डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देवभूमि उत्तराखंड की पहचान कभी आयुर्वेद, जड़ी-बूटियों और स्वास्थ्य पर्यटन से होती थी, लेकिन अब वही राज्य धीरे-धीरे नकली दवाओं के नेटवर्क का सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है। जांच में सामने आया कि रुड़की, भगवानपुर और कोटद्वार की फैक्ट्रियों में नामी कंपनियों की हूबहू दवाएं तैयार की जा रही थीं और उन्हें बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब और चंडीगढ़ तक सप्लाई किया जा रहा था। इनमें कैंसररोधी दवाओं से लेकर ब्लड प्रेशर, दर्द, संक्रमण और मिर्गी में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल थीं। यानी मरीज इलाज नहीं, बल्कि ‘धीमा जहर’ खरीद रहे थे। सरकार ने उत्तराखंड को फार्मा हब बनाने के लिए उद्योगों को जमीन, टैक्स छूट और सुविधाएं दीं। हरिद्वार, रुड़की, भगवानपुर, सेलाकुई और कोटद्वार जैसे क्षेत्रों में दवा उद्योग तेजी से बढ़े, लेकिन इन्हीं औद्योगिक क्षेत्रों में नकली दवा सिंडिकेट भी पनप गया।फर्जी रैपर, नकली क्यूआर कोड, डुप्लीकेट पैकिंग और ब्रांडेड कंपनियों के हूबहू लेबल तैयार किए जा रहे थे। एसटीएफ की जांच में सामने आया कि कुछ फैक्ट्रियां कागजों में बंद थीं, लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें खोलकर नकली दवा बनाई जाती थी। यानी पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से संचालित हो रहा था। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इतनी बड़ी मात्रा में नकली दवाएं बन रही थीं और देशभर में सप्लाई हो रही थीं, तब ड्रग विभाग आखिर क्या कर रहा था? नियमित निरीक्षण, सैंपलिंग व निगरानी की जिम्मेदारी ड्रग विभाग की है।इसके बावजूद बार-बार नकली दवा फैक्ट्रियां पकड़ी जा रही हैं। रुड़की और हरिद्वार क्षेत्र में पहले भी कई बार नकली दवा निर्माण पकड़ा जा चुका है। कुछ फैक्ट्रियां सील हुईं, मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन कुछ समय बाद फिर नया नेटवर्क सक्रिय हो गया। अब तक किसी एजेंसी ने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि कितने मरीजों तक ये दवाएं पहुंचीं व कितने मेडिकल स्टोर इनके संपर्क में थे। कितने अस्पतालों में यह सप्लाई हुईं व कितने लोगों की सेहत इससे प्रभावित हुई। यदि खाद्य पदार्थ में मिलावट मिले तो सार्वजनिक अलर्ट जारी होता है, लेकिन नकली दवा पकड़े जाने के बाद स्वास्थ्य विभाग की ओर से शायद ही कभी जनता को चेतावनी दी जाती हो। नकली दवा का कारोबार सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सुनियोजित ‘साइलेंट किलिंग’ है। जरूरत है राज्यभर की फार्मा यूनिट्स के विशेष आडिट, ड्रग इंस्पेक्टरों की जवाबदेही तय करने, आनलाइन दवा बिक्री की निगरानी, सप्लाई चैन और वित्तीय नेटवर्क की जांच और उन अधिकारियों की भूमिका खंगालने की, जिनके क्षेत्रों में यह नेटवर्क फलता-फूलता रहा। क्योंकि यदि सिस्टम की मिलीभगत नहीं थी, तो फिर इतनी बड़ी ‘मौत की इंडस्ट्री’ आखिर चल कैसे रही थी? केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की ओर से देशभर से लिए गए कुल 120 दवा सैंपल फेल पाए गए हैं। इनमें से 24 सैंपल उत्तराखंड के ही हैं। जांच में फेल हुई दवा में खांसी-जुकाम, बुखार, मानसिक रोग, पेट के कीड़े, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, एसिडिटी, बैक्टीरियल संक्रमण और गर्भ संबंधी उपयोग की दवाएं शामिल हैं। स्थानीय रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि, जिन जगहों पर दवाइयां तैयार की जा रही थीं, वहां न तो मेडिकल सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा था और न ही कर्मचारियों के पास कोई तकनीकी प्रशिक्षण था. कई कर्मचारी बिना मास्क, ग्लव्स और सुरक्षा उपकरणों के दवा निर्माण में लगे हुए थे. ऐसी परिस्थितियों में तैयार दवाइयां मरीजों के लिए बेहद घातक साबित हो सकती हैं. नकली दवाओं का सेवन बीमारी को बढ़ाने के साथ-साथ मरीज की जान भी जोखिम में डाल सकता है. एसटीएफ एसएसपी की मानें तो इस कारोबार में कुछ दवा विक्रेताओं की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है. कम कीमत में दवाइयां खरीदकर उन्हें प्रिंटेड एमआरपी पर बेचने का खेल लंबे समय से चल रहा था. मोटे मुनाफे के लालच में कई लोग बिना सत्यापन इन दवाओं को बाजार में उतार रहे थे. यही कारण है कि नकली दवाओं का यह नेटवर्क धीरे-धीरे कई राज्यों में फैलता चला गया. एसटीएफ ने इस मामले को केवल दवा तस्करी नहीं बल्कि संगठित आपराधिक नेटवर्क माना है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस तरह की घटनाएं अकेली नहीं हैं। हाल के महीनों में उत्तराखंड में घटिया या नकली दवाओं से जुड़े मामलों में चिंताजनक वृद्धि देखी गई है। मई में, अधिकारियों ने रुड़की के पास एक कारखाने को बिना लाइसेंस के दर्द निवारक दवाएं बनाने के आरोप में सील कर दिया था, जबकि हरिद्वार में एक अन्य कारखाने में भी घटिया कच्चे माल का उपयोग करके एंटीबायोटिक सिरप का निर्माण किया जा रहा था। इसी साल की शुरुआत में, औषधि नियंत्रण विभाग और स्थानीय पुलिस की संयुक्त छापेमारी में काशीपुर में एक गोदाम का पता चला, जहां नकली समाप्ति तिथियों के साथ दोबारा लेबल लगाकर बेची जा रही एक्सपायर्ड दवाओं का भंडारण किया जा रहा था।निश्चित रूप से, ये मामले दवा आपूर्ति श्रृंखला में व्याप्त गंभीर गड़बड़ी को दर्शाते हैं, विशेष रूप से राज्य के अनियंत्रित और दूरस्थ क्षेत्रों में। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के ऑपरेशनों का वास्तविक पैमाना वर्तमान में दर्ज आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकता है। नकली दवा बनाने वालों द्वारा असली पैकेजिंग की आसानी से नकल कर लेने और नियमित निरीक्षणों की अपर्याप्तता ने ऐसी अवैध गतिविधियों को बढ़ावा दिया है।इस विषय में उच्च स्तर पर वार्ता की जाएगी। अगर जल्द ठोस योजना नहीं बनीं तो स्थिति और गंभीर होगी।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











