डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड राज्य में नए जिलों के गठन की मांग को लेकर जिला बनाओ संघर्ष समिति उत्तराखंड ने अपनी आवाज बुलंद कर दी है. समिति के पदाधिकारियों ने चेताया कि अगर उनकी मांग पूरी नहीं होती है तो उन्हें आंदोलन करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. समिति के संयोजक ने कहा कि उत्तराखंड राज्य में विकास की गति को बेहतर बनाने के लिए, राज्य से पलायन रोकने के लिये व बेरोजगारों को रोजगार प्रदान किए जाने के लिए ग्यारह और नए जिले बनने बेहद जरूरी हैं.उत्तराखंड के प्रत्येक जनपद के विभिन्न क्षेत्रों को नए जिलों के रूप में गठित करने की मांग को लेकर प्रकाश कुमार डबराल ने कहा कि उत्तराखंड में नए जिले न बनने के कारण ढेर सारी समस्याएं खड़ी हो गई हैं. इन्हीं समस्याओं का समाधान करने के लिए ही ग्यारह और नए जिले बनने चाहिए और सरकार को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना होगा. उन्होंने कहा कि इसके लिए एक अभियान तेजी के साथ चलाया जाएगा. समिति के अनुसार, राज्य के कई दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में आज भी विकास कार्यों का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पा रहा है. प्रशासनिक दूरी और संसाधनों के असमान वितरण के कारण आम जनता को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.समिति का कहना है कि यदि नए जिलों का गठन किया जाता है, तो इससे न केवल प्रशासनिक कार्यों में तेजी आएगी, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और न्याय जैसी सुविधाएं भी आम जनता तक आसानी से पहुंच सकेगी.साथ ही स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और क्षेत्रीय पहचान को भी बढ़ावा मिलेगा. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित नए जिलों में उत्तरकाशी से पुरोला, नौगांव, मोरी क्षेत्र, टिहरी से नरेंद्र नगर,प्रतापनगर; पौड़ी से कोटद्वार,बीरोंखाल; चमोली जनपद से गैरसैंण, नैनीताल से हल्द्वानी,रामनगर के साथ ही हरिद्वार से रुड़की, देहरादून ज़िले से विकासनगर,चकराता, अल्मोड़ा से रानीखेत, पिथौरागढ़ से डीडीहाट तथा उधमसिंहनगर से काशीपुर, गदरपुर, बाजपुर क्षेत्र शामिल हैं. समिति के संयोजक ने यह भी कहा कि नए जिलों के गठन से युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर मिलेंगे और महिलाओं का सशक्तिकरण भी होगा. विकास कार्यों के सही ढंग से संचालन और आमजन की समस्याओं के त्वरित समाधान के उद्देश्य से छोटी प्रशासनिक इकाइयां महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन यह भी सही है कि नए जिलों या प्रशासनिक इकाइयों के गठन का मतलब गैर योजनागत बजट में भारी इजाफा होना भी है। ऐसे में यह आवश्यक है कि नए जिलों के गठन से पहले इनका तथ्यपरक आकलन करा लिया जाए और फिर वित्तीय हालत समेत अन्य पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाए। प्रशासनिक लिहाज से देखें तो उत्तराखंड में दो मंडल, 13 जिले, 110 तहसीलें, 18 उप तहसीलें अस्तित्व में हैं।हालांकि विषम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए नए जिलों के गठन की मांग राज्य गठन के बाद से ही उठती रही है। वर्ष 2011 में इस मांग ने जोर पकड़ा और तब तत्कालीन मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर प्रदेश में चार नए जिलों कोटद्वार (पौड़ी), यमुनोत्री (उत्तरकाशी), रानीखेत (अल्मोड़ा) और डीडीहाट (पिथौरागढ़) के गठन की घोषणा की। इसके बाद सरकार में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और फिर दिसंबर 2011 को तत्कालीन सरकार ने जिलों के गठन का शासनादेश जारी किया, लेकिन विधानसभा चुनाव के कारण मसला लटक गया। वर्ष 2012 के चुनाव में सत्ता कांग्रेस के हाथों में आई तो जिलों का मसला ठंडे बस्ते में चला गया।उत्तराखंड में नए जिलों के गठन की मांग पिछले लंबे समय से की जा रही है, लेकिन सरकार इस मांग को पूरा नहीं कर पाई है। हर विधानसभा चुनाव में अपने घोषणा पत्र में राजनीतिक दल नए जिलों के गठन का वायदा करते हैं, लेकिन सत्ता में आने पर वे इसे भूल जाते हैं। 25 वर्षों में राज्य में एक भी नए जिले का गठन नहीं हो पाया है।नए जिलों के गठन की मांग के पीछे की मुख्य वजह ये है कि प्रदेश के 10 पर्वतीय जिलों में विकास और मूल भूत जरूरतों की अलग-अलग मांग रही है। इसे देखते हुए राज्य गठन के दौरान ही छोटी-छोटी इकाइयां बनाने की मांग की गई, जिससे न सिर्फ प्रशासनिक ढांचा जन-जन तक पहुंच सके, बल्कि प्रदेश के विकास की अवधारणा के सपने को भी साकार किया जा सके। दरअसल, सूबे में कोटद्वार समेत रानीखेत, प्रतापनगर, नरेंद्रनगर, चकराता, डीडीहाट, खटीमा, रुड़की और पुरोला ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें जिला बनाए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। कई सामाजिक संगठनों के साथ ही राजनीतिक दलों ने भी इस आवाज को समय-समय पर बुलंद किया है। वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रदेश में चार नए जिले बनाने की घोषणा की थी।उन्होंने गढ़वाल मंडल में 2 जिले (कोटद्वार, यमुनोत्री) और कुमाऊं मंडल में 2 जिले (रानीखेत, डीडीहाट) बनाने की बात कही थी। चुनावी साल में हुई इस घोषणा का शासनादेश भी जारी कर दिया गया था, लेकिन गजट नोटिफिकेशन नहीं हुआ। मुख्यमंत्री के पद से हटते ही यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इतना ही नहीं इसके बाद राज्य में कांग्रेस की सरकार आने के बाद तत्कालीन की सरकार ने इस मामले को राजस्व परिषद की अध्यक्षता में नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन संबंधी आयोग के हवाले कर दिया, लेकिन साल 2016 में मुख्यमंत्री बदलने के बाद मुख्यमंत्री सत्ता पर काबिज हुए और उन्होंने एक बार फिर 8 नए जिले बनाने की कवायद शुरू कर एक सियासी दांव खेला। साथ ही नए 8 जिलों (डीडीहाट, रानीखेत, रामनगर, काशीपुर, कोटद्वार, यमुनोत्री, रुड़की, ऋषिकेश) को बनाने का खाका भी तैयार कर लिया था, लेकिन कुछ नहीं हो पाया।उसके बाद से अभी तक नए जिले बनाए जाने की चर्चाएं हर सरकार के कार्यकाल में होती रही हैं। इस बार मुख्यमंत्री ने भी बीच में राज्य में नए जिले बनाए जाने की बात की थी, लेकिन वे इस दिशा में कुछ भी नहीं कर पाए। अपने चार वर्ष के इस कार्यकाल में धामी सरकार नए जिलों के गठन के मामले में एक कदम भी आग नहीं बढ़ी। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस प्रदेश के नए जिलों के गठन का मामला हर बार सियासत की भेंट चढ़ता रहा है। सूबे में विधानसभा चुनावों के दौरान नए जिलों के गठन का वादा किया जाता रहा है। न केवल पक्ष और विपक्ष की तरफ से नए जिलों के गठन के वादे किए जाते रहे हैं, बल्कि 2022 के विधानसभा चुनाव में तो पहली बार चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी के मुखिया ने भी राज्य में 6 नए जिलों के गठन का सपना दिखाया था। उन्होंने काशीपुर को जिला बनाने के लिए सार्वजनिक घोषणा की थी तो वहीं उनकी इच्छा यमुनोत्री, कोटद्वार, रुड़की, डीडीहाट और रानीखेत को भी जिला बनाने की थी, लेकिन आम आदमी पार्टी इस चुनाव में मटियामेट हो गई और नए जिले की बात भी गायब हो गई।
उत्तराखंड राज्य स्थापना से पहले से ही प्रदेश के कुछ जिले ऐसे रहे, जिनका क्षेत्रफल बेहद ज्यादा था। इसी वजह से दूरदराज और जिला मुख्यालयों से कटे होने की वजह से कई क्षेत्रों में नए जिलों के पुनर्गठन की मांग उठी थी। इसमें खासतौर पर चमोली जिला रहा, जिसका क्षेत्रफल काफी बड़ा था। इस जिले में जिन क्षेत्रों में नए जिलों की मांग उठी, इसमें थराली, गैरसैंण और कर्णप्रयाग क्षेत्र शामिल हैं। इसके अलावा हरिद्वार जिले में भी रुड़की के लिए मांग उठाई गई। उधर, उत्तरकाशी में यमुनोत्री, पिथौरागढ़ में डीडीहाट और पौड़ी जिले में कोटद्वार समेत उधम सिंह नगर में काशीपुर को जिला बनाए जाने की मांग उठती रही है। उत्तराखंड में नए जिलों के गठन की मांग पिछले लंबे समय से की जा रही है, लेकिन सरकार इस मांग को पूरा नहीं कर पाई है। हर विधानसभा चुनाव में अपने घोषणा पत्र में राजनीतिक दल नए जिलों के गठन का वायदा करते हैं, लेकिन सत्ता में आने पर वे इसे भूल जाते हैं। 25 वर्षों में राज्य में एक भी नए जिले का गठन नहीं हो पाया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने जिलों का गठन न होने के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण किया, मगर यह भी सही है कि दोनों ने ही अब तक जिलों के मसले को खास तवज्जो नहीं दी है। हालांकि सरकार ने इस विषय पर विचार की बात कही है। इसे लेकर वह क्या कदम उठाती है यह तो भविष्य के गर्त में छिपा है। अलबत्ता पिछले अनुभवों को देखते हुए यह साफ है कि आगामी विधानसभा चुनाव में जिलों का मसला फिर से गूंजेगा। जिलों का सपना या रहेगा सिर्फ ज़ुमला?लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











