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धधक रहे उत्तराखंड के जंगल

30/04/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
पर्यावरण के संरक्षण की बात हो या फिर वनाग्नि से पर्यावरण को हो रहे नुकसान की चर्चाएं. उत्तराखंड हमेशा इन मामलों में राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरता है. पिछले दिनों वनाग्नि की घटनाओं को लेकर भी उत्तराखंड सबकी जुबां पर रहा, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि वनाग्नि के मामले में देश के कई दूसरे राज्य उत्तराखंड के मुकाबले काफी आगे हैं. यानी राष्ट्रीय स्तर पर भले ही उत्तराखंड सुर्खियों में नंबर वन हो, लेकिन जंगलों की आग के मामले में बाकी कई राज्यों से पीछे है. जंगलों की आग हमेशा उत्तराखंड को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाओं में लाती है, 2004 से 2017 में त्रिपुरा, तेलंगाना, मिजोरम, उड़ीसा, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, असम और आंध्र प्रदेश में उत्तराखंड से ज्यादा वनाग्नि की घटनाएं घटित हुईं. उत्तराखंड में जंगलों की आग को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाओं की एक वजह राज्य का पर्यावरण को लेकर ज्यादा संवेदनशील होना भी है. प्रदेश का करीब 70 फ़ीसदी क्षेत्र वन आच्छादित है और वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में वन संपदा बढ़ रही है. ऐसे में बाकी राज्यों में वनाग्नि की ज्यादा घटना होने के बावजूद उत्तराखंड का सुर्खियों में रहने के कई दूसरे कारण भी हैं.लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि उत्तराखंड के जंगल देश में सबसे ज्यादा धधक रहे हैं. दरअसल देश में वनाग्नि की घटनाएं अधिकतर राज्यों में रिकॉर्ड की जाती हैं. उत्तराखंड भी इन्हीं राज्यों में शुमार है. फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के वनाग्नि को लेकर दिए गए आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि देश के कई राज्य वनाग्नि को लेकर चिंताजनक स्थिति में हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य की सबसे ज्यादा रहती है. प्रदेश में बीते 24 घंटे में वनाग्नि की घटनाओं में करीब तीन गुना तक बढ़ाेतरी हुई है। इसमें जंगल को काफी नुकसान पहुंचा है।15 फरवरी से फायर सीजन शुरू हो जाता। 26 अप्रैल तक प्रदेश में जंगल में आग लगने की 100 घटनाएं हुई थी, इसमें 105 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में नुकसान पहुंचा। 27 अप्रैल को 12 वनाग्नि की घटनाओं में करीब 31 हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल प्रभावित हुआ है। बीते 24 घंटे में राज्य में करीब तीन गुना 33 घटनाएं रिपोर्ट की गई हैं, इसमें 39 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में जैव विविधता प्रभावित हुई है। उत्तराखंड में गर्मी की दस्तक के साथ ही जंगलों व शहरों में वनाग्नि का खतरा एक बार फिर से मंडराने लगा है। बीते कुछ वर्षों में उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र गर्मी में धधकते नजर आते रहे है. जिससे ना सिर्फ वन संपदा का भारी नुकसान होता है बल्कि स्थानीय आबादी पर्यावरण और जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर भी संकट गहराने लगा है। इसी बढ़ते खतरे को देखते हुए मुख्यमंत्री ने सभी जिलाधिकारियों और विभागीय सचिवों के साथ वर्चुअल बैठक कर वनाग्नि प्रबंधन और चारधाम यात्रा की तैयारियों की गहन समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने साफ निर्देश दिए कि वनाग्नि की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में उपकरणों और संसाधनों की समुचित व्यवस्था की जाए. साथ ही स्थानीय नागरिकों जनप्रतिनिधियों और मोबाइल गश्ती टीमों के सहयोग से त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली विकसित की जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि वन विभाग और जिला प्रशासन को समन्वय बनाकर वनाग्नि पर नियंत्रण के लिए प्रभावी रणनीति अपनानी होगी। संवेदनशील क्षेत्रों में टीमें तैनात कर मॉनिटरिंग की जाए। मोबाइल गश्ती दल सक्रिय किए जाएं और सूचना तंत्र को मजबूत बनाकर हर छोटी-बड़ी सूचना पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही आज पूरे प्रदेश में आपदाओं से निपटने के लिए संयुक्त टीमों की चार धाम यात्रा को लेकर आज यू एसडीएमए बिल्डिंग स्थित राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र में मॉक ड्रिल भी जारी की गई है.जो आने वाले समय पर किसी भी आपदा से निपटने में कामयाब साबित होगी। वही विपक्ष ने सरकार के दावों को हवा-हवाई बताते हुए कहा सरकार की धरातल पर कोई तैयारी नही दिख रही।गौरतलब है कि उत्तराखंड में हर साल सैकड़ों हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आ जाते हैं। 2024 में अकेले गर्मियों के मौसम में 1,000 से अधिक वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गई थी. जिनसे करीब 1,800 हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो गए थे। इससे न केवल वन्यजीवों का प्राकृतिक घर नष्ट हुआ बल्कि कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वॉर्मिंग पर भी गंभीर असर पड़ा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट किया कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए जनसहयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि लोगों को जागरूक करने सूचनाओं को तुरंत साझा करने और वन संपदा को बचाने के लिए स्थानीय समाज की सक्रिय भागीदारी ज़रूर होनी चाहिए है।उत्तराखंड के जंगल आग से धधकने शुरू हो चुके है. कई क्षेत्रों में आग पर काबू पाने के बावजूद फिर जंगलों में आग लग रही है. वहीं विपक्ष ने सरकार के आपदा प्रबंधन तंत्र को फेल बताते हुए सरकार पर जमकर हमला बोला है।राज्य के जंगलों में वनाग्नि का फैलना चिंता का विषय बन गया है कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों के पांच जिले ऐसे हैं जो व्यापक रूप से आग लगने की वजह से प्रभावित हुए हैं. उन्होंने कहा आपदा प्रबंधन तंत्र का सिस्टम गड़बड़ाया हुआ है। शासन प्रशासन की ओर से वनाग्नि को रोकने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जंगलों में लगी आग को अब तक नियंत्रित नहीं किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि जो तैयारी सितंबर अक्टूबर से शुरू हो जानी चाहिए थी उसमें विलंब किया गया. उन्होंने सवाल उठाया कि हर साल होने वाली वनाग्नि की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार पहले से ही जरूरी कदम क्यों नहीं उठाती। मई और जून भीषण गर्मी के महीने मानें जाते हैं, उन्होंने राजधानी देहरादून के बल्लू पुर के एक टावर में हुए भीषण अग्निकांड पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने आश्चर्य जताया कि आग लगने के काफी देर बाद तक कोई जिम्मेदार आला अधिकारी, स्थानीय विधायक मौके पर नहीं पहुंचे. उन्होंने कहा कि राजधानी देहरादून के कई इलाकों में पानी का संकट गहरा गया है. लेकिन प्रदेश सरकार को जनता के दुखों से कोई लेना-देना नहीं है. ऐसे में विपक्ष को सड़कों पर उतर कर आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा। फायर सीजन शुरू होते ही वन विभाग में आग बुझाने का काम करने वाले कर्मचारियों के लिए आधुनिक उपकरण भी उपलब्ध कराए हैं जिनमें आग न लगने वाले जूते, चश्मा और आग बुझाने के इक्विपमेंट दिए गए हैं। साथ ही वन विभाग की गस्ती गाड़ियों में भी पानी के गैलन रखे गए हैं.जिससे आग पर काबू पाया जा सके। वही सरकार की योजना हर घर जल हर घर नल के तहत नहीं मिल पा रहा पानी। हर साल बढ़ते तापमान को देखते हुए सरकार ने आने वाले 10 सालो में 30 साल तक जल संकट से निपटने के लिए अधिकारियो को ठोस प्लान बनाने के लिए निदेशित किया है साथ ही वनाग्नि जैसे गंभीर मुद्दे को भी प्रमुखता से जटिल रहने के आदेश किए है तापमान लगातार बढ़ रहा है वनाग्नि की कुछ घटनाएं भी प्रदेश में मिली जिस पर वक्त रहते काबू भी पाया गया लेकिन आने वाला समय प्रदेश में बढ़ती गर्मी के साथ वनाग्नि और जल संकट पैदा करता दिखाई दे रहा है।जिससे निपट पाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर सकता है। पिछले साल पहाड़ों पर आग लगने की घटना से लाखों की वन संपदा जल कर खाक हो गई थी. कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ में सबसे अधिक आग लगने की घटनाएं सामने आई थीं. इसके अलावा अल्मोड़ा, नैनीताल, चंपावत, बागेश्वर जैसे जिलों के कई जंगली क्षेत्र भी आग की चपेट में आए थे.वहीं गढ़वाल मंडल की बात करें तो यहां नरेंद्र नगर, उत्तरकाशी, मसूरी, कोटद्वार, टिहरी गढ़वाल, गोपेश्वर, रूद्रप्रयाग जैसे कई वन्य क्षेत्र आग की चपेट आ गए थे. उत्तराखंड वन विभाग के मुताबिक, आग लगने से 749.6375 रिजर्व फॉरेस्ट एरिया (हेक्टेयर) प्रभावित हुआ था हर साल जंगल में लगने वाली आग की घटनाएं लाखों पेड़ों को निगल जाती हैं, जिससे करोड़ों की वन संपदा बर्बाद हो जाती है. इसके साथ ही हजारों वन्य जीवों का आशियाना उजड़ जाता है या उनकी जान चली जाती है. उत्तराखंड के मौसम निदेशक ने कहा ग्लोबल स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग का असर है. जिसकी वजह से लगातार तापमान में बढ़ोतरी हो रही है. इसके अलावा उत्तराखंड की बात की जाए तो यहां पर भी लगातार टेंपरेचर पिछले कुछ सालों में बढ़ा है. उन्होंने कहा कि जैसे ही तापमान पहाड़ों में 30 के करीब पहुंचता है फॉरेस्ट फायर की घटनाओं में अचानक बढ़ोतरी हो जाती है. मौसम विभाग ने वन विभाग के साथ एक अनुबंध साझा किया है, जिसके तहत कस्टमाइज्ड फॉरकास्ट उत्तराखंड वन विभाग को साझा किया जाता है. तापमान बढ़ने के साथ-साथ वर्षा का भी फॉरकास्ट वन विभाग को दिया जाता है, जिससे वह अपनी रणनीति बनाने में इसका इस्तेमाल कर सके. अपर प्रमुख वन संरक्षक वनाग्नि ने बताया इस रीजनल कस्टमाइज फॉरकास्ट से अगले 5 दिन का फॉरकास्ट उन्हें मिलता है. इस फॉरकास्ट के आधार पर फॉरेस्ट डेंजर रेटिंग को भी निकाला जाता है, जिसमें संवेदनशील क्षेत्र को चिन्हित किया जाता है. इसी के आधार पर फॉरेस्ट फायर से लड़ने के लिए रणनीति तैयार की जाती है. अगर वन विभाग द्वारा लगातार किए जा रहे नवाचार और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से वनों में आग पर नियंत्रण पाने के सकारात्मक परिणाम की बात करें तो अलर्ट की संख्या पहले से अब तकरीबन आधा हो चुकी है. इस तरह से अगर पूरे 10 साल के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो सबसे पहली जो चौंकाने वाली बात है वह यह है कि इन 10 सालों में सबसे कम फॉरेस्ट फायर की घटनाएं 2020 में हुईं. यह वही साल है जब पूरी दुनिया कोविड के चपेट में थी. लोग अपने घरों में कैद थे. ऐसे में फॉरेस्ट फायर की घटनाएं न्यूनतम रहीं. जिससे साफ पता चलता है कि जंगलों में लगने वाली आग में कहीं ना कहीं मानवीय दखल होता है. जब 2020 में लॉकडाउन रहा तो फॉरेस्ट फायर की घटनाएं अपने न्यूनतम स्तर पर थी. इन 10 सालों के आंकड़ों में एक और विश्लेषण सामने आया कि साल 2016 से 19 तक फॉरेस्ट फायर की घटनाएं बढ़ी हैं. वहीं 2021-22 में भी लगातार फॉरेस्ट फायर की घटनाएं बढ़ी हैं. ऐसे में साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले 10 सालों में फॉरेस्ट फायर की घटनाओं में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है. उत्तराखंड सरकार इस वक्त चारधाम यात्रा की व्यवस्था में पूरी तरह से व्यस्त है. कोशिश यही है कि किसी भी तरह से श्रद्धालुओं को कोई भी दिक्कत ना आए. इसके बावजूद सरकार द्वारा वनाग्नि को शांत करने की कोशिशों के बाद भी वनों की आग नहीं बुझ पा रही है. वनाग्नि की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है. हालांकि मौसम विभाग का कहना है कि आने वाले तीन दिनों में उत्तराखंड में गर्मी का प्रकोप कम होगा और वह वनाग्नि की घटनाएं भी काम हो सकती हैं. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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