटन सांस्कृतिक महोत्सव का रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ समापन हो गया हैं। शुक्रवार को कपाटों उद्घाटन के बाद वांण बस स्टेशन में आयोजित दो दिवसीय महोत्सव की प्रथम रात्रिकालीन सांस्कृतिक संध्या का उद्घाटन चमोली जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत सिंह बिष्ट ने बतौर मुख्य अतिथि करते हुए आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि निश्चित ही महोत्सव के दौरान प्रस्तुत किए गए लोक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का लाभ भावी पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति को जानने एवं समझने में अहम भूमिका निभाएंगी, अध्यक्ष ने महोत्सव के विकास के लिए हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।इस मौके पर भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्य मंत्री बलवीर घुनियाल,देवाल के प्रमुख तेजपाल रावत, जिला पंचायत सदस्य उर्मिला बिष्ट, साक्षी देवी,गुवीला के नरेंद्र बिष्ट व फल्दियागांव के खिलाप बिष्ट दोनों ही देहरादून में सफल व्यवसाई के अलावा मंदोली के पूर्व प्रधान आनंद बिष्ट व भाजपा मंडल महामंत्री दर्शन दानू बतौर विशिष्ट अतिथियों ने भी आयोजन की सराहना करते हुए आयोजन को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग देने का आश्वासन दिया। इस मौके पर प्रसिद्ध गायककार मीणाल रतूड़ी के द्वारा प्रस्तुत हे नंदा सुनंदा श्रोण, भादों की जात…, देवराज आगरी की प्रस्तुति चार दिन चौमास लगी रो, फिर लगल हिवाल…, विवेक नौटियाल की प्रस्तुति दौय लगी ऊंचा कैलाश…, कुंदन सिंह की प्रस्तुति लाटू देवता तुम दैणा होई जाय आदि गीतों के गायन पर उपस्थित जनसमूह जमकर थिरका। महोत्सव के दूसरे दिन भी जमकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही समापन मौके पर आयोजकों ने अगले वर्ष महोत्सव को और अधिक भव्य रूप से आयोजित करने का संकल्प लिया। इस मौके पर मेला कमेटी के अध्यक्ष कृष्णा बिष्ट पूर्व जिला पंचायत सदस्य एवं मेला कमेटी के संरक्षक कृष्णा बिष्ट, वांण की ग्राम प्रधान नंदूली देवी, क्षेत्र पंचायत सदस्य हेमा देवी,उप प्रधान बीना देवी, महिला मंगल दल अध्यक्ष नंदी देवी, सीमा पहाड़न आदि ने अतिथियों का स्वागत किया।

May 2, 2026
3
उत्तराखंड

केदारनाथ–लिंचोली मार्ग पर कठिन हालात में श्रद्धालुओं के लिए जीवनरक्षक बनी एसडीआरएफ

May 2, 2026
5
उत्तराखंड

आपरेशन घर वापसी-दो नाबालिगों को हरिद्वार से बरामद कर घरवालों को सौंपा

May 2, 2026
3
उत्तराखंड

सीएम घोषणाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन के लिए मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को दिये निर्देश

May 2, 2026
5

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67682 shares
    Share 27073 Tweet 16921
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45776 shares
    Share 18310 Tweet 11444
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38051 shares
    Share 15220 Tweet 9513
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37442 shares
    Share 14977 Tweet 9361
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37330 shares
    Share 14932 Tweet 9333

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

प्रदेश में कांग्रेस की मजबूती का आधार है समर्पित कार्यकर्ता: उनियाल

May 2, 2026

दो दिवसीय लाटू देवता जागृति पर्यटन सांस्कृतिक महोत्सव का रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ समापन

May 2, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.