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पर्यावरण दिवस सिर्फ एक दिन नहीं हर दिन बनाएं

04/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
विश्व पर्यावरण दिवस हर साल 5 जून को पूरी दुनिया में मनाया जाता है। साल 2026 में हम सब एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और पिघलते ग्लेशियर अब केवल किताबों की बातें नहीं, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन की हकीकत बन चुके हैं इस साल का पर्यावरण दिवस प्रकृति की तरफ से हमारे लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है, जो हमें याद दिलाता है कि हमारे पास रहने के लिए केवल एक ही ग्रह हैइस पर्यावरण दिवस पर वैश्विक समुदाय से जो सबसे बड़ा संदेश निकलकर आ रहा है, वह बेहद स्पष्ट है: अब बातें करने का वक्त खत्म हो चुका है, अब जमीन पर काम करने का वक्त है। धरती को बचाने के लिए हमें मोर्चों पर तुरंत काम करना होगा प्रकृति इंसानों के बिना करोड़ों साल तक फलती-फूलती रही है और हमारे बिना भी रह सकती है। लेकिन हम प्रकृति के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकते। इसलिए, पर्यावरण को बचाकर हम धरती पर कोई अहसान नहीं कर रहे, बल्कि अपनी खुद की आने वाली पीढ़ियों का जीवन सुरक्षित कर रहे हैं। आज हम आगे बढ़ने की होड़ में अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहें हैं। आधुनिक बनने की लालसा में हमने अपने ही हाथों में हथकड़ियां बांध ली है। एक ओर तो हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते है वहीं दूसरी ओर हम पर्यावरण को नुकसान पहुंचा कर स्वंय को पीछे धकेल रहे हैं। आज कम होते वृक्ष, खनिज, पशु-पक्षियों को बचाने किए हम पर्यावरण दिवस मनाते हैं। आज पूरा विश्व पर्यावरण को होने वाले नुकसान का खामियाजा भुगत रहा है। बढ़ती गर्मी, सूखा, कहीं जल का अभाव, तो कहीं जल की अधिकता ने वातावरण को संकुंचित कर के रख दिया है। जिससे निपटने के लिए और बिगड़ते हालातों को बचाने के लिए 5 जून को पूरे विश्व में विश्व पर्यावरण दिवस मानाया जाता है। प्रतिवर्ष जनता को पर्यावरण को संरक्षित करने और प्रदूषण कम करने के फलस्वरुप नए-नए उपाय बताकर इस दिन जागरुक किया जाता है। प्रत्येक वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस किसी ना किसी विशेष विषय को ध्यान में रखकर आयोजित किया जाता है। इस वर्ष पर्यावरण दिवस की मेजबानी भारत को मिली और इसका विषय रहा ” बीट प्लास्टिक पोल्युशन।” इस अवसर पर पूरे देश के सभी लोगों ने मिलकर प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाली प्रदूषण के लिए आवाज उठाई क्योंकि पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन प्लास्टिक ही है। यूं तो बरसों से मनुष्य पर्यावरण का दोहन कर रहा है। जिसे रोकने के लिए वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मानव पर्यावरण विषय पर संयुक्त राष्ट्र महासभा का आयोजन किया गया था। इसी चर्चा के दौरान विश्व पर्यावरण दिवस का सुझाव भी दिया गया और इसके दो साल बाद 5 जून 1974 से इसे मनाना भी शुरू कर दिया गया। 1987 में इसके केंद्र को बदलते रहने का सुझाव सामने आया और उसके बाद से ही इसके आयोजन के लिए अलग अलग देशों को चुना जाता रहा है। इसमें हर साल 143 से अधिक देश हिस्सा लेते हैं और इसमें कई सरकारी, सामाजिक और व्यावसायिक लोग पर्यावरण की सुरक्षा, समस्या आदि विषय पर बात करते हैं। जिस तरह से आज विश्व पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है उसे रोकने के लिए पर्यावरण दिवस एक माध्यम है। मनुष्य ने बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, मालखाने, घर, फ्लैट, सड़कें, यातायात आदि बनाने के चक्कर में पर्यावरण को ही मुकसान पहुंचाया है। पेड़-पौधे वातावरण को शुद्ध करने का काम करते थे, हरियाली फैलाते थे। किन्तु आज हम खुली हवा में सांस भी नहीं ले पा रहें हैं। गाड़ियो, कारखानों से निकलते प्रदूषण ने हम सभी का जीना दुश्वर कर दिया है। एक ओर तो हम पैसे कमा रहें हैं वहीं दूसरी ओर प्रदूषण से होने वाली बीमारियों पर पैसे खर्च भी कर रहें हैं। बात यदि भारत की ही की जाए तो यहां देश की राजधानी दिल्ली का हाल ही सबसे ज्यादा बुरा है। लोगों को सांस लेने में भी दिक्कत पैदा हो रही है। देश-विदेश में प्लास्टिक का बढ़ता प्रयोग भी पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा रहा है जिसे देखते हुए इस बार पर्यावरण का केन्द्र ही प्लास्टिक को रखा गया। लोगों से अपील की गई है कि वो प्लास्टिक या उससे बनी थैलियों का प्रयोग ना करें क्योंकि प्लास्टिक में सिंथेटिक होता है। जो वर्षों तक रखने पर भी नष्ट नहीं होता। यह जमीन की उर्वरक शक्ति को भी खत्म कर देता है। प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया में 500 अरब प्लास्टिक बैगों का उपयोग किया जाता है। हर वर्ष, कम से कम 8 मिलियन टन प्लास्टिक महासागरों में पहुंचता है, जो प्रति मिनट एक कूड़े से भरे ट्रक के बराबर है। हर मिनट 10 लाख प्लास्टिक की बोतलें खरीदी जाती हैं। इन प्लास्टिक का असर केवल इन्सानों की ही नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि, पशु-पक्षियों, जीव-जन्तुओं, नदी-तलाबों को भी नुकसान पहुंचता है। आज कितने ही जीव-जन्तु भोजन की तलाश में प्लास्टिक को खाकर मरते जा रहें हैं। समुद्री जीवों की हालत और भी ज्यादा दयनीय है। सारा कचरा समुद्र में प्रवाहित करने से समुद्री जीवों के जीवन पर सकंट उत्पन्न हो गया है। अभी हाल ही में एक मछली के पेट से हजारों प्लास्टिक की थैलियां प्राप्त हुईं थी। प्लास्टिक आज पर्यावरण को सबसे ज्यादा हानि पहुंचा रहा है। आज जिस तरह समस्त देश प्रदूषण की मार झेल रहें हैं। उसके लिए पर्यावरण के प्रति जागरुक होने की अति आवश्यकता है। पेड़-पौधे पर्यावरण का सबसे अच्छा स्त्रोत होते हैं किन्तु हम उन्हें ही समाप्त कर रहें है। इसके लिए सर्वप्रथम सभी को कम से कम एक पेड़ लगाने की आवश्यकता है। यह पेड़-पौधे वातावरण को स्वच्छ रखते हैं। साथ ही पशु-पक्षियों के होने के कारण कई विषैले पदार्थ भी दूर हो जाते हैं। हम सभी को प्लास्टिक से होने वाले नुकसानों के प्रति जागरुक होने की आवश्यकता है। खनिजों का प्रयोग कम कर के भी पर्यावरण को बचाया जा सकता है। पर्यावरण दिवस एक उत्सव की तरह मनाना चाहिए। जिससे लोग प्रोत्साहित होकर हानिकारक चीजों का प्रयोग ना कर सकें। अलग-अलग देशों में इस महान कार्यक्रम को मनाने के लिये विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापों की योजना बनायी जाती है। सभी पर्यावरण से संबंधित मुद्दों को सुलझाने के लिए समाचार पत्र, चैनल, रेडियो सबसे अच्छा जरिया है। जिनके माध्यम से लोगों को जागरुक किया जा सकता है। आज कई ऐसे विज्ञापन, स्लोगन इन पर चलाए व दिखाए जाते हैं जो हमें पर्यावरण के प्रति जागरुक करते हैं। पर्यावरणीय मुद्दों को घर-घर तक पहुंचाने के लिए बड़े-बड़े विशेषज्ञ वाद-विवाद करते हैं। नारे, जुलूसों के जरिए भी पर्यावरण की महत्वता लोगों को बताई जाती है। उनका ध्यान इस ओर आकर्षिक करने के लिए परेड और बहुत सारी गतिविधियाँ, अपने आसपास के क्षेत्रों को साफ करना, गंदगी का पुनर्चक्रण करना, पेड़ लगाना, सड़क रैलियों सहित कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के क्रिया-कलाप कराए जाते हैं। इस कार्यक्रम में सभी उम्र के लोग हिस्सा लेते हैं। आज समाज में कई गतिविधियां पर्यावरण को लेकर कराई जाती हैं। जैसे नृत्य क्रिया-कलाप, कूड़े का पुनर्चक्रण, फिल्म महोत्सव, सामुदायिक कार्यक्रम, निबंध लेखन, पोस्टर प्रतियोगिया स्वच्छता अभियान, कला प्रदर्शनियों के द्वारा लोगों में जागरुकता फैलाई जाती है। साथ ही पेड़ लगाने के लिये लोगों को प्रोत्साहित किया जाता है। आज सोशल मीडिया भी बहुत आसान जरिया बन गया है लोगों को जागरुक करने का। इसके माध्यम से भी कई समाजिक कैंपेन चलाए जाते हैं। लोग पोस्ट लिख कर पर्यावरण के प्रति भाव प्रकट करते हैं। स्कूल-कॉलेजों में भी कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर कई संगोष्ठियां, सम्मेलन इत्यादि आयोजित कर पर्यावरण संरक्षण के लिए जरुरी कदम उठाए जातें हैं। यदि अभी हम इस पर ध्यान नहीं देगें तो आने वाले समय में ना पर्यावरण बचेगा ना ही हम, बचेगा तो सिर्फ और सिर्फ प्रदूषण।  पृथ्वी को केवल “बचाने” की जरूरत नहीं है, बल्कि उसे अपने काम के साथ-साथ शुद्ध और श्रेष्ठ वाइब्रेशन, सम्मान व आदर देने की, उसे समझने की और री स्टोर किए जाने की जरूरत है।  क्योंकि प्राकृतिक संसाधन फिर से बनाए जा सकते हैं, लेकिन पृथ्वी को दोबारा नहीं बनाया जा सकता। इस विश्व पर्यावरण दिवस पर, परिवर्तन की शुरुआत अपने भीतर से करें।
हमारे पास एक ही पृथ्वी है।
हमारे पास एक ही चेतना है।
आइए, दोनों को हील करें।हर साल 5 जून को “विश्व पर्यावरण दिवस” मनाया जाता है — और यह एक वैश्विक संदेश देता है कि अब वह समय आ गया है जब मनुष्य और प्रकृति के बीच खोए हुए बैलेंस को फिर से स्थापित किया जाना चाहिए। यह प्लास्टिक कचरे की गंभीर समस्या से निपटने का एक वैश्विक संकल्प है। हर साल 430 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग दो-तिहाई केवल एक बार उपयोग के लिए होता है और जल्दी ही फेंक दिया जाता है। यह अल्पकालिक उपयोग की वस्तुएं नदियों और महासागरों को प्रदूषित करती हैं, हमारी फूड चेन में प्रवेश कर जाती हैं, और माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारे शरीर में भी जमा हो जाती हैं। ग्लोबल वार्मिंग अब वैश्विक चेतावनी दे रही है। यह इस शताब्दी की सबसे खतरनाक पर्यावरणीय समस्या बनकर उभर रही है। धरती के तापमान में हो रही वृद्धि से जमीन की शुष्कता बढ़ रही है तथा कृषि योग्य उपजाऊ जमीन लगातार घट रही है। इस असह्य गर्मी से शारीरिक, मानसिक, आर्थिक तथा सामाजिक दुष्प्रभावों की आशंकाएँ व्यक्त की जाने लगी हैं। पृथ्वी का ताप इसी गति से बढ़ता रहा तो कुछ दशकों के बाद गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, छोटे बच्चों, खुले में काम करने वाले व्यक्तियों तथा वृद्धजनों का जीवन मुश्किल में पड़ने की प्रबल आशंका है। रात्रिकालीन तापमान में वृद्धि होनेके कारण नींद न आने से सिरदर्द, अवसाद और चिड़चिड़ेपन जैसे जटिल मानसिक रोग बढ़ने के अनुमान हैं। जल-संकट तथा सूखे की वृद्धि से पर्यटन, कृषि, बागवानी तथा पशुपालन व्यवसायों के प्रत्यक्षतः प्रभावित होने, अधिक गर्मी के कारण रोजगार के साधनों में कमी आने, माँग और पूर्ति के मध्य अन्तर से महंगाई में अप्रत्याशित वृद्धि होने तथा आर्थिक मन्दी की आशंका जतायी जा रही है। स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढाँचे के अव्यवस्थित होने से  जीडीपी पर प्रतिकूल असर पड़ना तय माना जा रहा है।मनुष्य द्वारा प्रकृति से किया गया अनाचार ही मौजूदा पर्यावरण-संकट का एकमात्र कारण है। यदि सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग की वैश्विक चेतावनी को गम्भीरता से नहीं लिया गया, तो निकट भविष्य में अधिकांश जीव-जन्तुओं और मानव प्रजाति का नामोनिशान सदा के लिए धरती से मिट जाएगा।जल का अपव्यय नहीं करना, समय-समय पर पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना, बिजली उपकरणों एवं वाहनों का संयमित रूप से इस्तेमाल करना – इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर हम प्रकृति जनित समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं। पर्यावरण-संरक्षण और संवर्धन युगधर्म है और इसका निर्वहन मानव मात्र के लिए परमावश्यक है। यदि पर्यावरण से सम्बन्धित सभी पहलुओं पर विचार कर उनका समाधान नहीं किया जाएगा, तो भविष्य में निश्चित ही इसका परिणाम अत्यन्त भयावह होगा।पर्यावरण-संरक्षण के मद्देनजर हम सभी को इस मूल बात को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा। यदि पैदल चलने से काम चलता हो तो हम साइकिल का उपयोग न करें, साइकिल से काम चल जाए, तो मोटरसाइकिलका उपयोग न करें, मोटरसाइकिल से काम चल जाता हो, तो चौपहिया वाहन उपयोग में न लें। प्रत्येक मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग मितव्ययिता से करे तथा भावी पीढ़ी के लिए इन्हें संरक्षित रखने हेतु सदा सचेष्ट रहे, यही भारतीय दर्शन की मूल भावना है, जो विश्व-मानव के लिए सदा-सर्वदा वरेण्य है।पर्यावरण-संरक्षण हेतु व्यक्तिगत प्रयत्नों के साथ ही राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी सार्थक प्रयास अपेक्षित हैं। इनमें वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को घटाने के लिए ठोस रणनीति तैयार कर उसमें अमल करना, दृष्टिबाधित वर्तमान विकास के स्थान पर इसके टिकाऊ मॉडल का अनुसन्धान, नवीकरण ऊर्जा का अन्वेषण, प्राकृतिक चिकित्सा-पद्धति को अपनाये जाने हेतु प्रभावी पहल, रासायनिक उर्वरकमुक्त कृषि एवं कम पानी की खपत वाले बीजों का विकास तथा टेक्नोलॉजी एवं इकोलॉजी के मध्य बेहतर समन्वय स्थापित कर भारी उद्योगों तथा बड़ी मशीनों, भीमकाय यन्त्रों के उपयोग के स्थान पर पर्यावरणोन्मुखी लघु तथा कुटीर उद्योगों का संस्थापन शामिल है।अतः सम्पूर्ण विश्व को इस दिशा में गम्भीर प्रयास करने ही होंगे। सौर ऊर्जा, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बढ़ाकर कार्बन-उत्सर्जनको रोकना होगा। पौधरोपण अभियान चलाने के साथ ही वृक्षों की कटाई पर भी रोक लगानी होगी। ध्वनि-प्रदूषण भी वायुमण्डल की शान्ति को भंग करता है, जिससे मस्तिष्क एवं ज्ञानेन्द्रियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। अतः ध्वनि प्रदूषण को रोकने के प्रयास भी युद्ध स्तर पर करने होंगे।  हर साल 5 जून को मनाया जाने वाला ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ हमें याद दिलाता है कि यह धरती हमारा इकलौता घर है और इसकी हरियाली को बचाना हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है। साल 2026 में, जब कंक्रीट के जंगल लगातार बढ़ते जा रहे हैं और मौसम का मिजाज बदल रहा है, तब सिर्फ एक दिन का उत्सव मनाना काफी नहीं है। यदि पर्यावरण संतुलित रहेगा तो पृथ्वी पर जीवन सुरक्षित रहेगा। इस बार हमें अपनी सोच और आदतों को बदलने का एक सच्चा ‘संकल्प’ लेना होगा। जलवायु परिवर्तन की बढ़ती जटिलता के संदर्भ में, हरित और कम उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था की ओर यात्रा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। हालांकि, जनता, व्यवसायों और सभी स्तरों एवं क्षेत्रों के संयुक्त प्रयासों से सकारात्मक विकास सतत विकास लक्ष्यों को साकार करने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार तैयार कर रहे हैं, साथ ही 2050 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के प्रति वियतनाम की प्रतिबद्धता में व्यावहारिक योगदान भी दे रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की बढ़ती जटिलता के संदर्भ में, हरित और कम उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था की ओर यात्रा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। हालांकि, जनता, व्यवसायों और सभी स्तरों एवं क्षेत्रों के संयुक्त प्रयासों से सकारात्मक विकास सतत विकास लक्ष्यों को साकार करने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार तैयार कर रहे हैं, साथ ही 2050 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के प्रति वियतनाम की प्रतिबद्धता में व्यावहारिक योगदान भी दे रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की बढ़ती जटिलता के संदर्भ में, हरित और कम उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था की ओर यात्रा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। हालांकि, जनता, व्यवसायों और सभी स्तरों एवं क्षेत्रों के संयुक्त प्रयासों से सकारात्मक विकास सतत विकास लक्ष्यों को साकार करने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार तैयार कर रहे हैं, साथ ही 2050 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के प्रति वियतनाम की प्रतिबद्धता में व्यावहारिक योगदान भी दे रहे हैं। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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