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गुणवत्ता से परिपूर्ण पहाड़ी हल्दी

03/02/21
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून
वैज्ञानिक रूप से हल्दी जिन्जीविरेन्सी परिवार अन्तर्गत आती है, जिसमें असंख्य आर्थिक, औषधीय, सजावटी तथा सामाजिक रूप से महप्वपूर्ण अन्य बहुत सारे पौधों का भी अध्ययन किया जाता है। विश्वभर में हल्दी अपने औषधीय एवं औद्योगिक उपयोग के कारण अपनी एक विशिष्ट पहचान व स्थान रखती है। भारत भी विश्वभर में हल्दी निर्यात एवं उत्पादन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जो लगभग विश्व का 93.7 प्रतिशत उत्पादन एक लाख 50 हजार है0 क्षेत्रफल में करता है। भारत में कुल उत्पादित हल्दी का लगभग 92 प्रतिशत केवल स्वदेश में ही उपयोग किया जाता है तथा लगभग 8 प्रतिशत विश्व के अन्य देशों को निर्यात किया जाता है। जिसमें आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, तथा केरल मुख्य रूप से व्यवसायिक हल्दी उत्पादक राज्य जाने जाते हैं।

यद्यपि हल्दी दक्षिण तथा दक्षिण पूर्वी एशिया में काफी प्रचलित है परंतु इसकी कुछ प्रजातियॉ चीन, आस्ट्रेलिया तथा दक्षिण पेसफिक में भी प्रचलन में आ रही हैं। जबकि विश्व में सर्वाधिक हल्दी की विविधता भारत तथा थाईलैड में देखी जा सकती है। जिसमें 40 से ज्यादा प्रजातियों का उत्पादन किया जाता है। वर्तमान में बाजार मॉग औषधीय एवं औद्योगिक गुणवत्ता को दृष्टिगत रखते हुए म्यान्मार, बाग्लादेश, इण्डोनेशिया तथा वियतनाम भी हल्दी उत्पादन में आगे आ रहे हैं। यदि वैज्ञानिक दृष्टि से तथा उपलब्ध साहित्य को दृष्टिगत किया जाय तो भारत में तथा उत्तराखण्ड में तो हल्दी पुरातन काल से ही विभिन्न बीमारियों के निवारण तथा सौन्दर्य प्रसाधन के रूप में प्रयोग की जाती रही है। वर्तमान में भी कई समाजिक समारोह आदि में इसका उपयोग किया जाता है।

विभिन्न साहित्यों के अनुसार लगभग 600 बी0सी0 पूर्व से ही हल्दी को मसाला, डाई, औषधी तथा सौन्दर्य प्रसाधन के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। शुद्ध वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार हल्दी में जो पीला सर्वाधिक महत्वपूर्ण सक्रिय घटक करकूमीन है, जिसमें दो अन्य सहायक अव्यव डाईमिथोक्सी करकूमीन तथा बाईडिमिथोक्सी करकूमीन पाये जाते हैं। इसी महत्वपूर्ण अवयव करकूमीन की वजह से विश्व भर में विभिन्न रोगों के निवारण के गुण पाये जाते हैं। जैसे इसमें फफूदनाशक, जिवाणुनाशक, मधुनाशक, कैंसर निवारण तथा उदर रोग निवारण के गुण भी पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न कैंसर जिसमें प्रौस्टेट, ब्रेस्ट, चर्म तथा क्लोन के उपचार में भी प्रयोग किया जाता है।

करकूमीन के अलावा हल्दी में एक अन्य महत्वपूर्ण अवयव टेट्रा हाइड्रो करकूमीनाइड टी0एस0सी0 भी पाया जाता है, जिसमें बेहतर एण्टी ऑक्सीडेंट गुण के साथ.साथ विभिन्न सौन्दर्य प्रसाधनों में औद्योगिक रूप से प्रयोग किया जाता है। पौष्टिक दृष्टि से भी हल्दी अत्यन्त महत्वपूर्ण पायी जाती है, इसमें प्रोटीन.6.30 ग्रा0, खनिज लवण 3.50 ग्रा0, केल्सियम. 150 मि0ग्रा0, फासफोरस. 282 मि0ग्रा0, आइरन.67.80 मि0ग्रा0, कैरोटिन. 30 माइक्रो ग्रा0, थियामिन 0.03 मि0ग्रा0 फॉलिक अम्ल 18.0 माइक्रो ग्रा0 मैग्नीशियम 278 मि0ग्रा0 प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते हैं।

वैसे तो हल्दी व्यवसायिक रूप से वृहद मात्रा में भारत के कई राज्यों में उगायी जाती है, परंतु उत्तराखण्ड की पहाडी हल्दी अपने विशिष्ट गुणों के कारण विश्वभर में अपनी एक अलग पहचान रखती है। उत्तराखण्ड में सम्पादित एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार फिनोलिक तत्व, एण्टी ऑक्सीडेट तथा एस्कॉरबिक अम्ल उच्च पहाडी क्षेत्रों की हल्दी में मैदानी क्षेत्रों के अपेक्षाकृत ज्यादा पाये जाते हैं, जैसे फिनोलिक तत्व हरिद्वार के अपेक्षाकृत पिथोरागढ की हल्दी में ज्यादा पाये जाते हैं तथा कुल एण्टी ऑक्सीडेट रूडकी के अपेक्षाकृत मुन्स्यारी के हल्दी में ज्यादा पाये जाते हैं तथा एस्कॉरबिक अम्ल भरसार की हल्दी में रूडकी के अपेक्षाकृत अधिक पाये जाते हैं। वैज्ञानिक रूप से विशुद्ध पहलू यह है कि क्या उत्तराखण्ड के पहाडी क्षेत्रों मे जहॉ भी हल्दी उत्पादन के अनुकूल जलवायु पायी जाती है, केवल उसी प्रजाति की हल्दी का व्यवसायिक हल्दी का उत्पादन किया जाय, जिसकी सर्वाधिक बाजार मॉग औषधीय एवं औद्योगिक महत्व हो ताकि स्थानीय काश्तकार बाजार आधारित हल्दी का उत्पादन कर आर्थिक उपार्जन कर सकें तथा पहाडी क्षेत्रों में उत्पादित फसलों को जीविका उपार्जन का साधान बनाया जा सकें। जबकि पहाड़ में हल्दी उपजाना आसान बात नहीं है, क्योंकि पहाड़ी इलाकों में 3 साल में हल्दी तैयार होती है। इस हल्दी में सामान्य हल्दी से कई गुणा ज्यादा गुण होते हैं। पहाड़ी हल्दी की औषधीय एवं औद्योगिक उपयोग के कारण अपनी एक अलग पहचान है। स्टॉल के संचालक का कहना है कि पहाड़ी हल्दी पुरातन काल से ही विभिन्न बीमारियों के निवारण व सौंदर्य प्रसाधन के रूप में प्रयोग की जाती रही है।

हल्दी और अदरक की खेती के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में काश्तकारों को उन्नत बीज मुहैया कराए तो तस्वीर बदल सकती है। खेती की वैज्ञानिक तकनीक का प्रचार.प्रसार सोने पर सुहागा साबित हो सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में खेती.बाड़ी का सबसे ज्यादा नुकसान बंदर करते हैं। लेकिन हल्दी को बंदर, जंगली सुअर जैसे जानवर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। आजकल दुनिया के कई हिस्सों में खास तौर पर पश्चिमी देशों में तेजी से पापुलर हो रहा है। कई पोषक तत्वों से भरपूर हल्दी दूध पश्चिमी देशों में गोल्डन मिल्क के नाम से जाना जाता है। हल्दी के एंटीसेप्टिक व एंटीबायोटिक गुणों और दूध कैल्शि‍यम का प्रमुख श्रोत होने से शरीर ऊर्जा मिलती है। लाजवाब स्वास्थ्य वर्धक खूबियों के चलते आज हल्दी दूध पीना दुनिया भर में लोग पसंद कर रहे हैं। हल्दी में एंटीसेप्टिक और एंटीबायोटिक गुणों की प्रचुरता के साथ ही एंटी.इंफ्लामेटरी के भी गुण पाए जाते हैंण् जिससे शरीर के सूजन को कम करने में मदद मिलती है। इसलिए प्राचीन समय से ही भारत में चोट लगने और शरीर में दर्द होने पर हल्दी दूध पीने का चलन रहा है। हल्दी में पाए जाने वाले तत्व टर्मेरोन पर बहुत कम रिसर्च हुआ है, हालांकि कई शोध में साबित हुआ है कि हल्दी कैंसर में लाभप्रद है। उल्लेखनीय है कि हल्दी कैंसर और अल्जाइमर जैसे गंभीर बीमारियों में कितनी मददगार है, यह रिसर्च का विषय हो सकता है, लेकिन भारत में कई बीमारियों के लिए हल्दी दूध को सदियों से इस्तेमाल किया जा रहा है।

वास्तव में इसके पीछे एक ठोस वजह रही है। इस बात पर कोई बहस नहीं हो सकती कि हल्दी में एंटीबायोटिक और एंटीसेप्टिक गुणों की भरमार है। साथ ही कैल्सियम से भरपूर दूध के साथ इसका सेवन करना निसंदेह स्वास्थ्य वर्धक है। रोज हल्दी वाला दूध पीने से पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम मिलती है। इस कैल्शियम से हड्डियां स्वस्थ और मजबूत होती हैं। हल्दी वाला दूध ऑस्टियोपोरेसिस के मरीजों को काफी राहत देता है। वैसे भी विश्व भर में हल्दी की औषधीय एवं औद्योगिक उपयोग के कारण अपनी एक अलग पहचान है। केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र तमिलनाडू मुख्य रूप से व्यावसायिक हल्दी उत्पादक राज्य जाने जाते हैं। उत्तराखंड के साथ हिमाचल में भी पहाड़ी हल्दी पाई जाती है। इन राज्यों में हल्दी पुरातन काल से ही विभिन्न बीमारियों के निवारण तथा सौंदर्य प्रसाधन के रूप में प्रयोग की जाती रही है। विशेषता यह है कि यहां पहाड़ी हल्दी का उत्पादन होता है। हल्दी की फसल जितनी गहरी होगीए उतनी ज्यादा बेहतर पोषक तत्व से भरपूर होगी। हल्दी जितना ज्यादा समय तक जमीन में रहती हैए उसमें गुण बढ़ते जाते हैं। बाकी जगह 6 महीने में हल्दी की फसल तैयार कर ली जाती है। पहाड़ी हल्दी की कीमत 550 रुपये प्रति किलो हैए जबकि सामान्य हल्दी करीब 300 रुपये किलो बिकती है। हल्दी की खेती के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं होती। पहाड़ की जलवायु हल्दी की उपज के अनुकूल है। बाजार में हल्दी का अन्य उपजों से मूल्य भी ज्यादा मिलता है। ऐसे में किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती की ट्रेनिंग दी जाए, उन्हें उन्नत बीज, बढ़िया खाद सिंचाई के साधन मुहैया कराए जाएं तो उपज में बढ़ोत्तरी हो सकती है। पहाड़ पर खुशहाली आ सकती है।

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