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एलीफेंट कॉरिडोर से होकर प्रस्तावित ऋषिकेश–भानियावाला फोर-लेन सड़क परियोजना को निरस्त करने की मांग; नागरिकों ने उठाए पर्यावरण, कानून और जनसुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल

07/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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देहरादून, 7 जुलाई, 2026

आज देहरादून प्रेस क्लब में आयोजित एक प्रेस वार्ता में चिंतित नागरिकों ने नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया) तथा उत्तराखंड सरकार से पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील एलीफेंट कॉरिडोर से होकर गुजरने वाली प्रस्तावित ऋषिकेश–भानियावाला फोर-लेन सड़क परियोजना पर पुनर्विचार करते हुए इसे निरस्त करने की मांग की।

वक्ताओं ने इस परियोजना के जंगलों, वन्यजीवों, मानव सुरक्षा तथा दून घाटी के दीर्घकालिक पारिस्थितिक भविष्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएँ व्यक्त कीं।

चर्चा की शुरुआत करते हुए इरा चौहान ने कहा कि इस सड़क चौड़ीकरण को केवल एक परिवहन परियोजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे उत्तराखंड के सबसे महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारों में से एक पर दूरगामी प्रभाव डालने वाले निर्णय के रूप में समझा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि एलीफेंट कॉरिडोर वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन और हैबिटेट कनेक्टिविटी को बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बड़े पैमाने पर वनों के विखंडन से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है तथा हाथियों सहित अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि विकास और संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना जाना चाहिए तथा ऐसे महत्वपूर्ण निर्णयों से पहले व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

परियोजना के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए हिमांशु अरोड़ा ने कहा कि हाल में की गई वृक्ष कटाई ऐसे समय में हुई है जब यह विषय अभी भी न्यायिक विचाराधीन है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस वर्ष जनहित याचिका का निस्तारण करते समय स्पष्ट किया था कि एलीफेंट कॉरिडोर और वृक्ष कटान से जुड़े मुद्दे पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित हैं।

उन्होंने कहा कि हॉस्पिटैलिटी एसोसिएशन ऑफ मुदुमलाई बनाम इन डिफेंस ऑफ एनवायरनमेंट एंड एनिमल्स एंड अदर्स और अनीता कंडवाल बनाम स्टेट ऑफ उत्तराखंड जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल को लागू करते हुए वन भूमि और एलीफेंट कॉरिडोरों के संरक्षण पर विशेष बल दिया है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या वर्तमान में की जा रही वृक्ष कटाई इन न्यायिक निर्देशों की भावना के अनुरूप है। उन्होंने बताया कि इस विषय में न्यायालयों के समक्ष उपयुक्त कानूनी कार्यवाही सहित विभिन्न विधिक विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।

ऋषिकेश निवासी दिनेश सेमवाल ने कहा कि राजाजी परिदृश्य और व्यापक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को जोड़ने वाले इन वनों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदाय वर्षों से वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व में रहते आए हैं, लेकिन यदि वनों का विखंडन बढ़ता है तो मानव और हाथियों के बीच टकराव की घटनाएँ भी बढ़ेंगी जिससे दोनों के लिए खतरा उत्पन्न होगा। उन्होंने एक लंबे समय से स्थानीय निवासी होने के नाते कहा कि उन्होंने इस मार्ग पर कभी भी ऐसा यातायात दबाव या जाम नहीं देखा जिससे फोर-लेन सड़क की आवश्यकता उचित प्रतीत हो।

प्रेस वार्ता का समापन करते हुए अनूप नौटियाल ने प्रश्न उठाया कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने उत्तराखंड में पहली बार मानसून के दौरान बड़े पैमाने पर वृक्ष कटान क्यों शुरू किया। उन्होंने कहा कि मानसून का मौसम परंपरागत रूप से वृक्षारोपण और पारिस्थितिक पुनर्जीवन का समय माना जाता है, इसलिए इस अवधि में पेड़ों की कटाई पर्यावरणीय और सार्वजनिक नीति—दोनों दृष्टियों से अत्यंत चिंताजनक है।

उन्होंने उत्तराखंड में विकास परियोजनाओं के लिए लगातार वन भूमि के हस्तांतरण पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अब तक लगभग 50,000 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की जा चुकी है, जबकि कम्पेंसेटरी अफ़ॉरेस्टेशन का रिकॉर्ड अत्यंत निराशाजनक रहा है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या राज्य सरकार का आर्थिक विकास और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का मॉडल वास्तव में अपने घोषित उद्देश्यों को प्राप्त कर पा रहा है, विशेषकर तब जब राज्य के वन, जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र लगातार बढ़ते दबाव का सामना कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एलीफेंट कॉरिडोर केवल वन्यजीव संरक्षण का विषय नहीं है बल्कि मानव सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा हुआ है, क्योंकि प्राकृतिक आवागमन मार्ग बाधित होने पर मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएँ बढ़ने की आशंका रहती है।

सभी वक्ताओं ने सामूहिक रूप से उत्तराखंड सरकार तथा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से आग्रह किया कि इस परियोजना का दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता, वन्यजीव संरक्षण और जलवायु अनुकूल विकास के दृष्टिकोण से पुनर्मूल्यांकन किया जाए तथा अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति होने से पहले सभी व्यवहार्य विकल्पों का पारदर्शी तरीके से परीक्षण किया जाए।

नागरिक समूह ने अपने अभियान के अगले चरण की भी घोषणा की। 8 जुलाई को नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया के कार्यालय के बाहर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। साथ ही इस वर्ष हरेला पर्व को “ब्लैक हरेला” के रूप में मनाया जाएगा, ताकि उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर हो रही वृक्षों और वनों की कटाई के प्रति जनजागरूकता बढ़ाई जा सके।

अभियान का उद्देश्य अधिक से अधिक नागरिकों को इस मुद्दे से जोड़ना तथा यह संदेश देना है कि उत्तराखंड का विकास उसके जंगलों, वन्यजीवों और समृद्ध पारिस्थितिक विरासत के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए ही होना चाहिए।

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