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असमंजस आर्थिकी संवारेगी घस्यारी कल्याण योजना !

08/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में पशुपालकों के हित में राज्य सरकार द्वारा कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं. इन्हीं योजनाओं में से एक है घसियारी कल्याण योजना, जिसका उद्देश्य खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्रों की महिलाओं को पशुओं के चारे के बोझ से राहत देना है. इस योजना के तहत लाभार्थी महिलाओं को पशु आहार और साइलेज उपलब्ध कराया जाता है, ताकि उन्हें जंगलों या दूरस्थ क्षेत्रों में घास काटने के लिए न जाना पड़े और घर पर ही पशुओं के लिए चारा मिल सके.इस योजना की शुरुआत वर्ष 2023 में की गई थी, लेकिन शुरुआत से ही यह योजना विभिन्न कारणों से हिचकोले खाती रही है. अब एक बार फिर पर्वतीय क्षेत्रों में चारे की उपलब्धता को लेकर नई समस्या खड़ी हो गई है. कई पशुपालकों का कहना है कि उनके क्षेत्रों में लंबे समय से पशुओं का चारा नहीं पहुंचाया जा रहा है, जिससे उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. पर्वतीय क्षेत्रों में पशुपालकों की मुश्किलें इसलिए भी बढ़ गई हैं, क्योंकि वन विभाग लगातार लोगों को अपने मवेशियों को जंगलों में चरने के लिए न छोड़ने की अपील कर रहा है. विभाग का कहना है कि जंगलों में शिकारी वन्यजीवों का खतरा बढ़ गया है, जिससे मवेशियों के साथ-साथ उन्हें चराने जाने वाली महिलाओं की जान भी जोखिम में पड़ सकती है. बीते कुछ समय में महिलाओं पर वन्यजीवों के हमले के कई मामले सामने आ चुके हैं. ऐसे में पशुपालक असमंजस में हैं कि वे अपने पशुओं के लिए सुरक्षित रूप से चारे की व्यवस्था आखिर कहां से करें. घसियारी योजना के तहत चारे की आपूर्ति रुकने की बड़ी वजह बजट का समय पर जारी न होना बताया जा रहा है. योजना के अंतर्गत साइलेज उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी एक निजी संस्था को सौंपी गई थी, लेकिन लंबे समय तक भुगतान नहीं होने के कारण उस संस्था ने चारा आपूर्ति से साफ इंकार कर दिया. इसका सीधा असर पर्वतीय जिलों के पशुपालकों पर पड़ा.आंकड़ों की बात करें तो उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में हर महीने लगभग 3 हजार टन साइलेज भेजा जाता है. वहीं बड़े पैमाने पर व्यावसायिक पशुपालन करने वाले डेयरी फार्मरों के लिए अब कुछ नई शर्तें लागू की गई हैं. इसके तहत पांच पशुओं तक के पशुपालकों को ही सब्सिडी के तहत चारा मिलेगा. निर्धारित मात्रा से अधिक चारा लेने पर उन्हें व्यावसायिक दरों पर भुगतान करना होगा.पशुपालकों की शिकायतों के बीच सहकारिता विभाग का कहना है कि अब बजट जारी कर दिया गया है और जल्द ही योजना को फिर से सुचारू कर दिया जाएगा. सहकारिता विभाग के डिप्टी रजिस्ट्रार के अनुसार, भुगतान न होने के कारण वेंडर ने चारा आपूर्ति रोक दी थी, लेकिन अब बजट मिलने के बाद सभी व्यवस्थाएं दोबारा दुरुस्त की जा रही हैं. विभाग का दावा है कि आने वाले दिनों में पशुपालकों को इस समस्या से राहत मिलेगी. विधायक महिलाओं के कल्याण की बात कहकर जिस योजना को शुरू किया गया. इस पर क्रेडिट लेने का सिलसिला जारी है. हालांकि, संगठन स्तर पर जब योजना किसकी है. यह सवाल किया गया तो जवाब आया कि योजना सरकार की है. इसमें सभी लोगों ने अपना योगदान दिया है. सहकारिता विभाग ने महिलाओं के सिर से पशु चारे का बोझ कम करने के उद्देश्य से पूर्व में मुख्यमंत्री घस्यारी कल्याण योजना प्रारंभ की। इसके तहत महिलाओं व पशुपालकों को गांव में ही पशु चारा उपलब्ध कराया जा रहा था। इसी तरह डेरी विकास विभाग भी पशुचारे की आपूर्ति के दृष्टिगत साइलेज व दुधारू पशुपोषण योजना संचालित कर रहा था। दोनों योजनाओं में लाभार्थियों को 75-75 प्रतिशत सब्सिडी दी जा रही थी। इस बीच पशुचारे की मांग में निरंतर वृद्धि होने के दृष्टिगत ज्यादा से ज्यादा लोग इससे लाभान्वित हों, इसके लिए दोनों योजनाओं में पशु चारे पर सब्सिडी में 15 प्रतिशत कमी की गई है। जंगलों से घास लाना पहाड़ की महिलाओं के लिए रोजमर्रा का काम है. चाहे बारिश हो या ठंड, महिलाएं बिना किसी शिकायत के अपना काम करती हैं. घास लाने के बाद इसका उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है, जो महिलाओं की आजीविका का एक अहम हिस्सा है. इसके अलावा लकड़ी और पानी लाने जैसे अन्य कार्य भी महिलाएं स्वयं ही करती हैं.पहाड़ की महिलाओं का जीवन कठिन परिश्रम से भरा है. यह कहना गलत नहीं होगा कि पहाड़ की महिलाएं अपने परिवार और समाज की असली रीढ़ हैं. उनकी दिनचर्या न केवल कठिन परिश्रम का प्रतीक है, बल्कि यह उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और समर्पण को भी दर्शाती है. उत्तराखंड में पशुपालकों के लिए राज्य सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन्हीं में से एक योजना है घसियारी कल्याण योजना, इस योजना का उद्देश्य खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं को पशुओं के चारे के बोझ से राहत देना है। इस योजना के अंतर्गत लाभार्थी महिलाओं को पशु आहार और साइलेज उपलब्ध कराया जाता है। जिससे उन्हें जंगलों या दूरस्थ क्षेत्रों में घास काटने के लिए न जाना पड़े और घर पर ही पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कार्य जा सके।इस योजना की शुरुआत साल 2023 में की गई थी, लेकिन शुरुआत से ही ये योजना हिचकोले खाती रही है। अब एक बार फिर पर्वतीय क्षेत्रों में चारे की समस्या कड़ी हो गई है। पशुपालकों का कहना है कि उनके क्षेत्रों में लंबे समय से पशुओं का चारा नहीं पहुंचाया जा रहा है, जिससे उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहे मानव वन्य जीव संघर्ष के चलते पशुपालकों की मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं। क्यों कि वन विभाग लगातार स्थानीयों से अपील कर रहा है कि अपने पशु जंगल में चराने के लिए न छोड़ें। विभाग का कहना है कि जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों के चलते पशुओं और उनके चराने वालों का जंगल में जाना खतरे से भरा हुआ है। ऐसे में पशुपालक भी असमंजस में हैं कि अपने मवेशियों के लिए चारे कि वयवस्था कैसे करें। घसियारी योजना के तहत मिलने वाले चारे की आपूर्ति पिछले कुछ समय से थमी हुई है और इसके पीछे मुख्य वजह बजट का समय पर जारी न होना बताई जा रही है। योजना के अंतर्गत साइलेज उपलब्ध कराने का काम एक निजी संस्था को सौंपा गया था, लेकिन लंबे समय तक भुगतान लंबित रहने के कारण उस संस्था ने आगे आपूर्ति करने से साफ इंकार कर दिया। नतीजतन, इसका सीधा असर पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले पशुपालकों पर पड़ने लगा।इसी बीच, आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में हर महीने करीब 3 हजार टन साइलेज भेजा जाता रहा है। हालांकि, अब स्थिति कुछ बदली है। बड़े स्तर पर डेयरी व्यवसाय करने वाले पशुपालकों के लिए नई शर्तें लागू की गई हैं। अब पाँच पशुओं तक के छोटे पशुपालकों को ही सब्सिडी के तहत चारा उपलब्ध होगा, जबकि तय सीमा से अधिक चारा लेने वालों को व्यावसायिक दरों पर भुगतान करना पड़ेगा। इस वजह से कई पशुपालक चिंतित भी दिखाई दे रहे हैं। घसियारी कल्याण योजना कारपोरेट डेयरी फार्मिंग की तरफ बढ़ने का पहला कदम है. विश्व व्यापार संगठन के दवाव में जिस तरह से आज हमारी सरकार खेती के कारपोरेटीकरण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खत्म करने की तरफ बढ़ रही है. उसी तरह से उस पर डेयरी क्षेत्र में भी कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए दरवाजे खोलने का भारी दबाव है. भारत में कुल दुग्ध उत्पादन का 70 प्रतिशत हिस्सा यहाँ के गरीब और माध्यम किसान, भूमिहीन व खेत मजदूर पैदा करते हैं. उनकी पहुंच सीधे बाजार तक है.भारत के शहरी लोग आज भी डेयरी के पैकेट बंद दूध की बजाए सीधे पशुपालकों से दूध खरीदना ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं. जब तक उनके नजदीक इस सीधी सप्लाई चेन को तोड़ा नहीं कारपोरेट डेयरी फार्मिंग की दिशा में बढ़ते ही आम दुग्ध उत्पादकों को बाहर आम आमदी या आम दुकानदार को दूध बेचने पर भी कानूनी रोक लग जायेगी. इस तरह चारे और दूध की बिक्री के लिए आज की घसियारी कारपोरेट कम्पनियों के फंदे में फंसा दी जाएंगी. उसका अंतिम नजीजा होगा या तो कर्ज के जाल में फंस कर आत्महत्या या दुग्ध उत्पादन के रोजगार से तौबा. पर्वतीय क्षेत्र की खेती के बर्बादी के कारणों पर भी अगर नजर दौडाएं तो यहाँ की आजीविका के मुख्य साधन पहाड़ की खेती, पशुपाल और ग्रामीण दस्तकारी को संरक्षण देने की कोई नीति किसी भी सरकार ने नहीं बनाई. उसकी जगह कूजा एक्ट के जरिए कृषि क्षेत्र के विस्तार पर पूर्ण रोक, वन संरक्षण, बृक्ष संरक्षण, वन्य जीव संरक्षण, गो रक्षा कानून, सेंचुरी और राष्ट्रीय पार्कों का विस्तार, ईको संसिटिव जोन कानून जैसे कानूनों के जरिये हमारी सरकारों ने हमेशा पहाड़ की कृषि, पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी को हतोत्साहित ही किया.नतीजा आपके सामने है. आज देश में उत्तराखंड के पहाड़ ही हैं जहां इन नीतियों के माध्यम से सैकड़ों गाँव मानव विहीन बना दिए गए हैं. पहाड़ की आजीविका के मुख्य साधन खेती, पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी दम तोड़ रहे हैं, आजीविका के लिए पलायन ही आज लोगों का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है.।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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