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हिमाला का ऊंचा डाना प्यारो मेरो गांव

02/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखण्ड कुमाऊँनी भाषा के महान गायक श्री गोपाल बाबू गोस्वामी जी का जन्म उत्तराखण्ड के गाँव चांदिखेत, अल्मोड़ा जनपद मे २ फ़रवरी, १९४१ को हुआ था।  गोस्वामी जि का परिवार एक साधारण और बेहद गरीब था।  उनके पिता का नाम मोहन गिरी एंव माता का का नाम चनुली देवी था।  छोटी सी उम्र से ही उन्हें गानों का शौक था पर यह शौक उनके परिवार वालों को पसंद नही था।  सामन्यतया जैसे होता ही है कि गरीब परिवार में बच्चे को पढ़-लिख कर कुछ कमाने पर ज्यादा ध्यान होता है।  पढ़ाई छोड़ गाने कि तरफ़ रुझान होने के कारण घर पर उन्हें बार-बार टोका का सामना करना पड़ता था। नियति ऎसी हुई कि गोस्वामी जी ८वीं कक्षा उत्तीर्ण कर पाते इससे पहले ही उनके पिता का देहांत हो गया।  जिस वजह से परिवार का बोझ उनके कंधों पर आने के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। उसके बाद नौकरी की तलाश ने उन्हें ट्रक ड्राइवर बना दिया।  कई बार उन्होंने मेलों में जाकर जादूगरी के तमाशे दिखाने का काम भी किया और साथ ही ग्राहकों को कुमाऊंनी गीत सुनाकर मनोरंजन भी करते थे।  ‌मेलों में गीत गाने से लेकर रेडियो में गीत गाने तक का गोपाल बाबू का सफर काफी रोमांचकारी रहा। एक बार अल्मोड़ा में नन्दादेवी मेले में गीत गाते देख कुमाऊंनी संगीतकार स्वर्गीय ब्रजेन्द्रलाल शाह की नजर उन पर पड़ी।  जिसके बाद उन्होने गोपाल बाबू को प्रसिद्ध लोकगायक गिरीश तिवाड़ी गिर्दा के पास भेजा गया।  जिन्होने उनके आवाज को तराशा और १९७१ में नैनीताल शाखा में काम कर रहे ब्रजेन्द्रलाल साह जी ने गोपाल बाबू जी को अपने साथ काम पर रख लिया, यह एक तरह की सरकारी नौकरी की तरह ही थी।  इसी दौरान गोपाल बाबू ने “कुमाउँनी गानों” के गायन से शुरुआत की और उनके गानों को लोगों द्वारा  पसंद किया जाने लगा।  माना जाता है कि उनका पहला रिकॉर्डेड गीत “कैले बजे मुरूली ओ बैणा” था, जिसे लखनऊ में रिकॉर्ड किया गया।  जिसके बाद इस गीत के आकाशवाणी नजीबाबाद से प्रसारित होने पर गोस्वामी जी की लोकप्रियता और बढ़ने लगी।  सुर सम्राट स्व. गोपाल बाबू गोस्वामी उत्तराखंड के ऐसे लोक कलाकारों में शुमार हैं, जिन्होंने पहाड़ की लोक संस्कृति, लोक विधाओं व परंपराओं को अपने मधुर गीतों में पिरोकर उन्हें आगे बढ़ाया है। बेशक वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके सुरीले गीत प्रशंसकों में पहाड़ की माटी की सुगंध महका देते हैं।गोपाल बाबू गोस्वामी का जन्म अल्मोड़ा जनपद के रंगीली बैराठ नगरी के चांदीखेत गांव में दो फरवरी 1942 को हुआ था। बचपन गांव में बीता, जहां से प्रारंभिक शिक्षा भी हासिल की। गरीबी के चलते वह अपनी शिक्षा को जारी नहीं रख सके। सुरीली आवाज के धनी गोपाल बाबू ने जल्द ही गायकी के क्षेत्र में मुकाम हासिल कर लिया।उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक स्व. गोपाल गिरी गोस्वामी को लोग गोपाल बाबू के नाम से जानते हैं। उनका जन्म चौखुटिया बाजार से लगे ग्राम पंचायत चांदीखेत में दो फरवरी 1942 को मोहन गिरी गोस्वामी के घर हुआ था। बचपन से ही गीतकार बनने के जुनून में उन्होंने पांचवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया। वह 12 साल की उम्र से ही गीत लिखने और गाने लगे थे। जीवन के 54 साल में उन्होंने साढे़ पांच सौ गीत लिखे।उत्तराखण्ड में कई महान लोकगायक हुये हैं लेकिन गोपाल बाबू गोस्वामी एक ऐसे संगीत साधक हैं जिनकी पहचान ऊंचे पिच की वोईस क्वालिटी के कारण अपने आप में विशिष्ट है।  उनकी इस सुरीली आवाज का ही जादू है कि कुमाऊँनी ही नही अन्य भाषा-भाषी भी एक बार उनका गीत सुनने के बाद उनके गीतों को बार-बार सुनकर खुद गुनगुनाने को विवश हो जाता है।  गोपाल बाबू गोस्वामी जी ने विभिन्न प्रकार के गीत गाये हैं जैसे श्रंगार गीत, भक्ति गीत, पहाड़ के सौन्दर्य और पहाड़ के जन-जीवन से सम्बंधित गीत आदि।आज हम सुनेंगे गोस्वामी जी का श्रृंगार रस से भरपूर लोकप्रिय गीत, “ओ लाली ओ मेरी साई, हिट म्याला जूंलो मेरी साई।” गोपाल बाबू गोस्वामी जी के इस गीत में नायक अपनी साली को मेले के बारे में बताते हुए उसके साथ मेले में चलने का अनुरोध कर रहा है और नायिका के सौंदर्य का वर्णन भी कर रहा है।
ओ लाली ओ मेरी साई,
ओ लाली ओ मेरी साई,
हिट म्याला जूंलो मेरी साई,
हिट म्याला जूंलो मेरी साई।
ओ लाली ओ मेरी साली,
ओ लाली ओ मेरी साली,
चल मेले चल नखरे वाली,
चल मेले चल नखरे वाली।।

म्येलो घूमै ल्योंलो,
मोटर में बिठै ल्योंलो,
हिट म्यला घूमै ल्योंलो,
मोटर में बिठै ल्योंलो।
चल मेला घुमाई दूंगा,
मोटर मा बिठाई दूंगा,
चल मेला घुमाई दूंगा,
मोटर मा बिठाई दूंगा।

ओ लाली ओ मेरी साई,
ओ लाली ओ मेरी साई,
हिट म्यावा जूंलो मेरी साई,
हिट म्यावा जूंलो मेरी साई।
ओ लाली ओ मेरी साली,
ओ लाली ओ मेरी साली,
चल मेले चल नखरे वाली,
चल मेले चल नखरे वाली।।

जलेबी खवै ल्योंलो
चर्खी में घूमै ल्योंलो,
जलेबी खवै ल्योंलो,
चर्खी में घूमै ल्योंलो।
गरम गरम चाहा पकौड़ी,
कल्यौ में खवै द्यूँलौ,
गरम गरम चाहा पकौड़ी,
कल्यौ में खवै द्यूँलौ।।

जलेबी खिलाई दूंगा,
चरखे में घुमाई दूंगा,
जलेबी खिलाई दूंगा,
चरखे में घुमाई दूंगा।
गरम गरम चाय पकौड़ी,
नाश्ता कराई दूंगा,
गरम गरम चाय पकौड़ी,
नाश्ता कराई दूंगा।

ओ लाली ओ मेरी साई,
ओ लाली ओ मेरी साई,
हिट म्यावा जूंलो मेरी साई,
हिट म्यावा जूंलो मेरी साई।
ओ लाली ओ मेरी साली,
ओ लाली ओ मेरी साली,
चल मेले चल नखरे वाली,
चल मेले चल नखरे वाली।।
गीत की रिकॉर्डिंग पुरानी ऑडियो कैसेट्स से किसी प्रकार से की गयी है, आधुनिक डिजिटल टेक्नोलॉजी से इसकी तुलना न करें बाद में गोपाल बाबू भारत सरकार के सूचना व प्रसारण मंत्रालय के गीत एवं नाट्य विभाग में भर्ती हो गए। अपनी आवाज का जादू बिखेरकर उन्होंने जल्द ही विभाग में खास पहचान बना ली। सभी उनके मधुर गीतों दीवाने हो गए। उनके अनेक कैसेटों ने धूम मचा दी। उनके प्रथम स्वरचित गीत-कैले बजै मुरूली ओ बैंणा के साथ ही आमै की डाई में घुघुति नि बांसा, हिमाला को ऊंचा डाना प्यारो मेरो गांव आदि सुनने वालों के दिलों में आज भी राज कर रहे हैं।इसके अलावा बरात विदाई के दौरान गाए जाने वाले उनके गीत-ओ मंगना आज आयो री तेरो सजना., जा चेली जा सौरास.व बाट लागि बरात चेली बैठ डोलिमा.जैसे विरह गीत लोगों के आंखों में आंसू छलका देते हैं। गोपाल बाबू ने कुमाऊंनी गीत माला, दर्पण व राष्ट्र ज्योति जैसे पुस्तकें भी लिखी हैं। उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी भी गोपाल बाबू के गीतों के बडे़ दीवाने हैं. वह गोपाल बाबू के गीत ‘हिमालाको ऊंचा डाना प्यारो मेरो गांव, छविलो गढ़वाल मेरो रंगीलो कुमाऊं’ को अक्सर गुनगुनाते हैं. नारी सौंदर्य पर लिखा उनका गीत ‘हाय तेरी रूमाला गुलाबी मुखड़ी के भली छाजीरे  नाखेकी नथूली,’ सूर्योदय के समय पति द्वारा पत्नी को जगाने का व्यंग्य गीत ‘उठ सुवा उज्याऊ हैगो चमचमाक घामा’ लोगों द्वारा बहुत पसंद किए गए हैं. गोस्वामी जी का कंठ मधुर था वे ऊंचे पिच के गीत गाने में विशेष माहिर थे. उन्होंने कुछ युगल कुमाउनी गीतों के भी कैसेट बनवाए . गीत और नाटक प्रभाग की गायिका श्रीमती चंद्रा बिष्ट के साथ उन्होंने लगभग 15 कैसेट बनवाए. गोस्वामी जी ने कुछ कुमाउंनी तथा हिंदी पुस्तकें भी लिखी थी जिनमें से मुख्य रूप से “गीत माला (कुमाउंनी)” “दर्पण” “राष्ट्रज्योती (हिंदी)” तथा “उत्तराखण्ड” आदि उल्लेखनीय हैं. उनकी  एक पुस्तक “उज्याव” प्रकाशित नही हो पाई. उनके द्वारा गाए अधिकांश कुमाउंनी गाने स्वरचित थे. मालूशाही तथा हरुहित के भी उन्होंने कैसेट बनवाए थे ‌गोपाल बाबू ने अपने जीवन के सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे पर कभी भी उनके सामने हार नही मानी और हमेशा ही अपने गीत-संगीत में जुड़े रहे। नौकरी के दौरान उन्हें  ब्रेन ट्यूमर हो गया जिस वजह से वे लम्बे समय से बीमारी में रहे।  जिसके चलते २६ नवंबर १९९६ को इस दुनिया से अलविदा लेना पड़ा।  कहा जाता है कि गोस्वामी जी ने १२ वर्ष कि उम्र से गीत लिखने शुरु कर दिये थे।  इस तरह अपने लगभग ४२ वर्ष के संगीत करियर में गोस्वामी जी ने ५०० से अधिक गीत लिखे, संगीतबद्ध किये और गाये।गोपाल बाबू गोस्वामी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं परंतु उनके गीत हमें आज भी उनकी उपस्थिति का अहसास कराते हैं।  जीवन के हर पहलू को छूते उनके गीतों की सूची काफ़ी लंबी है।  हर किसी को रूला देने वाला दुल्हन की विदाई का उनका मार्मिक गीत “न रो चेली न रो मेरी लाल, जा चेली जा सौरास” तथा “उठ मेरी लाड़ू लुकुड़ा पैरीले, रेशमी घाघरी आंगड़ी लगै ले” गीत की आज भी जबरदस्त मांग है।  उनके गीत सदा के लिए हमारे दिलों में बस गए हैं  जो आने वाली पीढ़िया भी याद रखेगी।उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी भी गोपाल बाबू के गीतों के बडे़ दीवाने हैं।  एक बार किसी साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि वह गोपाल बाबू गोस्वामी जी के गीत “हिमालाको ऊंचा डाना प्यारो मेरो गांव, छविलो गढ़वाल मेरो रंगीलो कुमाऊं” को अक्सर गुनगुनाते हैं।  नेगी जी को गोस्वामी जी का नारी सौंदर्य पर लिखा गीत “हाय तेरी रूमाला गुलाबी मुखड़ी, के भली छाजीरे नाखेकि नथूली”,  जीजा साली संवाद का गीत “ओ भीना कसकै जानू दोरिहाटा”, सूर्योदय के समय पति द्वारा पत्नी को जगाने का गीत “उठ सुवा उज्याऊ हैगो चमचमाक घामा” तथा “भुरू भुरू उज्याऊ हैगो डान काना में सुर सुर, बाज मुरूली तुर तुर” आदि अन्य गीत भी काफी पसंद आए हैं।अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में गोपाल बाबू को ब्रेन ट्यूमर हो गया था. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली में आपरेशन करवाने के बाद भी भी वे स्वस्थ नहीं हो सके. 26,नवम्बर 1996 को उनका असामयिक निधन हो गया और हमने खो दिया एक लोकगायक, एक मधुर स्वर और एक उत्तराखंड की महान धरोहर. गोपाल बाबू गोस्वामी आज भले ही हमारे बीच नहीं रहे पर उनका मधुर स्वर ‘कैले बजै मुरूली ओ बैणा’ पहाड़ की गिरि कंदराओं में सदा गूंजता रहेगा. बेशक सुरीली आवाज के धनी गोपाल बाबू गोस्वामी आज हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनके गीतों के मधुर स्वर आज भी उत्तराखंड वासियों के दिलों में रची-बसी हैं। दुर्भाग्य है ऐसे महान लोक कलाकार को सरकारें भी भूल गई हैं, लेकिन बैराठेश्वर में प्रतिवर्ष दो फरवरी को उनकी जयंती मनाई जाती है।लोकगायक गोपाल बाबू गोस्वामी की जन्मजयंती के उपलक्ष्य में उन्हें शत शत नमन!लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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