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उत्तराखंड में सैकड़ों देवदार के वृक्षों का अस्तित्व संकट में

23/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
राष्ट्र की अद्वितीय व अटूट प्राकृतिक संपदा और आदिम जातियों की जिजीविषा के प्रमुख साधन रहे जंगल समूचे भारत में तेजी से लुप्त हो रहे हैं। देश का वन विभाग अब तक यह दावा करता रहा था कि भारत के कुल भू-भाग में 19 प्रतिशत जंगल हैं। लेकिन हाल ही में भारतीय वन सर्वेक्षण ने खुलासा किया है कि बीते 10 साल के भीतर 3000 वर्ग किमी जंगलों का सफाया हो चुका है। यदि यही रफ्तार जारी रही तो 100 सालों में दो तिहार्इ घने जंगल नष्ट हो जाएंगे। इसके पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने उपग्रह के माध्यम से दुनिया भर के जंगलों के छायाचित्र लेकर एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें सरकारी दावों को पूरी तरह झुठलाते हुए दावा किया था कि देश में केवल आठ प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित रह गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 3290 लाख हेक्टेयर में फैले भू-क्षेत्र में 1989 तक 19.5 भू-भाग में जंगल थे, जिनकी कटार्इ 15 लाख हेक्टेयर प्रति वर्ष की दर से जारी रही, नतीजतन ये वन घटकर केवल आठ फीसदी बताए गए थे।वनों का आंकलन दस साल पहले की गर्इ रिपोर्ट में दशाए गए आंकड़ों के तुलनात्मक अध्ययन से होता है। दस साल पहले देश में कुल 7.83 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में वन थे जो अब घटकर 24 फीसदी शेष बचे हैं। इनका विनाश विकास के बहाने औधोगिकीकरण की भेंट चढ़ गया। इस रिपोर्ट के अनुसार बीते दो साल के भीतर ही 367 वर्ग किमी वन क्षेत्र नष्ट हो गया। इसके चलते देश के कुल क्षेत्रफल में जंगल और पेड़ों की मौजूदगी घटकर 23.81 फीसदी रह गर्इ है, जो 33 फीसदी होनी चाहिए थी। इस स्थिति ने जंगल से जुड़े 20 करोड़ लोगों की आजीविका पर संकट के बादल गहरा दिए हैं। आधुनिक और औधोगिक विकास के चलते पहले भी करीब 4 करोड़ वनवासियों को विस्थापित किया जाकर उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया है।देवभूमि उत्तराखंड अपने खूबसूरत नजारों और प्राकृतिक संपदा के लिए खूब जानी जाती है. उत्तराखंड में वैसे तो कई वन संपदा पाई जाती हैं लेकिन राज्य के पहाड़ी इलाकों के जंगलों में पाया जाने वाला एक पेड़ ऐसा भी है, जिसपर देवताओं का वास माना जाता है. यह पेड़ है उत्तराखंड के हिमालयी इलाकों में पाया जाने वाला देवदार. यह पेड़ शंकुधारी आकार लिए उगता है. देवदार उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पाया जाने वाला देवदार वृक्ष अपनी मजबूती, लंबी उम्र और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है. ‘वुड ऑफ गॉड’ यानी भगवान की लकड़ी कहे जाने वाले इस वृक्ष से न केवल सदियों तक टिकने वाला फर्नीचर तैयार होता है, बल्कि इससे प्राप्त तेल त्वचा रोगों, मस्सों और मुहांसों के उपचार में भी बेहद उपयोगी माना जाता है. धार्मिक आस्था से जुड़ा यह वृक्ष पर्यावरण और मानवीय जीवन दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. देवदारु हिमालय की वादियों में पाया जाने वाला एक विशाल वृक्ष है. यह न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसके औषधीय, आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ भी इसे अनमोल बनाते हैं. हाल के समय में आयुर्वेद के बढ़ते महत्व के बीच देवदारु ने विशेष तौर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है. देवदारु को ‘देवताओं की लकड़ी’ के रूप में जाना जाता है. इस पौधे के सभी भागों का उपयोग विभिन्न औषधीय लाभों के लिए किया जाता है. भारत में यह हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और सिक्किम जैसे राज्यों में उगता है और इसकी ऊंचाई 40-60 मीटर तक हो सकती है. इसकी शंकुधारी पत्तियां और सुगंधित लकड़ी इसे विशिष्ट बनाती हैं. देवदारु जुकाम-खांसी के समय शरीर से अतिरिक्त कफ को भी बाहर निकालने में मदद करता है. इस गुण के कारण रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट से बलगम को निकालकर खांसी जैसे कफ विकार रोगों से राहत दिलाने में मदद करता है. देवदारु का सेवन करने कफ को संतुलित करने और फेफड़ों से अतिरिक्त बलगम को बाहर निकालने में मदद मिलती है. जिससे यह अस्थमा के लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद करता है और सांस फूलने की स्थिति में राहत देता है. अस्थमा जैसे श्वास रोग में देवदारु का सेवन रामबाण इलाज है.इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण के कारण गठिया से संबंधित सूजन और दर्द जैसी समस्याओं को ठीक करने के लिए इसे जोड़ों पर लगाया जा सकता है. देवदारु तेल को इसके एंटीसेप्टिक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण के कारण घाव भरने के लिए घावों पर भी लगाया जा सकता है. अपनी त्वचा पर देवदारु के पत्ते का पेस्ट लगाने से त्वचा के संक्रमण के साथ-साथ इसके एंटीफंगल गुण के कारण खुजली को रोकने में भी मदद मिल सकती है.हिंदू धर्ममें देवदारु को पवित्र माना जाता है. पुराणों में इसे भगवान शिव से जोड़ा जाता है और कई धार्मिक स्थलों पर इसके वृक्ष लगाए जाते हैं. इसकी शीतल छाया और सुगंधित वातावरण ध्यान और योग के लिए बेहतर माहौल प्रदान करते हैं. आयुर्वेद में देवदारु का विशेष स्थान है. इसकी छाल, पत्तियां, तेल और राल का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार में किया जाता है. आयुर्वेद के अनुसार, देवदारु में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण होते हैं. इसका तेल जोड़ों के दर्द, गठिया और मांसपेशियों की अकड़न को कम करने में प्रभावी है. इसके अलावा यह त्वचा रोगों में भी उपयोगी है.वर्ष 1985 में, जब चंपावत पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा था, तब तत्कालीन पर्यावरण प्रेमी जिलाधिकारी ने लोहाघाट नगर के प्रत्येक देवदार पेड़ की नंबरिंग कर विस्तृत रिकॉर्ड तैयार कराया था, जिसमें लगभग 15 हजार पेड़ दर्ज थे. वर्ष 2013 में तत्कालीन जिलाधिकारी चौधरी द्वारा कराई गई गिनती में यह संख्या घटकर करीब 12 हजार रह गई. इसके बाद अवैध कटान और अतिक्रमण लगातार जारी रहा. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि दिनदहाड़े देवदारों पर कुल्हाड़ी चलने लगी. वन विभाग ने जुर्माना तो लगाया, लेकिन यह हिम्मत कैसे और किसके संरक्षण में पैदा हुई, इस पर न तो गहन जांच हुई और न ही कोई स्थायी समाधान निकाला गया वरिष्ट पत्रकार. ने देवदार आच्छादित क्षेत्र में इन दुर्लभ प्रजाति के वृक्षों के संरक्षण हेतु सीसीटीवी कैमरे लगाने एवं उनका नियंत्रण सीधे थाने से किया जाने की बात कही है. वहीं नगरीय क्षेत्र में देवदार वन क्षेत्र की पूर्ण सुरक्षा वन विभाग को ही सौंपी जाए, जबकि नगर पालिका और वन विभाग की संयुक्त गश्त नियमित की जाए. साथ ही, वन क्षेत्र के आसपास रहने वाले लोगों को लिखित रूप से पेड़ों की सुरक्षा की जिम्मेदारी देकर उन्हें सहभागी बनाया जाए, ताकि वे इन्हें अपनी धरोहर समझकर बचा सकें. वहीं दिल्ली, कोलकाता, मुंबई जैसे महानगरों से मायावती आश्रम और रीठा साहिब धार्मिक क्षेत्रों में आने वाले पर्यटक और तीर्थयात्री इन देवदारों के पेड़ों का दीदार करते हैं. जिले का खूबसूरत लोहाघाट क्षेत्र जहां देवदार के जंगलों से आच्छादित है, वहां बीते कई वर्षों में नगर में लगातार बढ़ते कंक्रीट के जंगल, अतिक्रमण, अवैध कटान से इन वृक्षों को संकट पैदा हो गया है. नगरी क्षेत्र में देवदार के वृक्षों के सूखने की तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद अब जिला प्रशासन एवं वन महकमा सख्त हो गया है. जिलाधिकारी मनीष कुमार के निर्देश पर लोहाघाट वन महकमा जहां देवदार के सूखने पेड़ों के ट्रीटमेंट की कार्रवाई की है. वहीं पेड़ों को सुखाने वाले अज्ञात लोगों के खिलाफ भी वन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया है. फिलहाल देवदार के वृक्षों पर मंडरा रहे संकट पर स्थानीय लोग भी चिंता व्यक्त कर रहे हैं.चंपावत जनपद के लोहाघाट नगर पालिका क्षेत्र में देवदार के दुर्लभ और ऐतिहासिक वृक्षों पर संकट गहराता नजर आ रहा है. नगर क्षेत्र में अतिक्रमण की नीयत से रसायन डालकर सैकड़ों देवदार पेड़ों को सुखाने की साजिश सामने आने के बाद प्रशासन और वन विभाग सख्त हो गया है. मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रशासन के संज्ञान में आया. इसके बाद वन विभाग भी हरकत में आया और तत्काल देवदार के सूखते पेड़ों को बचाने हेतु उपचारात्मक कार्रवाई शुरू की गई. उप प्रभागीय वन अधिकारी लोहाघाट सुनील कुमार के नेतृत्व में वन विभाग की टीम ने करीब एक दर्जन से अधिक देवदार के हरे पेड़ों में गार्डनिंग एवं विशेष ट्रीटमेंट किया है, ताकि उन्हें सुखने से बचाया जा सके. साथ ही वन संरक्षण अधिनियम के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है. हालांकि, लोहाघाट नगर क्षेत्र में देवदारों की सुरक्षा को लेकर वर्षों से एक बड़ी प्रशासनिक उलझन बनी हुई है. अधिकांश भूमि नजूल श्रेणी की है, जिसकी देखरेख राजस्व विभाग करता रहा है, जबकि पेड़ों की सुरक्षा का दायित्व नगर पालिका अथवा वन विभाग के बीच स्पष्ट रूप से तय नहीं हो पाया. जिलाधिकारी द्वारा जनवरी-फरवरी में एरिया वाइज विभागीय जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह व्यवस्था व्यावहारिक रूप से कठिन मानी जा रही है. वहीं जिले लोहाघाट के सीनियर सिटीजन एवं वरिष्ट पत्रकार के अनुसार बीते कई दशकों में नगर क्षेत्र से अतिक्रमण या अन्य वजहों से अब तक 12 हजार से अधिक देवदार के पेड़ गायब हो चुके हैं. देवदार भारत के हिमाचल प्रदेश का राज्य वृक्ष होने के साथ ही पाकिस्तान का राष्ट्रीय वृक्ष है. इसका तना बेहद मजबूत होता है और यह 65 मीटर ऊंचाई तक पाया जाता है. भारत में 1584 वर्ष पुराना देवदार का पेड़ लाहौल स्पीति में पाया गया. इसके अलावा अमेरिका, फ्रांस, इटली, पुर्तगाल समेत दुनियाभर के कई देशों में सालों पुराने देवदार के वृक्ष आज भी मौजूद हैं. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के नैनीताल में नयनापीक, कैमल्स बैक की पहाड़ियों में देवदार का घना जंगल है. इसके अलावा अल्मोड़ा के जागेश्वर धाम में देवदार के विशाल पेड़ हैं. दरअसल जागेश्वर मंदिर परिसर देवदार के विशाल पेड़ों के बीच ही स्थित है. देवदार के पेड़ों को भूनिर्माण परियोजनाओं में शामिल करने से उनकी सुंदरता और लचीलापन के साथ बाहरी स्थान बेहतर होते हैं। प्रत्येक प्रजाति अद्वितीय गुण प्रदान करती है जो विभिन्न वातावरणों और डिज़ाइन वरीयताओं के अनुकूल होती है, विशाल नोबल फ़िर से लेकर कॉम्पैक्ट कोरियन फ़िर तक। ये राजसी शंकुधारी पेड़ अच्छी तरह से सूखा मिट्टी, पर्याप्त धूप और नियमित रखरखाव प्रदान करके सजावटी केंद्र बिंदु या कार्यात्मक अवरोध के रूप में पनपते हैं। चाहे नज़ारे को फ्रेम करना हो, छाया प्रदान करना हो या मौसमी उत्सवों का प्रतीक हो, देवदार के पेड़ प्रकृति की स्थायी सुंदरता का उदाहरण देते हैं और संधारणीय भूनिर्माण प्रथाओं में कालातीत निवेश के रूप में काम करते हैं। नगर के विभिन्न स्थानों में मनमाने ढंग से सड़क के किनारे और देवदार वनों में मिट्टी डाले जाने से दुर्लभ प्रजाति के देवदार वृक्षों के अस्तित्व पर संकट पैदा होता जा रहा है। प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने से लोगों के हौसले बुलंद हैं और वह धड़ल्ले से  विभिन्न निर्माण कार्यों से निकलने वाली मिट्टी को सड़कों के किनारे और देवदार वृक्षों के जड़ों में डालते जा रहेहैं।नगर और आसपास के क्षेत्रों  में निजी तथा सरकारी भवनों का निर्माण करने वाले कुछ लोग जमीन की खुदाई से निकल रही मिट्टी को सरेआम सड़क किनारे और पेड़ों की जड़ों में डंप कर रहे हैं। मिट्टी पेड़ों की जड़ों में डंप किए जाने से देवदार वृक्षों को खतरा पैदा हो गया है। साथ ही सड़क संकरी होने के कारण दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ गई है।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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