डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
गंगा और उसकी सहायक नदियों में रहने वाले अत्यंत संकटग्रस्त जलीय जीव घड़ियाल को लेकर एक राहत भरी खबर सामने आई है. भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा कराए गए व्यापक सर्वे में यह सामने आया है कि गंगा बेसिन की कई नदियों में आज भी घड़ियालों की मौजूदगी बनी हुई है. सर्वे के मुताबिक गंगा और उसकी सहायक कुल 22 नदियों में अध्ययन किया गया, जिनमें से 13 नदियों में 3 हजार से अधिक घड़ियाल पाए गए हैं. यह आंकड़ा जहां एक ओर उम्मीद जगाता है, वहीं दूसरी ओर संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत भी रेखांकित करता है.भारतीय वन्यजीव संस्थान ने घड़ियालों को लेकर यह सर्वे नवंबर 2020 में शुरू किया था, जो मार्च 2023 तक चला. करीब ढाई साल तक चले इस अध्ययन में न सिर्फ घड़ियालों की संख्या दर्ज की गई, बल्कि उनके आवास, प्रजनन क्षेत्रों, नदी के प्रवाह, मानव गतिविधियों के प्रभाव और भविष्य की संरक्षण संभावनाओं पर भी गहराई से काम किया गया. सर्वे के बाद मिले आंकड़ों के आधार पर संस्थान ने गंगा बेसिन में घड़ियालों की जनसंख्या स्थिति और संरक्षण कार्ययोजना पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है.रिपोर्ट के अनुसार गंगा और उसकी सहायक नदियों में कुल 3037 घड़ियाल दर्ज किए गए हैं. हालांकि सर्वे 22 नदियों में किया गया था, लेकिन घड़ियालों की उपस्थिति केवल 13 नदियों में ही पाई गई. यह तथ्य अपने आप में चिंता का विषय है, क्योंकि इसका सीधा मतलब है कि कई नदियां अब घड़ियालों के लिए अनुकूल नहीं रह गई हैं. उत्तराखंड के लिहाज से रामगंगा नदी से एक सकारात्मक संकेत मिला है. सर्वे के दौरान रामगंगा नदी में कुल 48 घड़ियालों की मौजूदगी रिकॉर्ड की गई, जो राज्य के लिए अच्छी खबर मानी जा रही है.वहीं सबसे उत्साहजनक नतीजे चंबल नदी से सामने आए हैं, जहां अकेले 2097 घड़ियाल पाए गए. चंबल नदी लंबे समय से घड़ियाल संरक्षण का प्रमुख केंद्र रही है और यह सर्वे उसके महत्व को एक बार फिर साबित करता है. भारतीय वन्यजीव संस्थान की इस रिपोर्ट को किताब के रूप में भी प्रकाशित किया गया है, जिसका विमोचन केंद्रीय जल शक्ति मंत्री द्वारा किया गया. इस रिपोर्ट में घड़ियाल संरक्षण से जुड़े सभी प्रमुख तथ्यों, आंकड़ों और सिफारिशों को शामिल किया गया है. खास बात यह है कि रिपोर्ट केवल संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नदियों में घड़ियालों के लिए अनुकूल माहौल बनाए जाने पर विशेष जोर दिया गया है. रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि नदियों में बढ़ता प्रदूषण, मछली पकड़ने के लिए जालों का अंधाधुंध इस्तेमाल, रेत खनन और मानव गतिविधियों का दबाव घड़ियालों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुका है. मछली पकड़ने के जाल में फंसकर घड़ियालों की मौत के मामले भी सामने आते रहे हैं, जबकि रेत खनन से उनके प्रजनन स्थल प्रभावित हो रहे हैं. इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए भारतीय वन्यजीव संस्थान ने घड़ियाल संरक्षण के लिए एक विशेष टास्क फोर्स गठित किए जाने की भी सिफारिश की है. इसके तहत नदी प्रबंधन, मानव गतिविधियों के नियमन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के जरिए घड़ियालों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने की बात कही गई है.यह सर्वे घड़ियालों की मौजूदगी को लेकर राहत जरूर देता है, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकटग्रस्त प्रजाति फिर से गंभीर खतरे में पड़ सकती है. अब जरूरत है कि रिपोर्ट में सुझाए गए संरक्षण उपायों को जमीन पर उतारा जाए, ताकि गंगा बेसिन की नदियों में घड़ियालों की यह उम्मीद आने वाले वर्षों में और मजबूत हो सके. यह जानकारी गंगा बेसिन में अत्यंत संकटग्रस्त घड़ियाल की जनसंख्या स्थिति एवं संरक्षण कार्ययोजना विषय पर जारी रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप और पर्यावरणीय चुनौतियों के बावजूद कुछ नदियों में घड़ियालों की आबादी अभी भी बनी हुई है। देश के अन्य राज्यों की तरह जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में घड़ियाल को संरक्षित करने का प्रयास जोर-शोर से चल रहा है. कॉर्बेट प्रशासन अगर इनकी संख्या बढ़ाने की सोच रहा है. अंडों से कृत्रिम तरीके से बच्चे विकसित करने का कार्य लखनऊ में कुकरैल सेंटर एवं उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के कतरनिया घाट सेंचुरी में होता है. इस तकनीक में अंडों को आर्टिफिशियल इनक्यूबेटर मशीन में रखा जाता है. मादा के शरीर के अनुसार अंडों को तापमान दिया जाता है. अंड़ों से बच्चे निकलने के बाद उनके साढ़े तीन फीट तक होने का इंतजार किया जाता है, जिसके बाद उन्हें नदी में छोड़ दिया जाता है. कॉर्बेट टाइगर रिजर्व घड़ियालों के लिए बहुत ही सुरक्षित और महत्वपूर्ण जगह है. लेकिन वाटर पॉल्यूशन और प्रकृतिक आपदा जैसे बाढ़ और बादल फटने की घटनाओं के कारण घड़ियालों की संख्या लगातार घट रही है. कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में साल 2008 में की गई जलीय जीवों की गणना में घड़ियालों की संख्या 122 थी जो 2020 फरवरी में घटकर 75 रह गई. हालांकि, इसी साल दिसंबर में दोबारा हुई गणना में घड़ियालों की संख्या 96 हो गई. इसके विपरीत वर्ष 2008 की तुलना में वर्ष 2020 में ऊदबिलाव की संख्या में 26 की बढ़ोतरी हुई. मगरमच्छ की संख्या में भी 82 की वृद्धि हुई, जबकि घड़ियाल की संख्या में 26 घड़ियाल की कमी पाई गई है.वन्यजीव विशेषज्ञ कहते है कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व घड़ियालों के लिए बहुत महत्वपूर्ण व सुरक्षित जगह है. लेकिन इनकी संख्या के लगातार कम होने के कई कारण हैं. बरसात के समय नदी में बाढ़ आने के कारण इनकी संख्या न बढ़ना भी मुख्य कारण है क्योंकि बरसात में ही घड़ियाल अंडे देते हैं और बाढ़ आने से इनके अंडे नदी में बह जाते हैं.वन्यजीव प्रेमी कहते हैं कि कॉर्बेट प्रशासन का घड़ियालों को संरक्षित करने का अच्छा प्रयास है, क्योंकि घड़ियाल एक संकटग्रस्त प्रजाति है. पहले भी कॉर्बेट पार्क की रामगंगा नदी में लाकर घड़ियाल छोड़े गए थे. रामगंगा नदी में रेतीले तट हैं. उन्होंने बताया कि राम गंगा नदी में बाड़ के समय उस पर काफी पानी आता है, ऐसे में इनके अंडे भी बाढ़ में बह जाते है ,जिन कारण इनकी संख्या बढ़ नहीं पा रही है. कॉर्बेट प्रशासन अब ब्रीडिंग के जरिये घड़ियालों के अंडे कलेक्ट करके आर्टिफिशियल ब्रीडिंग कर दोबारा से रामगंगा नदी में उनको छोड़ेगा. इससे निश्चित रूप से घड़ियालों की संख्या में वृद्धि होगी.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











