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लोकरत्न गुमानी, जिन्हें आदिकवि का संम्मान तक नहीं मिल पाया

17/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
लोकरत्न ‘गुमानी’ पन्त की जन्मजयंती की तिथि है। अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार लोककवि गुमानी पंत की जन्मजयंती की तिथि निर्धारित करना भी कुछ कठिन कार्य रहा है। कुछ लोग गुमानी जी की जन्म तिथि फरवरी, 1790 में मानते हैं। देवीदत्त पांडे द्वारा संकलित गुमानी काव्य संग्रह की भूमिका में दी गई सूचना के अनुसार लोकरत्न गुमानी पंत का जन्म “श्रीमद्विक्रमीय संवत् 1847, कुम्भार्क गते 27, बुधवार” के दिन अर्थात् फागुन 27 पैट को हुआ था। जन्म कुंडली के इस विवरण के अनुसार गुमानी जी की जन्मतिथि 10 मार्च,1790 निर्धारित होती है।लोकरत्न ‘गुमानी’ मूल रूप से उपराड़ा गाँव, गंगोलीहाट जनपद, पिथौरा गढ़ के निवासी थे। इनके पूर्वज चंद्रवंशी राजाओं के राज्य वैद्य रहे थे।गुमानी जी संस्कृत के उद्भट विद्वान होने के साथ ही कुमाउंनी, नेपाली, हिन्दी और उर्दू के भी सशक्त लेखक थे। उन्होंने हिन्दी, कुमाऊनी, नेपाली और संस्कृत में रचनाएँ लिखीं थीं।’गुमानी’ भारत के पहले ऐसे बहुभाषा-काव्य के सर्जक लोककवि थे जिनकी कविता का पहला पद हिन्दी में, दूसरा कुमाऊनी, तीसरा नेपाली और चौथा संस्कृत में होता था। राजकवि के रूप में गुमानी सर्वप्रथम काशीपुर नरेश गुमान सिंह देव की राजसभा में नियुक्त हुए टिहरी नरेश सुदर्शन शाह, पटियाला के राजा श्री कर्ण सिंह, अलवर के राजा श्री बनेसिंह देव और नहान के राजा फ़तेह प्रकाश आदि तत्कालीन कई राजाओं से भी उन्हें सम्मान मिला। गुमानी की प्रमुख रचनायें हैं- राममहिमा वर्णन, गंगाशतक, कृष्णाष्टक, रामाष्टक, चित्रपद्यावली ज्ञानभैषज्यमंजर, शतोपदेश, नीतिशतक, रामनाम-पञ्चपंचाशिका आदि।गुमानी पंत न केवल कुमाऊनी भाषा के आदिकवि हैं बल्कि हिंदी भाषा के आधुनिक कवियों में भी आदिकवि हैं। वे बहुभाषी रचनाओं के लेखक कवि भी थे जिन्होंने संस्कृत, हिन्दी, कुमाउनी तथा नेपाली की मिश्रित शैली में काव्य रचना की है। उन्होंने संस्कृत भाषा में ‘ज्ञानभैषज्यमञ्जरी’ नामक एक अद्भुत सुभाषित काव्य भी लिखा जिसमें एक ओर नैतिक शिक्षा दी गई है तो दूसरी ओर आयुर्वेदिक चिकित्सा के सूत्र दिए गए हैं।
अंग्रेजों से पहले कुमाऊँ में गौरखा राज था उस समय गुमानी ने उनके द्वारा किये अत्याचारों को अपनी कविताओं द्वारा बहुत बेबाकी से प्रस्तुत किया गया-
“दिन-दिन खजाना का भार का बोकिया ले,
शिव शिव चुलि में का बाल नैं एक कैका।.
तदपि मुलुक तेरो छोड़ि नैं कोई भाजा,
इति वदति गुमानी धन्य गोरखालि राजा।।”
अर्थात रोज रोज खजाने का भार ढोते-ढोते प्रजा के सिर के बाल उड़ गये पर गोरखों का राज छोड़कर कोई भी मु्ल्कवासी नहीं भागा। अत: हे गोरखाली राजा तुम धन्य हो। इसी तरह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध गुमानी ने लिखा है –
“विलायत से चला फिरंगी पहले पहुँचा कलकत्ते,
अजब टोप बन्नाती कुर्ती ना कपड़े ना कुछ लत्ते।
सारा हिन्दुस्तान किया सर बिना लड़ाई कर फत्ते,
कहत गुमानी कलयुग ने यो सुब्बा भेजा अलबत्ते॥”

अंग्रेज शासक जिस प्रकार से सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा की दुर्दशा कर रहे थे, विष्णुमंदिर और उत्तराखंड की कुलदेवी नंदा के मंदिर को तोड़कर वहां अपने बंगले बना रहे थे उस धार्मिक अत्याचार के विरुद्ध यदि किसी के पास आवाज बुलंद करने का कोई साहस था तो वह कवि गुमानी ही थे-
“विष्णु का देवाल उखाड़ा
ऊपर बंगला बना खरा,
महाराज का महल ढवाया
बेडी खाना तहां धरा।,
मल्ले महल उड़ाई नंदा
बंगलो से भी तहां भरा,
अंग्रजों ने अल्मोड़े का
नक्शा ओरी और किया॥”
गुमानी ने अपनी कविताओं में उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के उपर भी अपनी कलम चलायी है और एक विधवा की दयनीय दशा और बेबसी का मार्मिक वर्णन इस प्रकार किया है-
“हलिया हाथ पड़ो कठिन
लै है गेछ दिन धोपरी,
बांयो बल्द मिलोछू एक
दिन ले काजूँ में देंणा हुराणी।
माणों एक गुरुंश को
खिचड़ी पेंचो नी मिलो,
मैं ढोला सू काल हरांणों
काजूं के धन्दा करूँ॥”
अर्थात बेचारी विधवा को मुश्किल से दोपहर के समय एक हल बाने वाला मिला और उस समय भी केवल बांयी ओर जोता जाने वाला बैल मिल पाया, दांया नहीं। खाने खिलाने को खिचड़ी का एक माणा भी उसे कहीं से उधार नहीं मिल पाया। निराश होकर वह विधवा सोचती है कि कितनी बदनसीब हूं मैं कि मेरे लिये काल भी नहीं आता।गुमानी की एक लोकप्रिय उक्ति है “हिसालू की जात बड़ी रिसालू जां जां जान्छे उधेडी खांछे” जिसका तात्पर्य हैं कि हिंसालु फल की भाति गुमानी की कविता बहुत रसभरी (रसीली) और गुसैल (रिसालू) है अर्थात काटों से भरी है, जो भी इसके नजदीक जाता है उसे यहअपने कटु यथार्थ के कंटीले तेवरों से काट खाती है। गुमानी ने अपनी रचनायें बिना किसी लाग लपेट की सीधी और सरल भाषा में की हैं तथा उनमें गहरे व्यंग्य का पुट रहता है। यही कारण है कि गुमानी की रचनायें कुमाऊँ में आज भी उतनी ही प्रसिद्ध हैं जितनी उनके समय में थी।पर विडम्बना ही है कि हिंदी गढ़वाली नेपाली और कुमाऊनी भाषा के आदिकवि का गौरव रखने वाले साहित्यकार तथा गोरखा और अंग्रेज शासकों के अत्याचार के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाले क्रांतिकारी युगपुरुष को अपने ही राज्य में सरकार और जनता द्वारा जिस तरह भुला दिया गया है।

अंग्रेज़ों के ज़माने में कुमाऊँ की समृद्धि नष्ट हो गई। कवि का भावुक ह्रदय कुमाऊँ की दुर्दशा पर कराह उठा-
आई रहा कलि भूतल में छाई रहा सब पाप निशानी।
हेरत हैं पहरा कछु और ही हेरत है कवि विप्र गुमानी।
गुमानी जी के जीवन में घटित एक रोचक घटना का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। अपने प्रवासकाल में एक बार गुमानी जी एटा जिले के शूकर (सोरों) में भागिरथी के किनारे एक गुफा में साधनारत थे। एक दिन दोपहर को वे विश्राम कर रहे थे। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि कोई उनके सिर पर हाथ फेर रहा है। आँखें बंद किए हुए ही उन्होंने पूछा, ”कोस्त्वं? अर्थात तुम कौन हो? उत्तर मिला ”कपिरहं कविस्त्वं” अर्थात मैं कबि (बंदर) हूँ और तुम कवि हो। इतना सुनते ही उनका आँख खुल गई। उन्होंने अपने सिरहाने एक विशालकाय बंदर को देखा। इनके उठते ही वह बंदर गुफा की दीवार में प्रविष्ट हो गया। गुमानी जी ने हनुमान का आशीर्वाद मान दीवार में उसी स्थान पर हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की। यह प्रतिमा आज भी मौजूद है और वह गुफा गुमानी गुफा के नाम से जानी जाती है। हालाँकि स्थानीय लोगों ने इसे मंदिर का स्वरूप प्रदान कर दिया।गुमानी जी चूँकि अपने विद्यार्थी जीवन से ही कविताएँ करते थे। अतः उनका रचनाकाल १८१० के लगभग माना जा सकता है। डॉ. भगत सिंह ने भी ‘हिंदी साहित्य को कूर्मांचल की देन’ नामक पुस्तक में गुमानी जी का रचनाकाल यही माना है। हिंदी साहित्य के इतिहासकार इस तथ्य को भूल गए कि भारतेंदु के प्रादुर्भाव से बहुत पहले गुमानी खड़ी बोली को काव्य का रूप दे चुके थे। श्रीधर पाठक का रचनाकाल कवि गुमानी जी के रचनाकाल से एक शताब्दी बाद का है। उनकी खड़ी बोली की रचनाएँ काव्य शास्त्र की कसौटी पर खरी उतरी है। उनकी रचनाओं में काव्य के सभी गुण विद्यमान हैं। अतः यह निर्विवाद सत्य है कि गुमानी जी ही खड़ी बोली के प्रथम कवि हैं। एक रचना इस प्रकार है-
अपने घर से चला फिरंगी पहुँचा पहले कलकत्ते
अजब टोप बन्नाती कुर्ती ना कपड़े ना लत्ते।
सारा हिंदुस्तान किया सर बिना लड़ाई कर फत्ते।
कहे गुमानी कलियुग ने यों सुब्बा भेजा अलबत्ते।।
गुमानी जी की निम्नलिखित रचनाएँ उपलब्ध हैं-
१. रामनाम पंचासिका, २. राम महिमा वर्णन, ३. गंगाशतक, ४. जगन्नाथाष्टक, ५. कृष्णाष्टक, ६. राम सहस्रगणदंडक, ७. चित्र पदावली, ८. राम महिमा, ९. रामाष्टक, १०. कालिकाष्टक, ११. राम विषय भक्ति विज्ञप्तिसार, १२. तत्व बोधिनी पंच पंचाशिका, १३. नीतिशतक शतोपदेश, १४. ज्ञान भेषज्य मंजरी। इनके अतिरिक्त गुमानी जी की अनेक भाषाओं में लिखी रचनाएँ गुमानी नीति में संग्रहीत है। सर जार्ज ग्रियर्सन ने ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ में गुमानी जी की दो रचनाओं- गुमानी नीति और गुमानी काव्य-संग्रह का उल्लेख किया है। गुमानी नीति का संपादन देवीदत्त उप्रेती ने १८९४ में किया है। गुमानी काव्य-संग्रह का संकलन और संपादन देवीदत्त शर्मा ने १८३७ में किया। इसके अलावा उनका कोई संग्रह प्रकाशित नहीं हो सका। कुछ पत्र-पत्रिकाओं में उनके बारे में लेख अवश्य प्रकाशित हुए। पंडित देवीदत्त शर्मा के अनुसार यदि इनके लिखे हुए खर्रे भी मिल जाते तो इनकी समस्त रचना एक लाख से अधिक पदों में होती। उन्होंने तत्कालीन नरेशों के बारे में भी कई रचनाएँ कीं। हिंदी साहित्य के आधुनिक पितामहों को गुमानी जी को खड़ी बोली का पहला कवि मान लेना चाहिए।वह वर्त्तमान समय के राष्ट्रवादियों के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए कि आखिर ! देश में आज किस प्रकार के राष्ट्रवादी मूल्यों की राजनीति हावी है,जहां अंग्रेजों और गोरखों के दो-दो अत्याचारी शासनों की गुलामी के विरुद्ध आजादी के लिए आवाज उठाने वाले इस महान् राष्ट्रवादी क्रांतिकारी कवि का आज कोई नामलेवा भी नहीं है। संविधान की आठवीं सूची में उत्तराखंड की भाषाओं को स्थान दिलाने वाले साहित्यिक संगठनों ने भी गुमानी के साहित्यिक अवदान को भुला दिया है।यह मात्र मान्यता नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य भी है कि ब्रिटिश हुकूमत और गोरखा राज की दो-दो राजसत्ताओं के विरुद्ध आवाज उठाने वाला कोई पहला भारतीय कवि था तो वह गुमानी पंत ही था। देश में जब न ‘वन्दे मातरम्’ था, न तिरंगा झंडा, न गांधी जी थे, न सुभाष बोस, तब हिमालय की वादियों में गोरखा राज और अंग्रेजों के जुल्म और अत्याचारों के विरुद्ध कोई सशक्त आवाज उठी थी, तो वह लोक कवि गुमानी के कविता की आवाज थी। अंग्रेज प्रशासक गुमानी से थर थर कांपते थे और उनके विरोध के स्वर को जानने समझने के लिए उनकी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद करवाते थे।अत्यंत चिंता का विषय है कि आज के इस ग्लैमरपूर्ण वातावरण में हम उस राष्ट्रवादी कवि गुमानी और उसके अवदान को भूल गए हैं, जिसने भाषावाद,जातिवाद और सम्प्रदायवाद से ऊपर उठकर अँग्रेजी शासन के विरुद्ध उस समय राष्ट्रवादी कविता लेखन का साहस किया जब अधिकांश कविगण अंग्रेजी हुकूमत की चाटुकारिता में लगे थे। विडम्बना यह भी है कि हमारे इस राष्ट्रभक्त कवि का सही सही मूल्यांकन नहीं हुआ। उत्तराखंड सरकार को गुमानी पंत को “उत्तराखंड के राष्ट्रकवि” के गौरव के राजकीय सम्मान से सम्मानित किया जाना चाहिए तथा प्रति वर्ष उनके राष्ट्रीय अवदान के विषय में विशेष कार्यक्रर्मों का आयोजन करना चाहिए ताकि समस्त देशवासी इस महान कवि के योगदान से परिचित हो सकें।मैं पिछले तीन चार दशकों से राष्ट्रीय समाचार पत्रों और उत्तराखंड से जुड़ी पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समस्त देशवासियों को इस महान कवि के योगदान से परिचित कराता आया । जब से सोशल मीडिया से जुड़ा है, ‘गुमानी’ जी की 10 मार्च की जन्मजयंती का दिन मुझे सदा याद रहता है। उसी परम्परा में इस लेख के माध्यम से देशवासियों और उत्तराखंड वासियों को इस महान कवि के राष्ट्रीय योगदान से अवगत कराना मैं अपना दायित्व मानता हूं।अंत में कहना चाहुंगा कि उत्तराखंड के प्रथम लोकप्रिय कवि के रूप में गुमानी का नाम अपनी लोकसंस्कृति और राष्ट्रवादी साहित्य साधना के लिये सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध आवाज उठाने वाले पहले कुमाऊंनी साहित्यकार, हिमालय पुत्र,उत्तराखंड गौरव तथा हिंदी, कुमाऊंनी आदि भारतीय भाषाओं के आदिकवि लोकमान्य गुमानी पंत को उनकी जन्मजयंती पर शत शत नमन!!लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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