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ब्रिटिश कालीन तकनीक की जीवंत विरासत

04/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आज हमारे सामने चुनौती है कि युवा पीढ़ी का झुकाव इन बातों की ओर बहुत कम हो गया है। मोबाइल और गूगल जैसे साधनों ने त्वरित जानकारी पाने की आदत बना दी है। इससे लोग गहराई से पढ़ना, खुद से खोज करना और उस पर चिंतन करना भूलते जा रहे हैं। बढ़ती तकनीक और सुविधापूर्ण जिंदगी, इन संग्रहालयों तक नई पीढ़ी की पहुंच को और मुश्किल बना रही है। उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल अपने प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक इमारतों और औपनिवेशिक विरासत के लिए देशभर में प्रसिद्ध है. इसी विरासत का एक अनमोल हिस्सा आज भी कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर स्थित हिमालय संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है. यह धरोहर कोई साधारण वस्तु नहीं, बल्कि ब्रिटिशकाल की इंजीनियरिंग दक्षता और तकनीकी सोच का जीवंत उदाहरण है. करीब 144 वर्ष पुराना यह विशाल बॉयलर कभी नैनीताल के प्रतिष्ठित वेल्जली गर्ल्स हाई स्कूल के छात्रावास में उपयोग किया जाता था और एक बार में 1500 लीटर से अधिक पानी गर्म करने की क्षमता रखता था.आज जब आधुनिक गीजर और इलेक्ट्रॉनिक हीटिंग सिस्टम आम हो चुके हैं, तब यह ऐतिहासिक बॉयलर उस दौर की तकनीकी उपलब्धियों की कहानी बयां करता है. ब्रिटिश शासनकाल में छात्रावासों और बड़े संस्थानों में रहने वाले लोगों की दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसे विशाल बॉयलर सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता था. वेल्जली गर्ल्स हाई स्कूल के छात्रावास में रहने वाली छात्राओं को गर्म पानी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी इसी बॉयलर पर थी. इतिहासकारों के अनुसार, उस समय सीमित संसाधनों के बावजूद इतनी बड़ी मात्रा में पानी को गर्म करने की व्यवस्था अपने आप में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती थी. यह बॉयलर न केवल उपयोगिता का साधन था, बल्कि उस दौर की इंजीनियरिंग, संसाधन प्रबंधन और ऊर्जा उपयोग की समझ का भी उत्कृष्ट उदाहरण है.कुमाऊं विश्वविद्यालय ने इसके ऐतिहासिक और तकनीकी महत्व को देखते हुए इसे संरक्षित करने का निर्णय लिया और हिमालय संग्रहालय में विशेष स्थान प्रदान किया.  वर्तमान में यह संग्रहालय आने वाले पर्यटकों, शोधार्थियों और छात्रों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. यहां आने वाले लोग इस धरोहर को देखकर ब्रिटिशकालीन जीवनशैली और उस समय की तकनीकी व्यवस्था को समझ सकते हैं. हिमालय संग्रहालय की इंचार्ज ने बताया कि यह बॉयलर केवल लोहे का एक ढांचा नहीं है, बल्कि औपनिवेशिक भारत की तकनीकी सोच और सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण दस्तावेज है. इसके संरक्षण का उद्देश्य केवल एक पुरानी वस्तु को सहेजना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को इतिहास और तकनीक के बीच के संबंधों से परिचित कराना भी है. प्रोफेसर सावित्री जंतवाल ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे शोध और अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण माना है. इतिहास, पुरातत्व, इंजीनियरिंग और संग्रहालय विज्ञान से जुड़े छात्र इस बॉयलर की संरचना, धातु विज्ञान, ईंधन प्रणाली, ऊष्मीय दक्षता और सामाजिक उपयोगिता पर अध्ययन कर सकेंगे. इससे उन्हें केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तकनीकों की व्यावहारिक समझ भी विकसित होगी. विश्वविद्यालय का मानना है कि ऐसी धरोहरें अतीत और वर्तमान के बीच एक मजबूत सेतु का कार्य करती हैं. इनसे छात्र यह समझ सकते हैं कि आधुनिक तकनीक तक पहुंचने का सफर किन-किन चरणों से होकर गुजरा है. साथ ही, विरासत संरक्षण के महत्व को भी समझने का अवसर मिलता है. आने वाले समय में विश्वविद्यालय इस ऐतिहासिक बॉयलर को शोध परियोजनाओं और शैक्षणिक गतिविधियों से जोड़ने की योजना बना रहा है. इससे स्थानीय इतिहास, औपनिवेशिक विरासत और तकनीकी विकास पर नए शोध को बढ़ावा मिलेगा. हिमालय संग्रहालय में सुरक्षित यह 144 साल पुराना बॉयलर आज भी इतिहास के पन्नों से निकलकर नई पीढ़ी को अतीत की तकनीकी उपलब्धियों से रूबरू करा रहा है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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