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हर्बल पकौड़े खाइये और स्वास्थ्य बनाइये

08/01/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत एक ऐसा देश है जहां का भोजन विभिन्न संस्कृति और विविधता का एक सुंदर मेल है। भारत में कई ऐसे व्यंजन बनाए जाते हैं जिनके बारे में सोचते ही लोगों के मुंह में पानी आने लगता है। यहां के मसालों से बने व्यंजन और स्वादिष्ट मिठाइयां बेहद सुगंधित होती हैं। लेकिन वहीं दूसरी तरफ भारत में कुछ स्थानों पर ऐसे अजीबोगरीब व्यंजन खाए जाते हैं जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे। यह व्यंजन भारत के आम व्यंजनों से बिल्कुल अलग हैं। देश के कई ऐसे हिस्से हैं जहां पर कुछ अलग तरह के, लेकिन बेहद टेस्टी पकौड़े बनते हैं आम तौर पर लोग बेहद चाव से पकौड़े खाते है और वो लगते भी बेहद टेस्टी है, लेकिन अगर आपको ऐसे पकौड़े खाने को मिले जो स्वादिष्ट के साथ साथ आपकी सेहत के लिए भी फायदेमंद हो तो आप उसे ज्यादा खाना पसंद करेंगे, क्योंकि अधिकतर लोग पकौड़ो को इसलिए नही खाते क्योंकि उन्हें लगता है कि ज्यादा तेल में तले गए पकौड़े सेहत के लिए अच्छे नही होते, लेकिन उत्तराखंड के पकौड़ों की बात ही अलग है।
नैनीताल जिले में स्थित मुक्तेश्वर उत्तराखंड के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। पहाड़ी हसीन वादियों से सजा यह पर्वतीय गंतव्य समुद्र तल से लगभग 2286 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस शहर का नाम यहां के एक प्राचीन शिव मंदिर से लिया गया है, जिसके देखने के लिए दूर.दराज से सैलानी यहां तक का सफर तय करते हैं। मुक्तेश्वर अक्सर अपने शांतिपूर्ण माहौल के लिए जाना जाता है, इसलिए इसे मूक शहर, साइलेंट सिटी भी कहते हैं। 220 वर्ग मील के क्षेत्र में फैली 22 से अधिक बर्फीली चोटियां और घने देवदार के जंगल इस शहर को खास बनाने का काम करते हैं। यहां घूमने.फिरने के लिहाज से कई दर्शनीय स्थल मौजूद हैं। हर्बल पकौड़े जो आपको नैनीताल के खूबसूरत पर्यटन स्थल मुक्तेश्वर में मिल जायेंगे। मुक्तेश्वर में दुकानदार अपने हर्बल पकौडों से सैलानियों के स्वागत के लिए हमेशा तैयार मिलते हैं।
ये पकोड़े इतने स्वादिस्ट होते है कि आप इन्हें खाये बिना नही रह सकते। इन पकौड़ों को कुमाऊंनी भाषा में कासनी कहते हैं। ये पकौड़े जड़ी बूटी से तैयार किए जाते हैं। ये कासनी स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होती है। ये हर्बल पकौड़े किडनी और लीवर की बीमारियों के लिए ये रामबाण औषधि मानी जाती है। मुक्तेश्वर में केवल हर्बल पकौड़े ही नहीं बल्कि हर्बल टी यानी चाय भी मिल जाती है, जो कि ना सिर्फ औषधीय गुणों से भरपूर है बल्कि गैस, बदहजमी, सर्दी, जुकाम के लिए रामबाण औषधि मानी जाती है। इस हर्बल चाय में रोजमेरी, थाइम, ऑरिगेनो, टिबिया, स्वीट ब्लेसिल, सेज, मार्जरम, स्टीरिया जैसी कई प्राकृतिक वातावरण में उगने वाली जड़ी बूटियों को एक साथ मिलाया जाता है।
औषधीय खेती करने वाले किसानों के दिन अब बहुरने लगे हैं। ऐसे किसान अब घर बैठे ही अपनी फसल की अच्छी कीमत ले रहे हैं। इसका कारण यह है कि यहां के किसान कांट्रैक्ट फार्मिग अपना रहे हैं। कंपनियों के कहने पर किसान औषधीय खेती कर रहे हैं। ये कंपनियां उनकी फसल अमेरिका व दूसरे देशों में सप्लाई करती हैं। पहले जहां जनपद में एलोवीरा व स्टीविया की खेती की जा रही थी, वहीं अब दूसरी औषधीय फसलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। औषधीय खेती के कारण उसके आसपास गांवों के लोगों को इससे रोजगार भी मिल रहा है। किसान को भी इसकी खेती से दोगुनी आमदनी हो रही है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रदेश में उच्च गुणवत्तायुक्त के फसल उत्पादन कर देश.दुनिया में स्थान बनाने के साथ राज्य की आर्थिकी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में पलायान को रोकने का अच्छा विकल्प बनाया जा सकता है। अगर ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती हैण् हर्बल पकौड़े ही नही बल्कि हर्बल टी यानी चाय भी प्रदेश विज्ञान एवं पर्यावरण परिषद को भी पेटेंट करवाया की जरूरत हैण्उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं ही नहींए यहां के खान.पान में भी विविधता का समावेश है।

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