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हरेला उत्तराखंड का यह लोकपर्व देता है पर्यावरण संरक्षण का संदेश

07/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देश के सबसे बड़े सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ब्रज प्रांत क्षेत्र के प्रचारक डॉ. हरीश रौतेला से समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर हरेला हम सबके लिए जरूरी क्यों है। डॉ. रौतेला कहते हैं कि हरेला एक ऐसा त्योहार है जो हिमालय से निकलकर पूरी दुनिया को एकात्म कर देने का संदेश देता है। हरेला का मतलब क्या है, संपूर्ण प्रकृति हरी-भरी रहती है तो उसके चलते देश खुशहाल होता है। उत्तराखंड में ऋषियों-मुनियों ने हरेला क्यों बनाया, यह समझने की जरूरत है। गंगा, गंगा क्यों बनती है क्योंकि गंगा में एक विषाणु होता है, जिसके चलते उसमें दूसरा कोई विषाणु टिक नहीं पाता। इसीलिए हिमालय से निकलने वाली गंगा वैसी ही बनी रहती है। वह जो विषाणु है, वह निश्चित जलवायु में होता है। अगर तापमान बढ़ेगा तो मुश्किल होगी। हरेला के कारण सारा हिमालय हरा-भरा रहना चाहिए। वहां ठंडक बनी रहनी चाहिए। डॉ. हरीश रौतेला ने 8 साल पहले हरेला पर्व सप्ताह में 25 लाख पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा था, यह सफलतापूर्वक पूरा किया गया। पिछले कुछ वर्षों में लोगों का जुड़ाव फिर अपनी सांस्कृतिक जमीन से होने लगा है। इसी का परिणाम है कि अब हरेला पर्व देश-विदेश में बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। लोग ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने का प्रयास करते हैं। पिछले साल लगभग 50 से ज्यादा देशों में हरेला पर्व मनाया गया। इस साल हरेला पर एक भागीरथ प्रयास की शुरुआत हो रही है। यह है हरेला के अवसर पर पहाड़ों पर अपने प्राकृतिक स्रोतों, पानी के नौलों का संरक्षण करना। यह बात छिपी नहीं है कि पहाड़ों के बड़े हिस्से में गर्मियों का मौसम पानी की भारी किल्लत के बीच कटता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम अपने प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण करने के लिए व्यापक अभियान चलाएं। इसी के तहत लोगों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे अपने गांवों में प्राकृतिक स्रोतों, नौलों का पुनरोद्धार करें, उसके आसपास पेड़-पौधे लगाएं। ताकि नौलों में पानी की उपलब्धता को साल भर सुनिश्चित किया जा सके। हरेला की व्यापकता को देखकर उत्तराखंड सरकार ने भी इस पर्व पर अवकाश की घोषणा कर रखी है। आगामी 16 जुलाई को हरेला पर्व मनाया जाएगा, ऐसे में प्रयास है कि ज्यादा से से ज्यादा लोग इस महाअभियान मे अपनी आहुति दें और हरेला लोकपर्व पर पेड़ लगाने का प्रयास करें। डॉ. हरीश रौतेला उत्तराखंड के प्रवासियों में शिक्षा की अलख भी जगा रहे हैं. वह हर जगह प्रवासी उत्तराखंडियों को सुपर-10 विद्यार्थी तैयार करने की सलाह देते हैं. उनका कहना है कि शिक्षा से परिवार, समाज और देश बदलता है. युवाओं को शिक्षित करने से उनका आने वाला कल समृद्ध होगा. इसलिए लोग चाहें कुमाऊं के हो या गढ़वाल के, कुछ ऐसे युवाओं को तैयार करने की जरूरत है जो आगे प्रांत ही नहीं देश का नाम रोशन कर सकें.डॉ. हरीश रौतेला कहते हैं कि ऐसे युवा तैयार करो जो आगे चलकर उत्तराखंड की पहचान को प्रसारित करेंगे. वह कहते हैं कि अच्छी शिक्षा से ही रोजगार का सृजन होता है. आपकी अच्छी शिक्षा होगी तो आप अच्छे स्टार्टअप शुरू कर सकेंगे. उनका मानना है कि साल 2050 तक भारत को सर्वाधिक स्टार्टअप देने वाला देश बनाना है.डॉ. हरीश रौतेला का महत्वपूर्ण योगदान हैकुल मिलाकर देखा जाय तो हरेला पर्व में लोक कल्याण की एक बहुत बड़ी व दूरदर्शी अवधारणा निहित दिखाई देती है। समूचे वैश्विक स्तर पर आज पूंजीवादी और बाजारवादी संस्कृति जिस तरह प्रकृति और समाज से दूर होती जा रही है यह बहुत चिन्ताजनक बात है। ऐसे में निश्चित तौर पर लोक के बीच मनाया जाने वाला यह हरेला पर्व हमें प्रकृति और संस्कृति के करीब आने का सार्थक संदेश देता है। वह निश्चित ही पहाड़ की संस्कृति, समाज और परम्परा से निरन्तर जुड़े रहने की सजग प्रेरणा देता है। समाज और प्रकृति में हरेले की महत्ता को देखते हुए उत्तराखण्ड सरकार तथा ‘धाद’ सहित कई संगठनों ने भी पिछले सालों से सामाजिक स्तर पर हरेला मनाने की कवायद शुरू कर दी है जिसके तहत राज्य में पर्यावरण और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिये जन चेतना और जागरूता पैदा करने के सार्थक प्रयास हो रहे हैं.. निश्चित तौर पर समाज में इस तरह के प्रयास प्रकृति और संस्कृति के प्रति संवेदनशील होने और संरक्षण की दिशा में सुखद संकेत माने जा सकते हैं। कुल मिलाकर देखा जाय तो हरेला पर्व में लोक कल्याण की एक समग्र अवधारणा निहित है। समूचे वैश्विक स्तर पर आज पूंजीवादी और बाजारवादी संस्कृति जिस तरह प्रकृति और समाज से दूर होती जा रही है यह बहुत चिन्ताजनक बात है। ऐसे में निश्चित तौर पर लोक के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व हमें प्रकृति के करीब आने का सार्थक संदेश देता है। समाज और प्रकृति में हरेले की महत्ता को देखते हुए उत्तराखण्ड सरकार भी पिछले साल से सरकारी स्तर पर हरेला मनाने की कवायद कर रही है जिसके तहत राज्य में पर्यावरण और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिये स्कूली बच्चों व आम जनता के मध्य जन चेतना और जागरूता पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं जो कि एक नितान्त सकारात्मक पहल है। एक अन्य विशेष बात है कि जब तक किसी परिवार का विभाजन नहीं होता है, वहां एक ही जगह हरेला बोया जाता है, चाहे परिवार के सदस्य अलग-अलग जगहों पर रहते हों. परिवार के विभाजन के बाद ही सदस्य अलग हरेला बो और काट सकते हैं. इस तरह से आज भी इस पर्व ने कई परिवारों को एकजुट रखा हुआ है देश के सबसे बड़े सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ब्रज प्रांत क्षेत्र के प्रचारक डॉ. हरीश रौतेला से समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर हरेला हम सबके लिए जरूरी क्यों है। डॉ. रौतेला कहते हैं कि हरेला एक ऐसा त्योहार है जो हिमालय से निकलकर पूरी दुनिया को एकात्म कर देने का संदेश देता है। हरेला का मतलब क्या है, संपूर्ण प्रकृति हरी-भरी रहती है तो उसके चलते देश खुशहाल होता है। उत्तराखंड में ऋषियों-मुनियों ने हरेला क्यों बनाया, यह समझने की जरूरत है। गंगा, गंगा क्यों बनती है क्योंकि गंगा में एक विषाणु होता है, जिसके चलते उसमें दूसरा कोई विषाणु टिक नहीं पाता। इसीलिए हिमालय से निकलने वाली गंगा वैसी ही बनी रहती है। वह जो विषाणु है, वह निश्चित जलवायु में होता है। अगर तापमान बढ़ेगा तो मुश्किल होगी। हरेला के कारण सारा हिमालय हरा-भरा रहना चाहिए। वहां ठंडक बनी रहनी चाहिए। डॉ. हरीश रौतेला ने 8 साल पहले हरेला पर्व सप्ताह में 25 लाख पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा था, यह सफलतापूर्वक पूरा किया गया। पिछले कुछ वर्षों में लोगों का जुड़ाव फिर अपनी सांस्कृतिक जमीन से होने लगा है। इसी का परिणाम है कि अब हरेला पर्व देश-विदेश में बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। लोग ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने का प्रयास करते हैं। पिछले साल लगभग 50 से ज्यादा देशों में हरेला पर्व मनाया गया। कोरोना के चलते यह आयोजन सीमित था, लेकिन इस बार यह भव्य तरीके से होगा।इस साल हरेला पर एक भागीरथ प्रयास की शुरुआत हो रही है। यह है हरेला के अवसर पर पहाड़ों पर अपने प्राकृतिक स्रोतों, पानी के नौलों का संरक्षण करना। यह बात छिपी नहीं है कि पहाड़ों के बड़े हिस्से में गर्मियों का मौसम पानी की भारी किल्लत के बीच कटता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम अपने प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण करने के लिए व्यापक अभियान चलाएं। इसी के तहत लोगों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे अपने गांवों में प्राकृतिक स्रोतों, नौलों का पुनरोद्धार करें, उसके आसपास पेड़-पौधे लगाएं। ताकि नौलों में पानी की उपलब्धता को साल भर सुनिश्चित किया जा सके। हरेला की व्यापकता को देखकर उत्तराखंड सरकार ने भी इस पर्व पर अवकाश की घोषणा कर रखी है। आगामी 16 जुलाई को हरेला पर्व मनाया जाएगा, ऐसे में प्रयास है कि ज्यादा से से ज्यादा लोग इस महाअभियान मे अपनी आहुति दें और हरेला लोकपर्व पर पेड़ लगाने का प्रयास करें। डॉ. हरीश रौतेला उत्तराखंड के प्रवासियों में शिक्षा की अलख भी जगा रहे हैं. वह हर जगह प्रवासी उत्तराखंडियों को सुपर-10 विद्यार्थी तैयार करने की सलाह देते हैं. उनका कहना है कि शिक्षा से परिवार, समाज और देश बदलता है. युवाओं को शिक्षित करने से उनका आने वाला कल समृद्ध होगा. इसलिए लोग चाहें कुमाऊं के हो या गढ़वाल के, कुछ ऐसे युवाओं को तैयार करने की जरूरत है जो आगे प्रांत ही नहीं देश का नाम रोशन कर सकें.डॉ. हरीश रौतेला कहते हैं कि ऐसे युवा तैयार करो जो आगे चलकर उत्तराखंड की पहचान को प्रसारित करेंगे. वह कहते हैं कि अच्छी शिक्षा से ही रोजगार का सृजन होता है. आपकी अच्छी शिक्षा होगी तो आप अच्छे स्टार्टअप शुरू कर सकेंगे. उनका मानना है कि साल 2050 तक भारत को सर्वाधिक स्टार्टअप देने वाला देश बनाना है.डॉ. हरीश रौतेला का महत्वपूर्ण योगदान हैकुल मिलाकर देखा जाय तो हरेला पर्व में लोक कल्याण की एक बहुत बड़ी व दूरदर्शी अवधारणा निहित दिखाई देती है। समूचे वैश्विक स्तर पर आज पूंजीवादी और बाजारवादी संस्कृति जिस तरह प्रकृति और समाज से दूर होती जा रही है यह बहुत चिन्ताजनक बात है। ऐसे में निश्चित तौर पर लोक के बीच मनाया जाने वाला यह हरेला पर्व हमें प्रकृति और संस्कृति के करीब आने का सार्थक संदेश देता है। वह निश्चित ही पहाड़ की संस्कृति, समाज और परम्परा से निरन्तर जुड़े रहने की सजग प्रेरणा देता है। समाज और प्रकृति में हरेले की महत्ता को देखते हुए उत्तराखण्ड सरकार तथा ‘धाद’ सहित कई संगठनों ने भी पिछले सालों से सामाजिक स्तर पर हरेला मनाने की कवायद शुरू कर दी है जिसके तहत राज्य में पर्यावरण और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिये जन चेतना और जागरूता पैदा करने के सार्थक प्रयास हो रहे हैं.. निश्चित तौर पर समाज में इस तरह के प्रयास प्रकृति और संस्कृति के प्रति संवेदनशील होने और संरक्षण की दिशा में सुखद संकेत माने जा सकते हैं। कुल मिलाकर देखा जाय तो हरेला पर्व में लोक कल्याण की एक समग्र अवधारणा निहित है। समूचे वैश्विक स्तर पर आज पूंजीवादी और बाजारवादी संस्कृति जिस तरह प्रकृति और समाज से दूर होती जा रही है यह बहुत चिन्ताजनक बात है। ऐसे में निश्चित तौर पर लोक के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व हमें प्रकृति के करीब आने का सार्थक संदेश देता है। समाज और प्रकृति में हरेले की महत्ता को देखते हुए उत्तराखण्ड सरकार भी पिछले साल से सरकारी स्तर पर हरेला मनाने की कवायद कर रही है जिसके तहत राज्य में पर्यावरण और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिये स्कूली बच्चों व आम जनता के मध्य जन चेतना और जागरूता पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं जो कि एक नितान्त सकारात्मक पहल है। एक अन्य विशेष बात है कि जब तक किसी परिवार का विभाजन नहीं होता है, वहां एक ही जगह हरेला बोया जाता है, चाहे परिवार के सदस्य अलग-अलग जगहों पर रहते हों. परिवार के विभाजन के बाद ही सदस्य अलग हरेला बो और काट सकते हैं. इस तरह से आज भी इस पर्व ने कई परिवारों को एकजुट रखा हुआ है उत्तराखंड जितना खूबसूरत है, उतनी ही समृद्ध यहां की संस्कृति है. यहां के लोकपर्व, रहन-सहन, खानपान कई मायनों में प्रकृति से जुड़े हुए हैं. आज हम आपको उत्तराखंड के ऐसे ही एक लोकपर्व के बारे में बताने जा रहे हैं, जो प्रकृति से जुड़ा हुआ है. हरेला पर्व खासकर कुमाऊं मंडल में मनाया जाता है. हरेला खासतौर से एक पौधा होता है, जिसे सात प्रकार के अनाजों के बीजों को बोकर उगाया जाता है. वैसे कुछ लोग हरेला साल में तीन बार मनाते हैं लेकिन मुख्य रूप से सावन मास के पहले दिन अर्थात एक गते श्रावण को मनाया जाता है. इस पर्व को लेकर मान्यता है कि घर में हरेला जितना ज्यादा बड़ा होगा, उतना ही उनकी खेती व समृद्धि में इजाफा देखने को मिलेगा. प्रकृति को समर्पित उत्तराखंड का यह लोकपर्व हर साल कर्क संक्रांति को श्रावण मास के प्रथम दिन मनाया जाता है. यह त्योहार प्रकृति प्रेम के साथ-साथ कृषि विज्ञान को भी समर्पित है. 10 दिन की प्रक्रिया में मिश्रित अनाज को घर के देवस्थान में उगाकर कर्क संक्रांति के दिन हरेला काटकर यह त्योहार मनाया जाता है. जिस प्रकार मकर संक्रांति से सूर्य देव उत्तरायण हो जाते हैं और दिन बढ़ते रहते हैं, वैसे ही कर्क संक्रांति से सूर्य देव दक्षिणायन हो जाते हैं और कहा जाता है हरेला बोने के लिए कुछ दिन पहले घर के पास किसी शुद्ध स्थान से मिट्टी निकालकर सुखाई जाती है और उसे छानकर रख लिया जाता है. हरेला बोने के लिए मालू या तिमले के पत्तों के दौनों का प्रयोग किया जाता है. मालू या तिमले के पत्तों के बड़े दोनों को खोपी कहते हैं. ये दोनों ही शुद्ध माने जाते हैं और इससे प्रदूषण भी नहीं होता. हरेला में 7 या 5 प्रकार के अनाज का मिश्रण करके बोया जाता है. इन अनाजों में धान, गेहूं, मक्का, भट, उड़द, गहत, तिल आदि को मिश्रित करके बोया जाता है. इस प्रक्रिया को ही हरेला बोना कहा जाता है. इन अनाजों को बोने के पीछे संभवतः मूल उद्देश्य यह देखना भी है कि उस वर्ष इन अनाजों के अंकुरण की स्थिति कैसी रहेगी. इसके बाद बोए हरेले को मंदिर के कोने में सूर्य की किरणों से बचाकर रख दिया जाता है. इनमें 2 या 3 दिन बाद अंकुरण शुरू हो जाता है. जिसके बाद हर दिन इसे घर की कन्याएं पानी डालकर सींचती हैं. हरेले की पूर्व संध्या के दिन हरेले की गुड़ाई-निराई की जाती है. हरेले के दोनों को रक्षाधागे से बांध दिया जाता है और गंध, अक्षत चढ़ाकर उसका निराजन किया जाता है. इसके अतिरिक्त कुमाऊं क्षेत्र में कई स्थानों में कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार हरेले के अवसर पर चिकनी मिट्टी में रुई लगाकर शिव, पार्वती, गणेश भगवान के डिकरे बनाकर उन्हें हरेले के बीच में रखकर उनके हाथों में दाड़िम या किलमोड़ा की लकड़ी गुड़ाई के निमित्त पकड़ा देते हैं. इसके अतिरिक्त गणेश और कार्तिकेय जी के डिकरे भी बनाते हैं. इनकी विधिवत पूजा की जाती है और मौसमी फलों का चढ़ावा भी चढ़ाया जाता है. अब वर्तमान में यह परंपरा बहुत कम हो गई है. हरेले के दिन पंडित जी देवस्थान में हरेले की प्राण प्रतिष्ठा करते हैं. पकवान बनाए जाते हैं. पहाड़ों में किसी भी शुभ कार्य या त्योहार पर उड़द की पकौड़ी जिसे स्थानीय भाषा में (मास का बड़ा) कहते हैं, बनाना जरूरी होता है. पूड़ी के साथ बड़ा जरूर बनता है. प्रकृति की रक्षा के प्रण के साथ पौधे लगाते हैं. सभी मंदिरों में हरेला चढ़ाया जाता है. साथ-साथ घर में छोटों को बड़े लोग हरेले के आशीष गीत के साथ हरेला लगाते हैं और गांव में या रिश्तेदारी में नवजात बच्चों को विशेष करके हरेला भेजा जाता है. सावन लगने से नौ दिन पहले पांच या सात प्रकार के अनाज के बीज एक रिंगाल को छोटी टोकरी में मिटटी डाल के बोई जाती हैं इसे सूर्य की सीधी रोशनी से बचाया जाता है और प्रतिदिन सुबह पानी से सींचा जाता है। 9 वें दिन इनकी पाती की टहनी से गुड़ाई की जाती है और दसवें यानि कि हरेला के दिन इसे काटा जाता है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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