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उत्तराखंड में सपना बनी मेट्रो ट्रेन, करोड़ों खर्च, फिर भी एक ईंट तक नहीं लगी

10/06/25
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

देश में नियो मेट्रो दौड़ाने का सपना देख रहे दून की उम्मीदों पर अभी इंतजार के बादल छाये हुए हैं। मेट्रो ट्रेन एक सपना जैसा लगने लगा है. चार साल पहले सरकार ने मेट्रो ट्रेन चलाने का ऐलान किया था. मेट्रो के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च भी किए गए, लेकिन हकीकत यही है कि मेट्रो के लिए अभी तक एक ईंट भी नहीं लगी है. पिछले चार सालों से उत्तराखंड में मेट्रो के नाम पर केवल बातें की जा रही हैं. ऐसे में मेट्रो प्रोजेक्ट अधर में लटका दिखाई दे रहा है. वर्ष 2017 में दून ने मेट्रो रेल का एक हसीन ख्वाब देखा था। ख्वाब में हसीन भविष्य के इतने रंग उमड़-घुमड़ रहे थे कि सरकार ने भी झटपट उत्तराखंड मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन का गठन कर डाला। हाथों-हाथ देहरादून से लेकर हरिद्वार, ऋषिकेश व मुनिकीरेती तक मेट्रोपोलिटन क्षेत्र घोषित कर दिया गया। करीब दो साल के अथक प्रयास के बाद परियोजना की डीपीआर बनाई गई और तय किया गया कि पहले चरण में करीब पांच हजार करोड़ रुपये की लागत से दून में आइएसबीटी से कंडोली व एफआरआइ से रायपुर के कॉरीडोर का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए तमाम संसाधन जोड़े गए और पांच करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च करने के बाद अब मेट्रो का सफर लगभग समाप्त भी हो गया है। इसी वर्ष नई सरकार आई। स्टडी के लिए विदेश तक के टूर हुए। लेकिन, करीब 7 वर्ष का समय पूरा हो गया है। अब तक मेट्रो के नाम पर एक ईंट भी नहीं लग पाई। बेशक, दिल्ली मेट्रो जैसे से लेकर केबिल कार, पॉड कार तक की प्लानिंग हो चुकी हैं। लेकिन, ये सपना कब पूरा होगा, कोई कह नहीं सकता है। हां, इतना जरूर है कि मेट्रो कॉर्पोरेशन के नाम एमडी से लेकर तमाम डायरेक्टर, अधिकारी व कार्मिकों की फौज तैनात है। हर माह लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं। इसी पर दैनिक जागरण आई नेक्स्ट से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोगों से राय जाननी चाही। मिली पब्लिक ओपनियन में 50 परसेंट लोगों का कहना है कि अब मेट्रो का ही ऑफिस बंद कर देना चाहिए। जबकि, 48 परसेंट लोगों ने कहा कि मेट्रो के नाम पर हो रही बातें केवल हवा-हवाई ही हैं। राजधानी दून में वाहनों व पॉल्यूशन बढ़ता जा रहा है। सरकार 7 सालों से मेट्रो संचालन की बात कह रही है। मेट्रो के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैैं। क्या दून में मेट्रो का सपना पूरा होगा।? ज्यादा महीने नहीं हुए, जनवरी 2024 में तत्कालीन सीएस की अध्यक्षता में मेट्रो को लेकर बैठक हुई। जिसें मेट्रो की कम संभावनाओं के बीच पॉड कार को लेकर सर्वेक्षण के लिए कहा गया। जबकि, उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन क्र(यूकेएमआरसीक्र) ने दून में नियो मेट्रो को लेकर प्रस्ताव दिया था। जिसके बाद केंद्र को प्रस्ताव भेजा गया। अब तक इस पर स्थिति साफ नहीं है। सरकार हरिद्वार पीआरटी संचालन पर भी तैयार थी। यूकेएमआरसी ने निविदा निकाली। लेकिन, अब तक कोई कंपनी सामने नहीं आई। अब तय किया गया है कि हरिद्वार व दून पीआरटी का निर्माण हाईब्रिड एन्यूटी मॉडल (हैम) के तहत करेगी। मंथन हुआ ििक सरकार डेवलपर को प्रोजेक्ट में होने वाले खर्च का 40 परसेंट पेमेंट काम शुरू होने से पहले कर देती है। बाकी 60 परसेंट डेवलपर को खुद लगानी होती है। 15 साल बाद अगर डेवलपर को घाटा हुआ तो 60 परसेंट धनराशि प्रतिवर्ष 80 से 100 करोड़ डेवलपर को लौटा देगी। मेट्रो रेल कार्पोरेशन के मुताबिक नियो मेट्रो प्रोजेक्ट करीब 1900 करोड़ रुपये की थी। डीपीआर राज्य के बाद फाइनल टच देने के लिए केंद्र को भेजी गई। प्रोजेक्ट में राज्य व केंद्र 20-20 परसेंट बजट देंगे। बाकी 60 परसेंट राशि लोन से जुटाई जाएगी। देश में नियो मेट्रो दौड़ाने का सपना देख रहे दून की उम्मीदों पर अभी इंतजार के बादल छाये हुए हैं। उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन (यूकेएमआरसी) ने परियोजना को लेकर सभी तैयारियां कर ली हैं। सबसे बड़ी चुनौती भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही भी हो चुकी है, लेकिन केंद्र सरकार से प्रोजेक्ट को हरी झंडी नहीं मिली है। मेट्रो कॉरपोरेशन के कार्यालय में इस समय 28 कर्मचारी काम कर रहे हैं. कॉरपोरेशन का कार्यालय भी किराए पर है. उसके बाद कर्मचारियों की सैलरी, ऑफिस किराया समेत अन्य खर्चों पर तकरीबन सरकार हर महीने 55 से 60 लाख खर्च करती है. इसके अलावा मेट्रो के नाम पर अलग-अलग लेटेस्ट टेक्नोलॉजी की आड़ में मंत्री और अधिकारी कई विदेश दौरे भी कर चुके हैं, लेकिन देहरादून में मेट्रो प्रोजेक्ट का रिजल्ट शून्य है. सरकार को यह बताना होगा कि नियो मेट्रो के संचालन के लिए धनराशि कैसे जुटाई जाएगी। क्योंकि, केंद्र सरकार पहले ही दून की मेट्रो को ठंडे बस्ते में डाल चुकी है। इस नाउम्मीदी से पहले केंद्र सरकार ने ही परियोजना की उम्मीद जगाई थी। उसी जोश में 08 जनवरी 2022 को नियो मेट्रो की डीपीआर राज्य कैबिनेट से पास कर चार दिन के भीतर ही 12 जनवरी को डीपीआर केंद्र सरकार को भेज दी गई थी।लेकिन, दो साल बाद भी जब केंद्र ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई या इशारों में इन्कार कर दिया तो राज्य ने अपने बूते इसे धरातल पर उतारने का दंभ भरा। प्रस्ताव को मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाले पब्लिक इन्वेस्टमेंट बोर्ड (पीआइबी) के समक्ष भी रखा जा चुका है, लेकिन वित्त विभाग परियोजना पर 2300 करोड़ रुपए की भारीभरकम धनराशि खर्च करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है।वहीं इसके पीछे राजनीतिक लोगों की कमजोर इच्छा शक्ति और अधिकारियों में दूरदर्शिता की कमी भी साफ तौर पर देखी जा सकती है. दूसरी तरफ 31 जनवरी 2025 को जब मेट्रो का ताना बाना बुनने वाले प्रबंध निदेशक की कुर्सी से बिना एक्सटेंशन के रिटायर हुए तो रही सही उम्मीद भी धूमिल हो गई थी। हालांकि, इसके बाद निदेशक प्रोजेक्ट को कार्यवाहक एमडी की जिम्मेदारी देकर किसी तरह कारपोरेशन की गाड़ी खींची गई और अब वह भी अब इससे उतर चुके हैं। फिलहाल, मेट्रो रेल कारपोरेशन फिर से एमडी विहीन हो गया है और नए एमडी के चयन के लिए मुख्यमंत्री के रुख पर निगाह टिकी है। उनका निर्णय ही परियोजना का भविष्य तय करेगा। मेट्रो रेल परियोजना सरकार के लिए गले की हड्डी बन गई है। न निगली जा सके और न उगली। नियो मेट्रो के संचालन के लिए 2300 करोड़ से अधिक की धनराशि चाहिए और यदि कदम पीछे खींच लिए जाएं तो भारी किरकिरी होगी। सवाल पूछे जाएंगे कि ऐसा ही करना था तो उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन का तामझाम क्यों जोड़ा? क्यों वर्ष 2017 से अब तक बिना धरातलीय काम के 90 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि फूंक दी गई।समय के साथ निरंतर डगमगाती जा रही मेट्रो परियोजना की गाड़ी से पहले प्रबंधन निदेशक (एमडी) उतर चुके हैं और कार्यवाहक एमडी की जिम्मेदारी संभाल रहे की एक्सटेंशन अवधि भी 31 मई को पूरी हो चुकी है। इसी बीच आखिरी सांस गिन रही मेट्रो परियोजना में प्राण फूंकने के लिए नए एमडी के चयन की औपचारित पूरी की जा चुकी है। अब यह फाइल मुख्यमंत्री के पास भेजी गई है।दून में नियो मेट्रो के संचालन के लिए यह समय या तो ताबूत की आखिरी कील साबित होगा या यहां से परियोजना को नई जान मिलेगी। अब मुख्यमंत्री को तय करना है कि नए एमडी की ताजपोशी की जाए या परियोजना के अध्याय को बंद कर दिया जाए। क्योंकि, नए एमडी की ताजपोशी के साथ ही नियो मेट्रो के संचालन की प्रतिबद्धता भी जाहिर करनी होगी। है। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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