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गोमाता संरक्षण पर आधारित फिल्म ‘गोदान

07/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आज के दौर में जब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन तक सिमट कर रह गया है, तब एक ऐसी फिल्म आ रही है, जो हमारी जड़ों और हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान गौ माता को समर्पित है। फिल्म का नाम है ‘गोदान’। यह फिल्म सिर्फ पर्दे पर चलने वाली कोई कहानी नहीं है, बल्कि यह एक अहसास है फिल्म के उद्देश्य को देखकर वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे हर सनातनी के लिए एक ‘अनिवार्य फिल्म’ बताया। उनका मानना है कि गौ सेवा के संदेश को घर-घर पहुंचाने के लिए ऐसी कोशिशों की आज समाज को बहुत जरूरत है।गोदान’ की कहानी बहुत ही भावुक है। यह एक इंसान और उसकी प्यारी बछिया के बीच के उस अटूट रिश्ते को दिखाती है, जिसमें कोई स्वार्थ नहीं, सिर्फ प्यार है। फिल्म में आस्था के साथ-साथ गाय के वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व को भी बहुत खूबसूरती से पिरोया गया है। अदाकारी की बात करें तो मनोज जोशी जैसे दिग्गज अभिनेता और उपासना सिंह अपनी बेहतरीन एक्टिंग से दर्शकों के दिलों को छूने के लिए तैयार हैं। साथ ही साहिल आनंद, सहर्ष शुक्ला और बाबा सत्यनारायण मौर्य ने भी इसमें अहम भूमिकाएं निभाई हैं। यह फिल्म इस बात पर जोर देती है कि भारतीय सभ्यता में गाय को कभी भी मात्र एक पशुधन के रूप में नहीं देखा गया है। प्राचीन वैदिक परंपराओं से लेकर समुद्र मंथन के दौरान कामधेनु के प्रकट होने की कथा तक, गाय पोषण, संतुलन और जीवन की निरंतरता का प्रतीक रही है। इसने सदियों से कृषि को सहारा दिया है, परिवारों का भरण-पोषण किया है और नैतिक जीवन को आकार दिया है। फिल्म का एक प्रमुख विषय पंचगव्य की अवधारणा और मानव जीवन पर इसके पंचगुणात्मक प्रभाव है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह फिल्म समझाती है कि पंचगव्य शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक कल्याण और पर्यावरण सामंजस्य में कैसे योगदान देता है। इसमें उन अध्ययनों का भी उल्लेख किया गया है जो बताते हैं कि गायों के साथ साधारण संपर्क से मानसिक शांति मिलती है और रक्तचाप नियंत्रित करने में मदद मिलती है। फिल्म निर्माताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘गोदान’ किसी एक जाति, धर्म या समुदाय से संबंधित नहीं है। बल्कि यह हर नागरिक के लिए है। स्कूली बच्चों, परिवारों और युवाओं तक पहुँचने पर विशेष बल दिया गया है, ताकि ज़िम्मेदारी, करुणा और जागरूकता का इसका संदेश सभी पीढ़ियों तक पहुँच सके।निर्माता ने यह भी आशा व्यक्त की कि फिल्म को कर-मुक्त दर्जा दिया जाएगा ताकि इसकी पहुँच और सामाजिक प्रभाव को अधिकतम किया जा सके। गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष ने भी इसी तरह की भावना व्यक्त करते हुए कहा कि गाय कृषि, प्रकृति और मानव जीवन के लिए वरदान है। परिवारों, युवाओं और बुजुर्गों सभी को ‘गोदान’ देखने के लिए प्रोत्साहित किया। सिनेमा का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है और ‘गोदान’ जैसी फिल्में सामाजिक जागरूकता बढ़ाने और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाती हैं. उन्होंने यह भी जोड़ा कि अर्थपूर्ण और मूल्यों पर आधारित सिनेमा खासकर युवा पीढ़ी में सकारात्मक सोच विकसित करने में मदद कर सकता है. इस मौके पर मुख्यमंत्री ने यह भी घोषणा की कि राज्य सरकार जल्द ही ओडिशा में एक गाय अनुसंधान केंद्र स्थापित करेगी. उन्होंने बताया कि प्रस्तावित केंद्र देशी गायों और पारंपरिक प्रथाओं से जुड़ी रिसर्च, संरक्षण और जागरूकता पर काम करेगा. स्वास्थ्य के क्षेत्र में गाय का दूध, दही और घी अमूल्य पोषण प्रदान करते हैं, जो बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में सहायक होते हैं। वहीं, गाय का गोबर और गौमूत्र जैविक खेती के लिए अत्यंत उपयोगी हैं, जो प्राकृतिक संतुलन और पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वि‌द्यालय के प्रधानाचार्य जी ने अपने उ‌द्बोधन में कहा कि गाय ग्रामीण जीवन और भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है तथा यह अहिंसा, करुणा और निःस्वार्थ सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण है। गौ-संरक्षण के माध्यम से ही हम अपनी सांस्कृतिक विरासत और मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रख सकते हैं। उत्तराखंड मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘गोदान’ जैसी फिल्मों के माध्यम से समाज में सकारात्मक सोच और संवेदनशीलता विकसित होती है, इसलिए ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सामाजिक, सांस्कृतिक और जनहित से जुड़े विषयों पर बनी फिल्मों और रचनात्मक प्रयासों को भविष्य में भी प्रोत्साहन देती रहेगी। दरअसल, टैक्स फ्री होने के बाद टिकट के दाम में कमी होने से अधिक लोग फिल्म देख सकेंगे। बता दें कि मुख्यमंत्री योगी ने प्रदेश की कमान संभालने के बाद गो-तस्करों पर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। हर जिले में गो संरक्षण समितियों का गठन किया गया है। डीएम व एसएसपी इसके नोडल अधिकारी बनाए गए हैं। इसके अलावा बीते नौ वर्षों में प्रदेश में साढ़े सात हजार से ज्यादा गो-आश्रय स्थल बनाए गए, जहां 12 लाख से अधिक निराश्रित गोवंश संरक्षित किए जा चुके हैं। फिल्म में दर्शाया गया है कि गोमाता केवल पशु नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता का अभिन्न हिस्सा हैं। युवा पीढ़ी धीरे-धीरे गाय के महत्व को भूलती जा रही है। फिल्म का उद्देश्य बच्चों, युवाओं और समाज के हर वर्ग को गोमाता के महत्व और उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक करना है। गोदान’ फिल्म का निर्माण लगभग 40 करोड़ रुपये की लागत से किया गया है। इसकी शूटिंग उत्तराखंड की वादियों, नोएडा, मथुरा और मुंबई जैसे शहरों की खूबसूरत लोकेशन्स पर हुई है।  पटकथा को प्रभावी बनाने के लिए इसमें कई सच्ची घटनाओं को भी दिखाया गया है, जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं। हाल ही में फिल्म की टीम ने सीएम से मुलाकात भी की थी, जिसके बाद इसकी उपयोगिता को देखते हुए राज्य सरकार ने इसे विशेष प्रोत्साहन देने का फैसला किया। फिल्म जगत के जानकारों का मानना है कि ‘गोदान’ जैसी फिल्में बॉलीवुड में आ रहे सकारात्मक बदलाव का प्रतीक हैं। बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री इस समय बदलाव के एक अहम दौर से गुजर रही है।  गाय केवल धर्म और आस्था का विषय नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, समाज और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है। इस तरह की फिल्मों के माध्यम से समाज में सकारात्मक सोच और संवेदनशीलता विकसित होती है, इसलिए ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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