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उत्‍तराखंड में मंदाकिनी नदी का सीना चीर रहे खनन माफिया जिम्मेदार मौन

17/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखण्ड सरकार भले ही अवैध खनन पर सख्ती के बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर सवाल खड़े करती है. उत्त्तराखंड खनन विभाग के अनुसार राज्य में खनन गतिविधियां मुख्य रूप से दो श्रेणियों में संचालित होती हैं. पहली, नदी तल खनन जिसके तहत नदियों से बालू, रेत और गिट्टी का निष्कर्षण किया जाता है. दूसरी, इन-सीटू ओपन कास्ट माइनिंग जिसमें पहाड़ी और स्थलीय क्षेत्रों से सीधे खनिजों का खनन होता है, जैसे सोपस्टोन, मैग्नेसाइट और सिलिका सैंड. उत्तराखंड खनन विभाग के मुताबिक राज्य में प्रमुख खनिजों में मैग्नेसाइट, लाइमस्टोन और अन्य माइनर मिनरल्स शामिल हैं. केदारघाटी में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भी अवैध खनन का खेल बदस्तूर जारी है. मंदाकिनी नदी किनारे खनन माफिया खुलेआम नदी का सीना चीरते नजर आ रहे हैं, जबकि जिम्मेदार विभाग इस पर कार्रवाई करने के बजाय मूकदर्शक बने हुए हैं. केदारघाटी के जगह-जगह खनन का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है. साल 2013 की आपदा में जिन स्थानों में तबाही मची थी, आज उन्हीं स्थानों पर खान विभाग ने चुगान और खनन की अनुमति दे दी है. ऐसे में जहां इन बस्तियों को भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है, वहीं राजमार्ग और लिंक मार्गों से सटे पुलों के कमजोर होने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. वहीं खनन विभाग ने खनन पट्टे आवंटित किए हैं, जिसकी आड़ में अवैध खनन किया जा रहा है.केदारघाटी के गंगानगर पुल से कुछ ही दूरी पर राजमार्ग से सटे क्षेत्र में इन दिनों जोरों पर खनन किया जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि एक ओर जहां राजमार्ग और पुल की सुरक्षा को लेकर कार्य चल रहा है, वहीं दूसरी ओर उसी क्षेत्र में नदी के बीचों-बीच भारी मशीनों से खनन किया जा रहा है. सामाजिक कार्यकर्ता ने आरोप लगाया कि खनन विभाग की बड़ी लापरवाही के चलते एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि साल 2013 की भीषण आपदा के बाद भी प्रशासन और जिम्मेदार विभागों ने कोई सबक नहीं लिया है. जिस मंदाकिनी नदी ने उस आपदा में भयंकर तबाही मचाई थी, उसी नदी के साथ दोबारा छेड़छाड़ भविष्य में बड़े खतरे को न्यौता दे सकती है. उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन और खान विभाग केदारघाटी को खतरे में डाल रहा है. प्रकृति के साथ यह खिलवाड़ भविष्य में भारी पड़ सकता है. राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के अनुसार अवैध खनन रोकने के लिए सख्त दूरी (जैसे पुलों से 300 मीटर, तटों से 100 मीटर) और पर्यावरण मंजूरी (इसी) के नियमों का पालन करने का निर्देश देता है, जिससे नदियों के पुनर्जीवन और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखा जा सके. उन्होंने कहा कि पुलों और आपदाग्रस्त इलाकां के आस-पास खनन का कार्य भविष्य के लिए घातक हो सकता है. यहां आसपास पांच वर्ष की अवधि के लिए खनन पट्टा दिया जाना, नुकसानदायक बन सकता है. केदारघाटी में अधिक मात्रा में खनन हो रहा है, जिससे जलीय जीव जंतुओं के अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा है. केदारघाटी आपदा की दृष्टि से जोन फाइव में आता है. यहां प्रकृति के साथ खिलवाड़ा भविष्य के लिए अशुभ संकेत है.लगातार बढ़ने वाले इस खनन से राज्य की नदियों और इन नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका क्या असर होगा इस ओर सरकार का कोई ध्यान नहीं जाता है, खनन के बाद नदियों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने के लिए सम्बंधित विभाग के पास कोई नदी विशेषज्ञ तक नहीं है।नदियों के अंदर पाये जाने वाले प्रत्येक मिनरल का अपना महत्त्व होता है जैसे- रेत बरसात के समय पानी को सोखता है और ग्राउंड वॉटर को रिचार्ज करने का कार्य करता है, बड़े बोल्डर से नदी का पानी टकराने से पानी के अंदर ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है जो नदी में रहने वाले जीवों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है और नदी का बहाव भी नियंत्रित होता है। लेकिन यदि नदियों से अधिक मात्रा में इन मिनरल को निकला जाता है तो इससे नदी तंत्र प्रभावित होता है जो कहीं न कहीं पर्यावरण के लिए हानिकारक है। खनन प्रकृति के अतिरिक्त स्थानीय लोगों के लिए भी खतरा बनता जा रहा है, कई बार तो खनन के लिए किये गए गड्ढो में डूब कर लोगो की जाने भी गयी हैं। हमारी सरकारों को केवल आय के स्रोत के रूप में नदियों को न देखते हुए नदियों के प्राकृतिक महत्त्व की ओर भी ध्यान देना चाहिए। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार सांसद द्वारा संसद में अवैध खनन और सड़क सुरक्षा का मुद्दा उठाने पर राज्य में उनकी पार्टी की सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।जन सुरक्षा को होने वाले खतरों को उजागर करते हुए अवैध रूप से खनन किए गए पदार्थों को ले जाने वाले तेज रफ्तार वाहनों की निगरानी के लिए केंद्र सरकार से एक विशेष कार्यबल गठित करने की मांग की है। उन्होंने कहा, “हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल और उधम सिंह नगर जिलों में अवैध खनन में शामिल ट्रक रात में चल रहे हैं। यह कानून और पर्यावरण के लिए खतरा बनता जा रहा है। इससे आम लोगों की सुरक्षा भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है। यह देखा गया है कि राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, खनन माफिया द्वारा रात में ट्रकों का अवैध संचालन जारी है। इन ट्रकों में अत्यधिक माल लादा जाता है। खनिजों का परिवहन बिना किसी अनुमति के किया जा रहा है। अवैध गतिविधियों के कारण राज्य में सड़कों और पुलों का बुनियादी ढांचा भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो रहा है।” सांसद हरिद्वार ने न सिर्फ अवैध खनन पर अपनी चिंता जाहिर, बल्कि उत्तराखंड में किस तरह से प्रशासन की मिली भगत से अवैध खनन कर नदियों का सीना चीरा जा रहा है, उसका भी जिक्र किया ने सदन में जिस तरह के अवैध खनन का मुद्दा उठाया, उसने शासन-प्रशासन के दावों पर सवाल जरूर खड़े किए है, जिसमें प्रशासन अवैध खनन पर लगाम लगाने की बात करता है.  उत्तराखंड में सरकार को नदियों, जंगलों और तमाम दूसरे स्थलों से अवैध खनन का वह सब कुछ दृश्य नजर नहीं आता, जिसकी शिकायत लगातार पर्यावरण प्रेमी और खनन स्थल के आसपास रहने वाले लोग करते रहते हैं। विभागों की छापेमारी होती है, जुर्माने लगते हैं, वाहन पकड़े जाते हैं, पट्टे सस्पेंड होते हैं, लॉट सीज होते हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अवैध गतिविधियां थम क्यों नहीं रही? राजस्व की यह बढ़ोतरी सराहनीय है, लेकिन क्या यह पर्यावरण और नियमों की कीमत पर हो रही है? प्रशासन की इन ताजा और लगातार कार्रवाइयों का स्वागत है, लेकिन सरकार और प्रशासन से उम्मीद है कि राजस्व के साथ-साथ अवैध खनन माफिया पर पूर्ण, लगातार और निर्णायक अंकुश लगेगा, ताकि हिमालयी राज्य की नाजुक पारिस्थितिकी सुरक्षित रहे.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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