औषधीय गुणों से भरपूर चिरायता

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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
चिरायता आम तौर पर आसानी से उपलब्ध होने वाला पौधा नहीं है, नेपाल मूल उत्पादक देश होने के कारण यहाँ अधिकता से पैदा होता है। भारत में हिमाचल प्रदेश में कश्मीर से लेकर अरुणाचल तक काफी ऊँचाई पर इसका पौधा होता है। मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में भी इसको उगाया जाता है। इसका एक दो वर्षीय पौधा 2 से 4 फुट ऊँचा होता है। पत्ते भालाकार, नोकदार, 2-3 इंच लम्बे और 3-4 सेंटीमीटर चौड़े, चिकने, पांच सिरयुक्त होते है तना स्थूल, लम्बा और शाखा युक्त होता है। पुष्पदंडों पर हरे पीले रंग के बैंगनी आभायुक्त छोटे छोटे होते हैं फल 6-7 मिलीमीटर व्यास के अंडाकार तथा बीज छोटे, चिकने, बहुकोणीय, बहुसंख्या में होते हैं। फूल वर्षा ॠतु में और फल अगस्त.सितंबर तक आते हैं। शरद ॠतु में जब फल पक जाते हैं, तब इनका संग्रह किया जाता है।
चिरायता संज्ञा पुं० सं०चिरतिक्त या चिरात्, दो ढाई हाथ ऊँचा एक पौधा जो हिमालय के किनारे कम ठंडे स्थानों में काश्मीर से भूटान तक होता है। खसिया की पहाड़ियों पर भी यह पौधा मिलता है। विशेष इसकी पत्तियाँ छोटी छोटी और तुलसी की पत्तियों के बराबर होती है। जाडे़ के दिनों में इसके फूल लगते हैं। सूखा पौधा जड़, डंठल, फूल, सब औषधि के काम में आता है। फूल लगने के समय पौधा उखाडा़ जाता है और दबाकर बाहर भेजा जाता है। नैपाल के मोरंग नामक स्थान से चिरायता बहुत आता है। चिरायते का सर्वाग कड़वा होता है। इसी से यह ज्वर में बहुत दिया जाता है। वैद्यक में यह दस्तावर, शीतल तथा ज्वर, कफ, पित्त, सूजन, सन्निपात, खुजली, कोढ़ आदि को दूर करनेवाला माना जाता है।
इसकी गणना रक्तशोधक औषधियों में है। डाक्टरी में भी इसका व्यवहार होता है। चिरायते की बहुत सी जातियाँ होती है। एक प्रकार का छोटा चिरायता दक्षिण में बहुत है। एक चिरायता कल्पनाथ के नाम से प्रसिद्ध है, जो सबसे अधिक कड़ुआ होता है। गीमा नाम का एक पौधा भी चिरायते ही की जाति का है, जो सारे भारत में जलाशयों के किनारे होता है। दक्षिण देश के वैद्य और हकीम हिमालय के चिरायते की अपेक्षा शिलारस या शिलाजीत नाम का चिरायता अधिक काम में लाते हैं, जो मदरास प्रांत के कई स्थानों में होता है। वैज्ञानिक मतानुसार चिरायता का रासायनिक विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसमे पीले रंग का एक ओफेलिक एसिड, दो प्रकार के तिक्त चिरायानिन और एमेरोजेण्टिन नामक ग्लाइकोसाइड्स, दो क्रिस्टलीय फिनॉल जेन्टीयोपीक्रिन, पीले रंग के क्रिस्टल योगिक, सुअचिरिन नामक जैन्थोन होते हैं। उल्लेखनीय है कि एमेरोजेण्टिन नामक ग्लाइकोसाइड संसार के सबसे अधिक कड़वे पदार्थो में एक होता है। इसका कड़वापन ही इस औषधि का विशेष गुण होता है। इसका उपयोग मलेरिया, दमे की बीमारी, फ्लू, टाइफाइड, शक्ति वर्धक, संक्रमण रोधक, जीवाणु.कृमि नाशक, कालाजार जिसमें प्लीहा और यकृत दोनों बढ़ जाते है, में सफलतापुर्वक किया जाता है। चिरायता एक ऐसी देहाती जड़ी.बूटी मानी जाती है। जो कुनैन की गोली से अधिक प्रभावी होती है।
एक प्रकार से यह एक देहाती घरेलू नुस्खा है।पहले चिरायते को घर में सुखा कर बनाया जाता था लेकिन आजकल यह बाजार में कुटकी चिरायते के नाम से भी मिलता है। लेकिन घर पर बना हुआ ताजा और विशुद्ध चिरायता ही अधिक कारगर होता है। 100 ग्राम सूखी तुलसी के पत्ते का चूर्ण, 100 ग्राम नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण, 100 ग्राम सूखे चिरायते का चूर्ण लीजिए। इन तीनों को समान मात्रा में मिलाकर एक बड़े डिब्बे में भर कर रख लीजिए। यह तैयार चूर्ण मलेरिया या अन्य बुखार होने की स्थिति में दिन में तीन बार दूध से सेवन करें। मात्र दो दिन में आश्चर्यजनक लाभ होगा। कारगर एंटीबॉयोटिक. बुखार ना होने की स्थिति में भी यदि इसका एक चम्मच सेवन प्रतिदिन करें तो यह चूर्ण किसी भी प्रकार की बीमारी चाहे वह स्वाइन फ्लू ही क्यों ना हो, उसे शरीर से दूर रखता है। इसके सेवन से शरीर के सारे कीटाणु मर जाते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक है। इसके सेवन से खून साफ होता है तथा धमनियों में रक्त प्रवाह सुचारू रूप से संचालित होता है।
हजारों सालों से चिरायता नामक जड़ी.बूटी का इस्तेरमाल त्वतचा संबंधी रोगों के लिए किया जाता है, क्योंकि इसके सेवन से रक्त को साफ करने में मदद मिलती है। इसके अलावा चिरायता एक एंटी.बायोटिक औषधि है, जो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ान में मदद करती है। इसके रोजाना सेवन करने से कीटाणु नष्ट होते हैं और बीमारियां दूर रहती है। आयुर्वेद के अनुसार चिरायता का रस कई किस्म की बीमारियों से लड़ने में सहायक है, मसलन कैंसर, ट्यूमर का विकास, सर्दी.जुखाम, रुमेटाइड अर्थराइटिस, दर्द, जोड़ों के दर्द, त्वचा सम्बंधी बीमारी, थकन, कमजोरी, मसल्स में दर्द, सेक्स सम्बंधी समस्याएं, सिरदर्द, गठिया, पाचनतंत्र सम्बंधी समस्या, लिवर सम्बंधी समस्या, संक्रमण आदि। चिरायता का एक बड़ा गुण यह भी है कि रक्त से टाक्सिन को निकाल बाहार करता है। इसके अलावा यह टिश्यू को क्षति होने से रोकता है जिससे लिवर के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। चिरायता के जड़, पत्तों, टहनी, फल में 24 किस्म के तत्व मौजूद होते हैं। ये तमाम तत्व कैंसर को प्राकृतिक रूप से ठीक करने में मदद करते हैं।
आस्ट्रेलिया में स्थित यूनिवर्सिटी आफ क्वीन्सलैंड में हुए अध्ययन के मुताबिक चिरायता में पांच किस्म के स्टेराइडल सैपोनिन्स होते हैं। वास्तव में यही सैपोनिन्स कैंसर से लड़ने में सहायक है। इसके अलावा इसमें कई किस्म के एंटीआक्सीडेंट एसिडए एंटी.इन्फ्लेमेटरी, तेल, रसायन आदि होते हैं जो कि इस बीमारी से बचाव के जरूरी है। यही नहीं चिरायता की सेल की हो रही क्षति रोकन में भी महति भूमिका है। यह लिवर के लिए लाभकारी तत्व है। यह सूजन और जलन से तो बचाता ही है। साथ पेट में हा रही तमाम किस्म की समस्याओं को भी रोकता है। इससे लिवर की सुरक्षा तो होती है साथ ही कई अन्य समस्याएं आने से पहले ही निपट जाती हैं। यह हमारे रक्त को साफ करता है और रक्त संचार को बेहतर करता है। इसके अलावा चिरायता का एक बड़ा गुण यह भी है कि रक्त से टाक्सिन को निकाल बाहार करता है। इसके अलावा यह टिश्यू को क्षति होने से रोकता है जिससे लिवर के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि कालमेघ को कल्पनाथए देसी चिरायताए महातीता आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका स्वाद तीखा और पेड़ नीम से मिलता जुलता है, इसलिए इसे भूमि नीम के नाम से भी जानते हैं। कालमेघ का प्रयोग परंपरागत रूप से बलवर्धक, पेट में गैस रोकने, निमोनिया, ज्वर, यकृत, मलेरिया और कालरा आदि रोगों के इलाज में किया जाता है वर्तमान समय में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हर्बल उत्पादों एवं जड़ी बूटियों की बढ़ती जा रही मांग, हर्बल उत्पाद के प्रति लोगों के पुर्नझुकाव तथा इनकी व्यवसायिक स्तर पर खेती के अत्यधिक लाभकारी होने जैसी विशेषताओं ने विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में यह सर्वाधिक संभावना संपन्न व्यवसाय क्षेत्र को जन्म देता है।
उत्तराखंड राज्य में कृषिकरण को बढावा देने के लिए 28 प्रजातियों का चयन किया गया है, जिनमें अतीस, कुटकी, सतवा, कूठ, जम्बू, गन्धरायण, तेजपात, सर्पगंधा, सतावर, तुलसी और बड़ी इलायची प्रजातियां मुख्य हैं। इनके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य भी घोषित करने का निर्णय लिया गया है राज्य सरकार को जड़ी बूटी खेती को प्रोत्साहन देने के लिए ठोस एवं कारगर नीति तैयार करनी चाहिए। काश्तकारों की समस्याओं को समझते हुए उसका समाधान करना होगा। प्रदेश में लघु और सीमांत किसानों की संख्या करीब 10 लाख है। वर्तमान में 40 हजार किसानों ने हर्बल खेती को अपनाया है।
पिछले कुछ सालों में सरकार को एरोमा और जड़ी.बूटी के कृषिकरण में सकारात्मक परिणाम मिले हैं। जिससे अब सरकार ने सगंध और जड़ी बूटी खेती को बढ़ावा देने पर फोकस किया है। औषधीय खेती करने वाले किसानों के दिन अब बहुरने लगे हैं। ऐसे किसान अब घर बैठे ही अपनी फसल की अच्छी कीमत ले रहे हैं। इसका कारण यह है कि यहां के किसान कांट्रैक्ट फार्मिग अपना रहे हैं। कंपनियों के कहने पर किसान औषधीय खेती कर रहे हैं। ये कंपनियां उनकी फसल अमेरिका व दूसरे देशों में सप्लाई करती हैं। पहले जहां जनपद में एलोवीरा व स्टीविया की खेती की जा रही थी वहीं अब दूसरी औषधीय फसलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। औषधीय खेती के कारण उसके आसपास गांवों के लोगों को इससे रोजगार भी मिल रहा है। किसान को भी इसकी खेती से दोगुनी आमदनी हो रही है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रदेश में उच्च गुणवत्तायुक्त के फसल उत्पादन कर देश.दुनिया में स्थान बनाने के साथ राज्य की आर्थिकी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में पलायान को रोकने का अच्छा विकल्प बनाया जा सकता है। अगर ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती है प्रदेश विज्ञान एवं पर्यावरण परिषद को भी पेटेंट करवाया की जरूरत है। उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं ही नहीं, यहां के खान.पान में भी विविधता का समावेश है। जिससे आज यह औषधि विलुप्त होने के कगार पर है, अतः इसका संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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