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सख्त नियमों के बावजूद क्यों नहीं थम रहे रैगिंग के मामले

23/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आखिर देश में बढ़ती रैगिंग की घटनाएं क्यों नहीं रुक रहीं, यह सवाल आज एक यक्ष प्रश्न बनता जा रहा है। हिमाचल के बहुचर्चित अमन काचरु रैगिंग कांड के बाद भी विश्वविद्यालयों व कालेजों में रैगिंग का संक्रमण बढ़ता ही जा रहा है। इसके बावजूद कि माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने रैगिंग पर पूर्ण प्रतिबंध का कानून लागू किया है, मगर देश में रैगिंग के बढ़ते मामलों से यह कानून मजाक बनता जा रहा हैै।अब ऐसा ही मामला राजस्थान के एक आईटीआई कॉलेज से आया है जिसे जानकार आप भी हैरान रह जाएंगे।दरअसल, जयपुर में स्टूडेंट्स के साथ रैगिंग का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक छात्र के साथ क्लास रूम में मारपीट की जा रही है और रैगिंग के नाम पर गवर्नमेंट आईटीआई कॉलेज के सीनियर्स छात्र दबंगई कर रहे हैं।  सीनियर्स की तरफ से पहले चाकू की नोक पर छात्र को मुर्गा बनाया जाता है फिर उसके साथ मारपीट की जाती है। पूरा मामला 2 सितंबर का बताया जा रहा है। वायरल हो रहे वीडियो में छात्र सीनियर से हाथ जोड़कर विनती करता रहा, लेकिन सीनियर नहीं माना और लगातार उसे पीटे जा रहा था। इस पिटाई से छात्र को गंभीर चोटें आई हैं। उसके चेहरे पर ब्लैक स्पॉट पड़ गए हैं। साथ ही उसके शरीर के अन्य पार्ट और सिर में भी चोट आई है। बीते दिनों हिमाचल प्रदेश के वाकनाघाट में भी एक निजी विश्वविद्यालय में प्रथम वर्ष के एक छात्र से रैगिंग का मामला प्रकाश में आया था जिसमें रैगिंग के आरोपी तीन छात्रों को गिरफ्तार कर हॉस्टल व यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था। इससे पहले आईआईटी मंडी मे रैगिंग की घटना सामने आई थी। आईआईटी प्रबंधन ने आरोपी 10 छात्रों क़ो छः महीने विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया था तथा 72 छात्रों पर 15 से 25 हजार रूपये तक का जुर्माना लगाया गया था। शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग ने होने पाए, इसके लिए राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की तरफ से कई कदम उठाए गए हैं। वहीं, शैक्षिणिक संस्थानों में रैगिंग ने होने पाए इसको लेकर यूजीसी भी सख्त है। समय-समय पर यूजीसी की तरफ से रैगिंग रोकने के लिए गाइडलाइंस भी जारी की जाती रहती है। बावजूद इसके शैक्षणिक संस्थानों से आए दिन रैगिंग की खबरें आती रहती हैं। पिछले दिनों यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के अध्यक्ष ने ही बताया था कि एक जनवरी 2023 से 28 अप्रैल 2024 तक अलग-अलग यूनिवर्सिटी और उच्च शिक्षा संस्थानों से छात्रों की रैगिंग को लेकर 1240 शिकायतें मिली हैं, जिनमें से 1113 (89.76%) का निपटारा किया गया है। प्रो. का कहना है कि जैसे ही UGC की एंटी रैगिंग हेल्पलाइन पर कोई छात्र मदद मांगता है, केस को तुरंत संबंधित यूनिवर्सिटी और कॉलेज के साथ-साथ पुलिस को भी फॉरवर्ड किया जाता है। इसके बावजूद क्यों नहीं थम पा रही हैं ये घटनाएं ?हकीकत में देश में रैगिंग के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। रैगिंग के कारण प्रताड़ित छात्र आत्महत्या तक कर रहे हैं। पिछले दिनों एम्स बिलासपुर में भी एक मामला हो चुका है। वहाँ भी एक छात्रा ने आत्महत्या की कोशिश की थी, मगर बच गई थी। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन  (यूजीसी) के आकड़ों के मुताबिक 2020 में देश में रैगिंग के 219 मामले सामने आये थे। 2021 में रैगिंग के 511 मामले हुए थे। 2019 में उतर प्रदेश के इटावा में सैफई मैडिकल विश्वविद्यालय में रैगिंग का मामला घटित हुआ था जहां सीनियर छात्रों ने 150 छात्रों के सिर मुंडवा दिए थे। यह एमबीबीएस के प्रथम वर्ष के छात्र थे।रैगिंग के मामलों में वृद्वि खतरनाक साबित हो रही है। वर्ष 2018 में एक मामला मध्यप्रदेश के भोपाल में घटित हुआ था जहां रैगिंग से तंग आकर बीफार्मा की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली थी। छात्रा के सुसाइड नोट के आधार पर पुलिस ने चार लड़कियों व एक अध्यापिका को गिरफ्तार किया था। रैगिंग की इससे पहले भी कई जघन्य वारदातें हो चुकी थीं। इतनी वारदातें होने के बाद भी इन घटनाओं पर रोक नहीं लग रही है। रैगिंग छात्रों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। रैगिंग की इन वारदातों से छात्र खौफजदा होते जा रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो छात्रों के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं क्योंकि इन बारदातों से अभिभावक भी अपने बच्चों को असुरक्षित समझ रहे हैं। रैगिंग का साधरण सा अर्थ एक दूसरे का परिचय जानना होता था, मगर अब इसका स्वरुप बदलता जा रहा है। रैगिंग अब यातना बन गई है। छात्रों को मानसिक रुप से प्रताडित किया जाता है, मारपीट की जाती है। आज तक पता नहीं कितने छात्र-छात्राएं रैगिंग के कारण असमय मौत के मुह में जा चुके हैं। उतरप्रदेश के इटावा में घटित घटना ने एक नई बहस को जन्म दिया था। देश के शिक्षण संस्थानों मेें प्रतिबन्ध के बाद भी यह मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। बीते हादसों से न तो प्रशासन ने सबक सीखा और न ही छात्रों ने सीख ली। यदि कड़े कदम उठाए होते तो आज ऐसे हादसे न हो रहे होते। यह एक यक्ष प्रशन बनता जा रहा है।रैगिंग की यह बीमारी विश्वविद्यालयों, कालेजों के बाद अब स्कूलों में भी अपने पांव पसार चुकी है। यदि इस पर समय रहते रोक न लगाई गई, तो आने वाले समय में घातक परिणाम भुगतने पड़ेंगे। देश में समय-समय पर ऐसे दुखद हादसे होते रहते हैं मगर यह रुकने के बजाए निर्बाध रुप से बढ़ते ही जा रहे हैं। समाचार पत्रों की खबरों के अनुसार मई में मुम्बई के ठाणें में रैगिंग से तंग आकर एक छात्र ने ट्रेन के आगे कटकर आत्महत्या कर ली। दिल्ली के स्कूल आफ प्लानिगं एंड आर्किटैक्चर का एक होनहार छात्र रैगिंग के चलते अपाहिज हो गया। आरोप है कि प्रथम वर्ष के छात्र नवीन कुजुर को उसके सीनियर ने ऐसी यातनाएं दी कि वह चलने फिरने के काबिल नहीं रहा।आन्ध्र प्रदेश में एक कालेज में सीनियर छात्राओं ने जूनियर छात्रा की रैगिंग ली, उनकी यातना से उस छात्रा ने अपनी आवाज खो दी थी। एक अन्य घटना में छात्र को क्लास में लड़की कहा जाता था। छात्रों की इस हरकत से तंग आकर उस छात्र ने खुद को आग लगा दी थी। मुम्बई में एक कालेज में सीनियर छात्राओं ने एक जूनियर छात्रा को मिर्ची खिलाई और उठक-बैठक करवाई। कोलकाता में एक कालेज में सीनियर जूनियर को ड्रग्स लेने के लिए मजबूर करते हैं और पिटाई करते हैं। उतर प्रदेश में सरकार ने रैगिंग के खिलाफ अभियान छेड़ा है तथा रैगिंग करने वाले छात्रों को पांच साल तक दाखिला न देने को कड़ा फैसला लिया है।एक समय था कि कालेजो में रैगिंग का नाम तक नहीं था, मगर पिछले कुछ सालों से रैगिंग के आंकड़ों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होती जा रही है। कालेज के कुछ बिगड़ैल किस्म के छात्र -छात्राएं कालेज का माहौल बिगाड़ने में मशगुल रहते हैं। ऐसे मुट्ठीभर लोग छात्रों को अनावश्यक रुप से तंग कर रहे हैं, ऐसे उद्दंड लोगों को कानून के मुताबिक सजा देनी चाहिए। आज यह रैगिंग भयानक होती जा रही है। बीते सालों में हिमाचल के सुन्दरनगर के पौलिटैक्निक कालेज में भी रैगिंग की वारदात प्रकाश में आई थी जिसमें सिरमौर का एक छात्र रैगिंग का शिकार हुआ था। हालांकि कालेज प्रशासन ने उन सीनियर लडकों को कालेज से निकाल दिया, पर कालेज से निकालना इसका समाधान नहीं है।  उत्तराखंड की पहचान एजुकेशन हब और शांत प्रदेश के रूप में होती है, लेकिन बीते कुछ समय से कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में सामने आए रैगिंग के मामलों ने एजुकेशन हब और शांत प्रदेश की छवि पर धब्बा लगाया है. खासकर मेडिकल कॉलेजों से सामने आ रहे रैगिंग के मामलों से छात्र काफी डरे हुए हैं. आखिर सरकार और पुलिस-प्रशासन की सख्ती के बाद भी मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग के मामले क्यों नहीं रुक रहे हैं?ताजा मामला राजधानी देहरादून के राजकीय दून मेडिकल कॉलेज से सामने आया था, जहां रैगिंग और मारपीट की घटना के बाद कॉलेज प्रशासन ने सख्त कदम उठाने हैं. हालांकि, यह घटना न सिर्फ चिंता बढ़ाने वाली है, बल्कि यह भी साबित करती है कि रैगिंग की समस्या उत्तराखंड में अब गहराई तक जड़ें जमा चुकी है.उत्तराखंड में रैगिंग का कोई पहला मामला होता तो शायद इतना हो-हल्ला नहीं होता, लेकिन इस तरह की घटनाएं बीते कुछ सालों से लगातार देखने को मिल रही हैं, जो छात्रों में टेंशन बढ़ाने वाली है.दून मेडिकल कॉलेज से जनवरी में सामने आया गंभीर मामला साल 2026 के शुरुआत यानी जनवरी महीने में ही दून मेडिकल कॉलेज में ही 2025 बैच के एमबीबीएस छात्र से भयंकर मारपीट की गई. चौंकाने वाली बात ये है कि मारपीट करने वाला छात्र भी उसी बैच का बताया गया. जबकि आरोप ये लगा कि उसने 2023 और 2024 बैच के दो सीनियर छात्रों के दबाव में यह कदम उठाया. आज के समय में विभिन्न कालेजों,विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थाओं में रेगिंग पर रोक होने के बावजूद  रेगिंग का रोग थमता नजर नहीं आ रहा है और रह रहकर बीच बीच में रेगिंग की घटनाएं सामने आ रही हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि कैंपस में रैगिंग के मामले उच्च शिक्षा संस्थानों में वर्षों से चिंता का विषय रहे हैं। ‘रैगिंग’ का अर्थ है ऐसा कोई कार्य करना जो किसी छात्र को शारीरिक, मनोवैज्ञानिक या दैहिक क्षति पहुंचाता है, या शर्मिंदगी या शर्मिंदगी का कारण बनता है।वास्तव में,एक शिक्षण संस्थान के किसी अन्य छात्र के खिलाफ एक छात्र द्वारा किये गये किसी भी शारीरिक, मौखिक या मानसिक दुर्व्‍यवहार को रैगिंग कहते हैं।यदि कोई छात्र किसी अन्य छात्र को उसके काम करने के लिए धौंस दिखाता है या किसी छात्र को कॉलेज समारोह जैसी परिसर की गतिविधियों से बाहर रखा जाता है, तो उसे रैगिंग माना जाता है। कहना ग़लत नहीं होगा किशारीरिक शोषण, उदाहरण के लिए, खाने, पीने या धूम्रपान करने के लिए मजबूर करना, कपड़े पहनने या कपड़े उतारने के लिए मजबूर करना,मौखिक दुर्व्यवहार, उदाहरण के लिए अपशब्द और वाक्यांश, व्यक्ति की उपस्थिति, पोशाक, धर्म, जाति, परिवार या अध्ययन के चुने हुए क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपमानजनक संदर्भ आदि दुर्व्यवहार और गतिविधियों को रेगिंग में शामिल किया जा सकता है।सरल शब्दों में कहें तो किसी भी छात्र को कोई भी कार्य करने, या कोई भी कार्य करने के लिए कहना, जिसे वह सामान्य रूप से करने या प्रदर्शन करने के लिए तैयार नहीं होगा, ही रेगिंग के अंतर्गत आती है। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि रेगिंग का उद्देश्य विकृत आनंद प्राप्त करना है। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि रैगिंग को आमतौर पर पुराने छात्रों द्वारा कॉलेज लाइफ में नए छात्रों के स्वागत का दोस्ताना तरीका माना जाता है। एक रूप में इसे नए छात्रों और पुराने छात्रों के बीच की दूरियों को पाटने का प्रयास भी माना जाता है, जो नए छात्रों को अपने वरिष्ठों (सीनियर्स) के साथ घुलने-मिलने और संवाद कायम करने का मौका देता है, लेकिन छात्र संवाद कायम करने की बजाय नये छात्रों के साथ दुर्व्यवहार, दादागिरी करते हैं।भारत में विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी) ने भारतीय विश्वविद्यालयों में इसको रोकने के लिए कई निर्देश जारी किए हैं। यहां तक कि इसके लिए एक टोल फ्री हेल्पलाइन भी शुरू की गई है, लेकिन रेगिंग है कि थमने का नाम ही नहीं ले रही है। जानकारी देना चाहूंगा कि वर्ष 2001 में भारत के उच्चतम न्यायालय ने रैगिंग पर संज्ञान लेते हुए इसकी रोकथाम के लिए केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो के पूर्व निदेशक की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा भी अपने अधीन आने वाले शिक्षा संस्थानों में रैगिंग के विरुद्ध कड़े निर्देश जारी किए गए थे। कई राज्यों ने भी इस पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए हैं। वर्ष 1997 में तमिलनाडु में विधानसभा में रैगिंग-विरोधी कानून पास किया गया, लेकिन इनसे रेगिंग में कहीं न कहीं कमी तो जरूर देखने को मिली है लेकिन इस पर पूर्णतया पाबंदी अभी तक भी नहीं लगाई जा सकी है और यही कारण है कि रेगिंग एक गंभीर रोग का रूप धारण करने की ओर रूख कर रहा है।आंकड़े बताते हैं कि शैक्षिक सत्र 2009-10 में रैगिंग से हुई सर्वाधिक मृत्यु दर्ज की गईं। इनमें महाराष्ट्र शीर्ष दो राज्यों में से एक था, जिनमें रैगिंग से सर्वाधिक मौतें हुईं । रैगिंग का प्रतिशत मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में सर्वाधिक बढ़ा है । गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज औरंगाबाद, महाराष्ट्र में वर्ष 2011 में एक रैगिंग मामले में फाइनल इयर के 13 छात्रों को 25 हजार रुपये प्रत्येक का जुर्माना लगाया गया । यह महाराष्ट्र में अपनी तरह का पहला मामला था। जानकारी देना चाहूंगा कि फरवरी 2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2007 के अपने अंतरिम आदेश को पुनर्बहाल करते हुए इसे ‘मानवाधिकार हनन’ की संज्ञा दी थी । साथ ही, इसने सभी शैक्षिक संस्थाओं को यह निर्देश दिया था कि वे इससे सख्ती से निपटें। सर्वोच्च न्यायालय ने 16 मई, 2007 के अंतरिम आदेश को पुनर्बहाल करते हुए रैगिंग का सख्ती से उन्मूलन करने के संकेत दिए, तो यू.जी.सी. ने भी इस पर सकारात्मक रवैया अपनाते हुए यू.जी.सी. एक्ट 1956 को प्रभावी बनाने का प्रयास किया तथा सभी विश्वविद्यालयों एव संस्थानों को कहा कि इस एक्ट की किसी भी प्रकार की अवहेलना होने की स्थिति में विश्वविद्यालय अथवा संस्थान के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी ।जानकारी मिलती है कि श्रीलंका दुनिया में रैगिंग से सर्वाधिक प्रभावित देश है, लेकिन भारत में भी रेगिंग के कम मामले सामने नहीं आते हैं। पाकिस्तान व बांग्लादेश जैसे देश भी रेगिंग से काफी प्रभावित नजर आते हैं।सच तो यह है कि आज के इस आधुनिक युग में कॉलेजों, विभिन्न शिक्षण संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में वरिष्ठ(सीनियर )छात्र नए छात्रों से अपनी बड़ाई प्रकट करने के लिए बहुत ही अपमानजनक रूप से पेश आते हैं, अभद्र हरकतें, गुंडागर्दी और अभद्र तरीकों का प्रदर्शन करने पर जोर देते हैं। वो रेगिंग का भय दिखाकर कनिष्ठ छात्र -छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार करते हैं और स्वयं को बड़ा व बेहतर साबित करते हैं। रेगिंग के कारण नये छात्र -छात्राओं को बहुत सी मानसिक व शारीरिक यातनाओं तक का सामना करना पड़ता है। आज के समय में अब किसी भी कॉलेज, विश्वविद्यालय में रैगिंग एक बड़ा अपराध माना गया है। रैगिंग का दोष साबित होने छात्रों को तो सजा मिलेगी ही, साथ ही संबद्ध कॉलेज, विश्वविद्यालय पर भी कार्रवाई होगी और उस पर आर्थिक दंड भी लगाया जाएगा। जानकारी मिलती है कि रैगिंग के खिलाफ सबसे कड़ी सजा दोषी को तीन साल तक सश्रम कैद है। दूसरे शब्दों में कहें तो मानसिक चोट, शारीरिक दुर्व्‍यवहार, भेदभाव, शैक्षणिक गतिविधि में व्‍यवधान आदि सहित छात्रों के खिलाफ रैगिंग के विभिन्न रूपों को कानून, दंडित करता है। आज रेगिंग न हो इसके लिए कालेजों, विश्वविद्यालयों में छात्र -छात्राओं से प्रतिज्ञाएं ली जाती हैं लेकिन बावजूद इसके रेगिंग की जाती है।ताजा मामला हिमाचल प्रदेश के मंडी में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी का है। जानकारी के मुताबिक सीनियर छात्रों ने जूनियर स्टूडेंट्स को पार्टी के बहाने क्लास रूम में बुलाया और मुर्गा बनाया। जानकारी देना चाहूंगा कि सीनियर छात्रों द्वारा जूनियर बच्चों को काफी देर तक क्लास रूम में मुर्गा बनाकर रखा गया, जिससे कई छात्र दहशत में आ गए। हालांकि आई आई टी प्रबंधन ने मामला ध्यान में आने के बाद 10 छात्रों को छह महीने के लिए सस्पेंड कर दिया है। इन्हें हॉस्टल से भी बाहर करने के आदेश दिए गए हैं। जानकारी मिलती है कि  रैगिंग में संलिप्त 75 अन्य छात्रों पर 15-15 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया है। यहां तक कि रैगिंग में संलिप्त सभी आरोपियों को परिजन साथ लाने को कहा गया है, लेकिन यहां यक्ष प्रश्न यह उठता है कि आखिर रेगिंग की यह घटना क्यों घटित हुई ? इसके पीछे कारण क्या रहे ? इस पर विचार किया जाना चाहिए। हाल फिलहाल,निस्संदेह आईआईटी मंडी के प्रबंधन के इस कदम से संबंधित छात्रों को अपनी गलती का अहसास हुआ होगा और दूसरे संस्थानों के छात्रों को भी इससे सबक मिल सकेगा। आज से 15-20 साल पहले तक तो शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग का चलन आतंक का पर्याय बन चुका था। मेडीकल व इंजीनियरिंग कॉलेजों, उच्च शिक्षण संस्थाओं में रेगिंग की बहुत सी घटनाएं सामने आती थी।हालांकि अब यह पहले की तुलना में बहुत कम हो चुकी हैं लेकिन एक भी रेगिंग की घटना आखिर क्योंकर हमारे देश में होनी चाहिए ? पहले पुराने छात्र नए छात्रों से परिचय के नाम पर उन्हें प्रताड़ित किया करते थे, उनसे अशोभनीय हरकतें कराते थे, उनके साथ अभद्र भाषा में बात करते थे। तमाम उच्च शैक्षणिक संस्थान भी इसे एक आम चलन की तरह स्वीकार कर लेते थे। मगर इसके चलते बहुत सारे कोमल मन के विद्यार्थी दहशत से भर उठते थे। अनेक छात्र-छात्राओं ने रैगिंग के चलते खुदकुशी तक कर ली।हमारे देश की सर्वोच्च अदालत तक को रेगिंग की घटनाओं पर स्वत‌: संज्ञान लेना पड़ा। सख्त कानून बनाया गया।रैगिंग करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाने लगी। फिर भी छात्रावासों, उच्च शिक्षण संस्थाओं में रेगिंग की गतिविधियां चोरी-छिपे चलती रहीं। दरअसल, सीनियर छात्रों ने रैगिंग को एक तरह से अपने मनोरंजन और अपनी कुंठा निकालने का माध्यम बना लिया था। कड़े कानून और कठोरता से रेगिंग पर रोक लगाने के प्रयासों से काफी हद तक ऐसी गतिविधियां रुकी हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश आईआईटी मंडी में हाल ही में हुई रेगिंग की घटना से यह पता चलता है कि यह अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।जैसे ही मामला कॉलेज प्रशासन के संज्ञान में आया हड़कंप मच गया.प्रशासन ने बिना देरी किए दोनों सीनियर छात्रों के अभिभावकों को तलब किया और पूरे मामले की जांच एंटी रैगिंग कमेटी को सौंप दी गई. जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि यह घटना केवल एक झगड़े तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे जूनियर छात्रों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की प्रवृत्ति भी शामिल थी.केन्द सरकार व विश्वविद्यालय अनुदान आयेग को इन मामलों पर संज्ञान लेना चाहिए क्योंकि यदि समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। छात्र -छात्राएं रैगिंग के डर से प्रवेश नही लेंगे। कालेजों में अराजकता पैदा करने वाले तत्वों पर कार्रवाई करनी चाहिए। इनके कारण कई प्रतिभाएं खत्म हो रही हैं। ऐसे लोगों को सजा दी जाए तथा जुर्माना लगाया जाए। ऐसी भी रैगिग की छात्र पढ़ाई तक छोड़ देते हैं। आज तक हजारों छात्र इस बीमारी का शिकार हो चुके हैं। फिर भी यह प्रवृति रुकने का नाम नहीं ले रही है। जनमानस को एकजुट होकर इसका खात्मा करना होगा ताकि छात्र-छात्राएं निर्भिक होकर अपनी पढाई कर सकें। रैगिंग के बढ़ते जाल को काटना होगा ताकि भविष्य में इन घटनाओं की पुनरावृति न हो और शिक्षण संस्थानों में माहौल खराब न हो सके। इस बुराई के विरुद्व एक आन्दोलन करना होगा और प्रतिभावान छात्रों को बचाना होगा। रैगिंग का समूल नाश करना चाहिए ताकि यह नासूर न बन पाए। सरकारों को इन मामलों पर संज्ञान लेना होगा तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए। यही देश हित में हैlमनोवैज्ञानिकों का मानना है कि रैगिंग करने वाले छात्र मनोविकृति के शिकार रहते हैं। वे डिप्रेशन में रहते हैं। ऐसे में जब कोई नवागत छात्र उनके संपर्क में आता है तब ऐसे सीनियर छात्र अपनी भड़ास नवागत के साथ साझा करते हैं। इसी क्रम में रैगिंग की घटनाएं मूर्त रूप लेती है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि विश्वविद्यालय अथवा कॉलेज प्रशासन को ऐसे छात्रों को समय-समय पर काउंसलिंग कराने की जरूरत है, तभी ऐसी घटनाओं में कमी आएगी।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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