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ब्रिटिश शासन के दौरान कुमाऊँ की इन फाउंड्रियों में बनाया जाता था लोहा

06/03/21
in उत्तराखंड, नैनीताल
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पूरब में इठलाती, बलखाती कोसी नदी, उत्तर में पहाड़ों के मनोरम दृश्य और पश्चिम में खुले आसमान के नीचे वन संपदा से आच्छादित नैनीताल जिले के रामनगर की खूबसूरती मन मोहने वाली है। 170 साल पुराने इस शहर के बारे में लोग यही सोचते हैं कि इसका नाम भगवान श्री राम के नाम से पड़ा होगा। मगर हकीकत यह है कि इसका नाम तत्कालीन कुमाऊँ कमिश्नर सर हेनरी रैमजे के नाम पर पड़ा। उन्होंने ही रामनगर को बसाया था। सन् 1858 में नैनीताल के कालाढूंगी में डेविड एंड कंपनी ने अपनी उत्तर भारत की सबसे बड़ी आयरन फाउंड्री की स्थापना की। फाउंड्री स्थापित करने का मुख्य मकसद कुमाऊं का विकास था। फैक्ट्री स्थापित होने पर कालाढूंगी के करीब ढाई सौ परिवारों को रोजगार मिला, लेकिन फाउंड्री में काला पत्थर गलाने के लिए भारी मात्रा में लकड़ी को जरूरत पड़ती थी। जिसके लिए जंगलों में लकड़ियों का बेतहाशा कटान होना शुरू हो गया। पेड़ों के लगातार हो रहे कटान और भट्टी से निकलने वाले धुंए से पर्यावरण पर प्रभाव पड़ने लगा। जिसको देखते हुए 1876 में तत्कालीन कमिश्नर सर हेनरी रैमसे ने इस फैक्टरी पर प्रतिबंध लगा दिया।

स्थानीय लोग बताते हैं कि लोहा फैक्ट्री का इतिहास कालाढूंगी कस्बे से जुड़ा हुआ है। कुमाऊंनी भाषा में काला ढूंग यानी काला पत्थर कहा जाता है। इसी से आज कालाढूंगी नाम पड़ा। आज भी कालाढूंगी में आयरन फाउंड्री मौजूद है, जो जर्जर हालत में है। लेकिन पहाड़ की तीनों अन्य आयरन फाउंड्री पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी हैं। कंपनी ने नैनीताल के कालाढूंगी, कोटाबाग, खुरपाताल और मुक्तेश्वर को रुड़की नाम दिया और चारों जगह पर आयरन फैक्ट्री की स्थापना की। इन फैक्ट्रियों में पहाड़ों से काला पत्थर निकालकर गलाया जाता था और उससे कच्चे लोहे का निर्माण किया जाता था। इस लोहे से रेल लाइन और पुलों का निर्माण किया जाता था। जिम कॉर्बेट पर लिखी गई किताब माई इंडिया में भी इस लोहे की भट्टी का जिक्र किया गया है।

वन किसी भी समाज का अभिन्न अंग होते हैं। वहां के आर्थिक जीवन का हिस्सा होते हैं। साथ ही साथ वहां के पर्यावरण संतुलन को भी संतुलित रखने में मददगार होते हैं। उत्तराखंड में इसी प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए निश्चित क्षेत्र में दो तिहाई यानी लगभग 66 प्रतिशत वनों का होना जरूरी है जिसमें मैदानी भू.भाग में लगभग 21 प्रतिशत वनों का होना जरूरी है। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में इसमें भारी बदलाव आया है जिससे पर्यावरणीय संतुलन के बिगड़ने का खतरा बन गया है। इसकी वजह शायद सरकार की इन वनों के प्रति उदासीनता, जनता में जागरूकता की कमी, कभी विकास के नाम पर, कभी सड़क बनाने के नाम पर, तो कभी भवन बनाने के नाम पर या किसी अन्य कारण से हर साल बेतहाशा वृक्षों का कटान। इस किताब में बताया गया है कि जंगलों का विनाश होने की आशंका के चलते इस कारखाने को बंद किया गया था। हालांकि भारत में फारेस्ट एक्ट 1878 के बाद ही बनाया गया और लागू हुआ पर सर रैमजे ने तराई.भावर में साल के वृक्षों के विनाशकारी विनाश को देखते हुवे व उन्हें अभय प्रदान करने हेतु सन 1855 में ही कुमाऊँ में इसे लागू कर दिया था।

स्थानीय लोगों के मुताबिक आज भी देसी और विदेशी पर्यटक इस ब्रिटिश कालीन फाउंड्री को देखने आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जरूरत है सरकार को इस पर ध्यान देने की, अगर सरकार इस पर ध्यान देते हुए इन फाउंड्री को संरक्षित करने का प्रयास करती है तो यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र और धरोहर के रूप में भी संरक्षित किया जा सकता है। कुमाऊँ कमिश्नर के रूप में उन्होंने अठाईस बेमिसाल वर्ष व्यतीत किये। अपने आकर्षक व्यक्तित्व, सर्वहित शुभचिन्तक, परोपकारी स्वाभाव व दयालु प्रवृत्ति के कारण वह हर कुमाँऊनी के दिल में राज़ करते थे। उनकी दरियादिली, परोपकारी स्वभाव व मददगार प्रवृत्ति के कारण ही लोग उन्हें कुमाऊँ के बेताज बादशाह की उपाधि से विभूषित करते थे। अपनी सहृदयता, करिश्माई व्यक्तित्व व परोपकारी स्वाभाव से सर हैनरी रैमजे ने स्थानीय निवासियों के दिल में अपनी एक ख़ास जगह बनायीं हुई थी।

सरकारी सेवानिवृत्ति के पश्चात भी लगभग आठ साल तक सर रैमजे कुमाऊँ में ही रहे। हालांकि उनका यही पर बस जाने का विचार था पर कुछ घरेलू अपरिहार्य कारणों से उन्हें वापस स्कॉटलैंड जाना पड़ा। सर हैनरी रैमजे के कुमाऊँ कमिश्नर रहते हुए उन्होंने इस क्षेत्र में अनेक सुधार व विकास के कार्य कियेण् हालांकि भारत में फारेस्ट एक्ट 1878 के बाद ही बनाया गया और लागू हुआ पर सर रैमजे ने तराई.भावर में साल के वृक्षों के विनाशकारी विनाश को देखते हुवे व उन्हें अभय प्रदान करने हेतु सन 1855 में ही कुमाऊँ में इसे लागू कर दिया था सर रैमजे के कार्यों व उनके योगदान व नाम को अमर रखने के लिए यहां के लोगों ने सम्मान पूर्वक अनेक विद्यालयोंए अस्पतालों व सड़कों आदि के नामकरण उन्हीं के नाम से किया है जिनमें प्रमुख रूप से रैमजे हाई स्कूल, अल्मोड़ा जिसे आज भी गांव के लोग या तो अपभ्रंशवश या फिर सर रैमजे के सम्मानवश प्यार से रामजी कॉलेज भी कहते हैं। तब यह उत्तर भारत के गिने.चुने स्कूलों में था। अल्मोड़ा में सन 1844 में इंग्लैंड की मिशनरी की सहायता से रैमजे हाई स्कूल को बनाया गया। सरकार को स्वयं ही अपने देश की आवश्यकता को ध्यान में रखकर अपनी क्षमता के अनुरूप उन्नति, विकास एवं पर्यावरण, संरक्षण हेतु नीतियों का निर्धारण करना चाहिए और इसमें विभिन्न संस्थाओं के साथ.साथ जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। जरूरत है सरकार को इस पर ध्यान देने कीए अगर सरकार इस पर ध्यान देते हुए इन फाउंड्री को संरक्षित करने का प्रयास करती है तो यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र और धरोहर के रूप में भी संरक्षित किया जा सकता है।

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