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विदेशी साधकों के अध्यात्म को मुखर बनाता हिमालय का मौन कर्मयोगी

10/12/25
in उत्तराखंड, दुनिया, यात्रा
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एक समय यदि भारत को विश्व गुरु कहा जाता था तो उसकी तार्किक वजह थी। आर्थिक समृद्धि से उपजी विसंगतियां भारत की सॉफ्ट पावर आध्यात्म पश्चिमी जगत समेत पूरी दुनिया को सम्मोहित करता रहा है। प्राच्य विद्या, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और अध्यात्मिक ऊर्जा भारत की बहुमूल्य धरोहर सदैव रही है। यही वजह है कि जीवन के सत्य की तलाश में तमाम विदेशी लोग भारत आते रहे हैं। हालांकि, विडंबना यह है कि आज आम भारतीय उन पश्चिमी जीवन मूल्यों व भौतिक लिप्साओं को अपना आदर्श मानने लगा है, जिससे पश्चिमी जगत उकता चुका है।
पिछले दिनों ऋषिकेष से कोई चालीस किलोमीटर की दूरी पर टिहरी गढ़वाल के अंतर्गत आने वाले सिंगथाली गांव के निकट बड़ी संख्यों में विदेशी योगनियों की सक्रियता और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र बना हुआ था। जो स्थानीय लोगों के लिए कौतुहल का विषय बना रहा। इन विदेशी साधकों की हिमालय की शक्तियों को जानने की तीव्र आकांक्षा मुखरित हो रही थी। ये साधक कभी देवप्रयाग के संगम में श्रद्धानत होकर डुबकी लगाते, कभी ऋषिकेश तो कभी हरिद्वार के गंगा तटों पर सूर्य साधना करते नजर आते। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों ‘अवेकन – द जर्नी ऑफ सेल्फ-डिस्कवरी ’ मुहिम में भाग लेने दुनिया के तीस देशों के करीब डेढ़ सौ साधक उत्तराखंड आए हुए थे। इन योग साधकों में अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, चीन , साइप्रस, सिंगापुर, ताइवान, हांगकांग,मलेशिया, यूएई, वियतनाम, मॉरीशस, त्रिनिदाद और यूरोप के कई देशों की योगनियां शामिल थीं।
सही मायनो में हिमालय एक ऐसा पवित्र स्थान रहा है, जहां प्राचीन योगिक ज्ञान, ऊर्जा प्रक्रियाएं और चेतनाधारित साधनाएं अपने शुद्धतम रूप में मानव कल्याण के लिये प्रवाहित होती रही हैं। निस्संदेह, दुनियाभर से आने वाले योग साधकों की सक्रिय भागीदारी हिमालयीय परंपरा में बढ़ते वैश्विक विश्वास और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की भागीदारी का प्रमाण है।
दरअसल, इस बहु-स्तरीय हिमालयीय साधना में साधक प्रत्येक दिन शरीर, मन, ऊर्जा और चेतना के नए आयाम खोलने के प्रयास करते हैं। हिमालय सिद्ध अक्षर के मार्गदर्शन में प्रतिभागी प्राचीन तकनीकों और गहन रूपांतरकारी अनुभवों से गुजरते हैं। वे दिन की शुरूआत शास्त्रीय हिमालयी योग परंपरागत आसन अभ्यास से करते हैं। फिर वे अपनी मुख्य नाड़ियों इड़ा,पिंगला और सुषुम्ना को सक्रिय करने हेतु श्वास तकनीकों का सहारा लेते हैं। वहीं मन-शरीर सक्रिय करने के लिये सूर्य साधना व पंचतत्व संयोजन का आश्रय लेते हैं। हिमालय की शांत वादियों में कुदरत के मौन के साथ गंगा तट पर ये साधनाएं पूरी की जाती हैं।
वास्तव में, ये विदेशी साधक आंतरिक, बाह्य व अवचेतन की जागरूकता के लिये दुर्लभ हिमालयी अभ्यासों का सहारा लेते हैं। जिसमें श्वास नियमन से शरीर के ऊर्जा चैनलों को मजबूती दी जा सके। निस्संदेह, श्वास साधनाएं मनुष्य में जागरूकता, स्थिरता और अंतर्ज्ञान को परिष्कृत करती हैं। ध्यान साधना की ये तकनीकें आम से हटकर खास सिद्ध परंपरा की तकनीकें रही हैं। जिन्हें अब जन-जन तक पहुंचाने का ऋषिकर्म हिमालय सिद्ध द्वारा किया जा रहा है। देश-विदेश में इन प्रयासों का सकारात्मक प्रतिसाद भी मिल रहा है।
दरअसल, ऐसे अभियानों के जरिये मानव ऊर्जा संरचना संवर्धन, योगिक चेतना में विस्तार, प्रकृति की कॉस्मिक ऊर्जा और उसके जीवन पर प्रभाव का मूल्यांकन किया जाता है। जिसके जरिये प्रतिभागी सीखते हैं कि ध्यान व श्वास क्रियाओं का अपने जीवन के निर्णयों और जीवन शुद्धि में कैसे उपयोग किया जाए। इसके साथ ही ध्यान एवं स्थिरता प्रशिक्षण के लिये त्राटक, पूर्णिमा व जल तत्वध्यान, मेरुदंड जागरण, उच्च आवृत्ति के साथ श्वास सामंजस्य, हिमालयी मौन साधन का सहारा लिया जाता है। लंबी साधना और सात्विक जीवन के अंगीकार के बाद ये अभ्यास साधक के लिये प्रखर बुद्धि व गहरी अंतर्दृष्टि के द्वार खोलते हैं।
दरअसल, यही वजह है कि योग के गूढ़ लक्ष्यों को हासिल करने के लिये दुनिया के कोने-कोने से आये साधक सनातन परंपरा के स्रोत और गंगा,यमुना और सरस्वती के संगम देवप्रयाग की यात्रा से सम्मोहित होते हैं। जहां वे जल-तत्व साधना, कर्म-शुद्धि अनुष्ठान, पंचतत्व आह्वान, पारंपरिक सिद्धा अर्पण करते हैं। वास्तव में, हिमालय के ये स्थल ऊर्जा के गहन संयोग से युक्त हैं,जो कि साधक की साधना के फलकों को कई गुना बढ़ा देते हैं।
सही मायनो में, विदेशी साधक इस तरह के योग आयोजनों के जरिये चेतना विकास, हिमालयीय दर्शन, कर्म सिद्धांत दृष्टि, समृद्धि दृष्टि, सूर्य-चंद्र ऊर्जा संतुलन, जीवन को कॉस्मिक चक्रों के अनुरूप जीने की कला सीखते हैं। जो साधकों के जीवन में परिवर्तनकारी बताए जाते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले दिनों उत्तराखंड में दुनिया के तीस देशों से आए ये डेढ़ सौ साधक साधना के दिनों में हिमालयी संस्कृति के अनुरूप परंपरा, पवित्रता और शुचिता का अनुपालन करते रहे हैं। इस दौरान तामसिक भोजन व पेय से ही नहीं बल्कि प्याज, लहसुन व कैफीन का भी परहेज करते रहे हैं। दरअसल, हिमालयी साधना की परंपरा में गहन ऊर्जा साधना और ध्यानावस्था की सार्थकता के लिये वैचारिक व खानपान की पवित्रता को प्राथमिकता दी जाती।
बेंगलुरू स्थिति योग अनुसंधान संस्थान अक्षर योग केंद्र के सूत्रधार हिमालय सिद्ध अक्षर की उपस्थिति योग साधकों को ऊर्जा दे जाती है। पिछले वर्षों में संस्थान विभिन्न आसनों के प्रदर्शनों के जरिये विश्व विख्यात गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड में 21 रिकॉर्ड दर्ज करा चुका है। जिसके बाद संस्थान के अनुयायियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। हिमालय सिद्ध अक्षर बताते हैं कि योग को वैश्विक मान्यता मिलने के बाद दुनिया के लाखों साधक भारत आकर योग की जन्मभूमि के अहसास महसूस करना चाहते हैं। दरअसल, भौतिक सुखों की विसंगतियां इनको उपभोक्तावादी संस्कृति से विमुख कर रही हैं। वे सुकून की तलाश में योग की जन्मभूमि भारत के सात्विक सम्मोहन में बंधे चले आते हैं। उन्हें दुनिया की कोई भौगोलिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व धार्मिक सीमाएं बांध नहीं पातीं। विडंबना यह है कि विदेशों में लोग जिस भौतिक संस्कृति का परित्याग करने को प्रयासरत हैं, भारत में उसका अनुकरण शान समझा जाता है। ऐसे में योग का सान्निध्य निस्संदेह,हमें सुखमय जीवन की राह दिखाता है। यही मनुष्य के तन-मन की शांति और आध्यात्मिक उत्थान की राह भी है। ऐसे में भारत सरकार व हिमालयी राज्यों की सरकारों का भी दायित्व बन जाता है कि हिमालय की अस्मिता की रक्षा का प्राणपण से प्रयास करें। विकास का वो माडल अपनाए जो प्रकृति व हिमालय की आत्मा को चोट न पहुंचाए। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि देशी-विदेशी साधक स्थानीय अर्थव्यवस्था के उत्थान में भी योगदान देते हैं।

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