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*भारतीय व्यापारियों को आर्थिक नुकसान की चिंता

03/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत-चीन सीमा पर व्यापार को लेकर लगातार विवाद होते जा रहे हैं एक बार फिर छह साल बाद शुरू हो रहे भारत-चीन सीमा व्यापार से स्थानीय व्यापारियों को काफी उम्मीदें थीं. चीन की ओर से केवल 20 व्यापारियों को तकलाकोट मंडी जाने की अनुमति मिलने से अधिकांश व्यापारियों को निराशा होने के साथ ही परेशान भी हैं. चीन से व्यापार के लिए ट्रेड पास बनवा चुके 62 में से 42 व्यापारी फिलहाल व्यापार नहीं कर सकेंगे. चीन सीमा व्यापार शुरू होने की उम्मीद में व्यापारियों ने करीब एक माह पहले ही गूंजी में गुड़, मिश्री और अन्य सामान पहुंचा दिया था.कुछ दिन पूर्व में ही चीन की ओर से मिले संदेश में स्पष्ट किया गया कि फिलहाल केवल उन्हीं 20 व्यापारियों को तकलाकोट मंडी आने की अनुमति दी जाएगी, जिनका पहले से वहां सामान रखा हुआ है. इसके बाद प्रशासन और भारत-चीन व्यापार समिति ने संबंधित व्यापारियों की सूची चीन को भेज दी. 1 अगस्त से व्यापार शुरू भारत-चीन व्यापार समिति के अध्यक्ष ने बताया गया कि, पहले 8 जून से ही व्यापार शुरू होना था लेकिन उससे पहले ही चीन ने तकलाकोट मंडी में भारतीय व्यापारियों के लिए पर्याप्त दुकानें और गोदाम न होने की बात कहकर अनुमति नहीं दी थी. व्यापारी गुंजी तक पहुंच गए थे लेकिन फिर उनको सामान गुंजी में छोड़कर वापस लौटना पड़ा. अबतक गूंजी में रखा गुड़, मिश्री और अन्य सामान बारिश के कारण खराब होने लगा है. इस सामान की मात्रा करीब 3 हजार क्विंटल है. उन्होंने कहा कि, यदि अन्य व्यापारियों को भी जल्द अनुमति नहीं मिली तो उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा. हालांकि, चीन ने नेपाली व्यापारियों को जून में ही अनुमति दे दी थी और वहां नेपाली व्यापारियों का कारोबार जारी है. तब से भारतीय व्यापारी अनुमति का ही इंतजार कर रहे थे. व्यापार समिति ने बताया कि, पिछले 6 साल से एक करोड़ रुपए से ज्यादा का सामान तकलाकोट मंडी में फंसा हुआ है. यही नहीं, भारत से साथ व्यापार बंद रहने के दौरान तकलाकोट पुरानी मंडी की कई दुकानें नेपाली और अन्य व्यापारियों को आवंटित कर दी गई हैं. और इस बार भारत के लिए चीन द्वारा नई ट्रेड मंडी विकसित की है. यहीं पर भारतीय ट्रेडर्स को दुकानें आवंटित होंगी. इसके साथ ही उप जिलाधिकारी व व्यापार अधिकारी ने बताया कि, जिन व्यापारियों की दुकानें या सामान 2019 से तकलाकोट मंडी में है उन्हीं को पहले बैच में अनुमति दी गई है. चीन प्रशासन ने व्यापारियों की सूची फिर से मांगी थी. यह दल नया सामान नहीं ले जाएगा बल्कि पहले तकलाकोट पहुंचकर पुराने सामान, गोदामों और दुकानों की स्थिति देखेगा. उसके बाद ही नए सामान पर विचार होगा.गौर हो कि लिपुलेख से शुरू होने वाला यह व्यापार स्थानीय व्यापारियों के लिए काफी अहम होता है. यह व्यापार केवल वस्तुओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है. ये व्यापार सीमांत क्षेत्रों के विकास का अहम माध्यम भी है. व्यापार से स्थानीय युवाओं को रोजगार व पर्यटन को बढ़ावा मिलता है. साथ ही क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को भी तेज मिलती है. बताते चलें कि अतीत से ही लिपुलेख दर्रे से भारत और तिब्बत के बीच पारंपरिक व्यापार होता रहा है. लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इसका असर देखने को मिला. जिसका असर दोनों देशों के व्यापारियों पर पड़ा. भारत-चीन युद्ध के बाद व्यापार बंद हो गया था. साल 1992 में तकलाकोट (पुरंग) मंडी के जरिए व्यापार फिर शुरू हुआ. साल 2019 में कोरोना के दौरान व्यापार फिर बंद हो गया था. वहीं 6 साल बाद व्यापार फिर शुरू हुआ है. लेकिन चीन ने सिर्फ 20 व्यापारियों को व्यापार करने की अनुमति दी है. जिससे बाद सीमांत के व्यापारियों का गूंजी में रखा सामान खराब होने लगा है.भारत-तिब्बत ट्रेड पास पंजीकृत व्यापारियों, उनके सहायकों, पोर्टर, कुली और म्यूल (खच्चर) चालकों को जारी किया जाता है. ट्रेड पास के लिए आवेदक का नाम सीमा व्यापार या पंजीकृत व्यापारी सूची में होना आवश्यक है. जिसके बाद आवेदन ट्रेड कार्यालय या जिला प्रशासन के पास जमा किया जाता है.ट्रेड पास के आवेदन मिलने पर एसआईबी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ब्रांच) व अन्य सुरक्षा और प्रशासनिक जांच होती है. सभी जांच होने के बाद ट्रेड पास दिया जाता है. ट्रेड पास के लिए पहचान पत्र, स्थानीय निवासी या व्यापारी प्रमाण, व्यापार पंजीकरण दस्तावेज, फोटो और सुरक्षा स्वीकृति से जुड़े रिकॉर्ड की जरूरत पड़ सकती है. उसके बाद ही व्यापार के पास बनाए जाते हैं. यह व्यापार लिपुलेख दर्रे से होकर होता है. जिसमें आयात ऊन, पश्मीना, नमक, बोरेक्स, रेशम, मक्खन, याक के बाल और खाल किया जाता है. निर्यात की बात करें तो भारत से कपड़ा, कंबल, मसाले, आटा, सूखे मेवे, सब्जियां, तांबे के उत्पाद, कृषि उपकरण, स्टेशनरी, जूते और वनस्पति तेल आदि जाता है. जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है. आसान शब्दों में कहें तो 100 रुपये के कुल विदेशी सामान में से 13 रुपये का सामान भारत अकेले चीन से खरीदता है. सवाल यह है कि वह कौन सा ऐसा सामान है जिसके लिए भारत, चीन की तरफ देखने के लिए मजबूर है. समग्र रूप में देखा जाए तो विभिन्न देशों के बीच मुक्त व्यापार आज के वैश्विक दौर की आर्थिक ज़रूरत है और इसीलिये मुक्त व्यापार की राह में आने वाली बाधाओं को खत्म किया जाना चाहिये ताकि आर्थिक विकास का लाभ सभी देशों को मिल सके। लेकिन टैरिफ वॉर को लेकर बढ़ती चिंता और दुनियाभर में अपने उद्योगों के हितों की रक्षा के लिये अन्य देशों के सामने खड़ी की जा रही बाधाओं से वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान होने की आशंका है। सभी देशों के व्यापक हितों के लिये यह आवश्यक है कि व्यापार की राह में आने वाली बाधाओं को कम किया जाए। कोई भी देश सभी वस्तुएँ नहीं बना सकता या कम-से-कम कीमत पर बेहतरीन गुणवत्ता चाहने वाले उपभोक्ताओं के लिये सभी सेवाएँ मुहैया नहीं करा सकता। इसे देखते हुए मुक्त व्यापार (Free Trade) व्यवस्था की ज़रूरत है। मुक्त व्यापार बढ़ने से न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी, बल्कि सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को फायदा होगा। लेकिन हालात और कोशिशों के बीच का फर्क अर्थशास्त्र की डिमाण्ड और सप्लाई के सिध्दांत की याद दिलाता है। जब सारी गतिविधियां तालाबन्दी के चलते ठप पड़ जाए तो फिर रोजगार, अर्थव्यवस्था और जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट) यानी सकल घरेलू उत्पाद में वृध्दि की बात बेमानी हो जाती है। यात्रा से मार्गों पर स्थित छोटे व्यापारियों, ढाबा संचालकों, दुकानदारों और सेवा शिविरों को भी बड़ा आर्थिक लाभ मिलता है। लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही से स्थानीय बाजारों में कारोबार बढ़ता है और सामाजिक सहयोग की भावना भी मजबूत होती है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.
यात्रा से मार्गों पर स्थित छोटे व्यापारियों, ढाबा संचालकों, दुकानदारों और सेवा शिविरों को भी बड़ा आर्थिक लाभ मिलता है। लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही से स्थानीय बाजारों में कारोबार बढ़ता है और सामाजिक सहयोग की भावना भी मजबूत होती है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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