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उत्तराखंड के जल मंदिरों की संस्कृति का सरंक्षणको भी दिया मजबूर!

04/12/25
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

पहाड़ों में कभी नौले और धारे ही पीने के पानी के मुख्य साधन हुआ करते थे. आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के लोग पीने के पानी के लिए इन नौलों पर ही निर्भर हैं.पश्चिमी हिमालय में उत्तराखंड के शांत पर्वतीय क्षेत्र में, नौलों के नाम से प्रसिद्ध एक प्राचीन जल संग्रहण प्रणाली, स्थानीय आबादी के साथ-साथ पर्यावरण की भी जीवनदायिनी रही है। लघु मंदिरों की याद दिलाने वाली ये संरचनाएँ प्राकृतिक रूप से नीचे गिरते पानी को ग्रहण करती हैं और फिर उसे लोगों द्वारा पीने के लिए ग्रहण किया जाता है। सीमित संसाधनों वाले ग्रामीण समुदायों के लोगों को अपने दैनिक उपयोग के लिए ताज़ा पानी प्राप्त करने का यही एकमात्र साधन है।नौले अपनी विस्तृत पत्थर कटाई और कलात्मकता के कारण दर्शनीय हैं। ये जीवन के स्रोत के रूप में जल के प्रति समुदाय के सम्मान और क्षेत्र की समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। अतीत में न केवल लोग इन स्थानों पर एकत्रित होते रहे हैं, बल्कि ये मानव और प्रकृति के बीच एकता पर भी बल देते रहे हैं।आज, नौलों पर आधुनिकीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का खतरा मंडरा रहा है, जो दुनिया भर में व्याप्त चुनौतियाँ हैं। इसके साथ ही, बदलती जलवायु के कारण होने वाले संभावित परिवर्तन और बढ़ती जल आवश्यकताएँ भी जुड़ी हैं। विभिन्न स्थानीय पहलों द्वारा किए जा रहे कार्यों का उद्देश्य इस स्थानीय वास्तुकला के स्थलों का जीर्णोद्धार करना और साथ ही, जनता को उनकी सांस्कृतिक और कार्यात्मक भूमिकाओं से अवगत कराना है। इन स्थलों के अलावा, इनसे जुड़े ज्ञान और परंपराओं को भी भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। पहाड़ में प्राकृतिक जलस्रोत तेजी से खत्म हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण की चाल-खाल जैसी समृद्ध परंपरा अब लगभग लुप्त है तो शहरों में गलत नियोजन ने प्राकृतिक स्रोतों का दम निकाल दिया है। इस गंभीर विषय पर पहाड़ में अभी तक गंभीर चिंतन शुरू नहीं हुआ है।नौलों का भाग्य अब उपेक्षा और ह्रास का है, जिसका मुख्य कारण ढेर सारी नई तकनीक का आगमन और व्यापक रूप से पाइप जलापूर्ति प्रणालियाँ स्थापित होना है। पड़ोसियों ने कई नौलों को छोड़ दिया है क्योंकि वे अब पेड़-पौधे से आच्छादित हैं या उपयोग में नहीं हैं, जिससे स्थानीय समुदायों को ईंधन मिल रहा है और उन्हें अविश्वसनीय लेकिन आधुनिक स्रोत मिल रहे हैं। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और शहरी विकास के मुद्दों ने नौलों से जुड़ी समस्याओं की संख्या बढ़ा दी है, जिससे उनकी मूल सांस्कृतिक और कार्यात्मक भूमिकाएँ समाप्त हो रही हैं। दूसरी ओर, स्थानीय समुदायों, संगठनों और सरकारी एजेंसियों द्वारा इन संरचनाओं के जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए मिलकर किए गए प्रयासों से नौलों के पुनरुद्धार और संरक्षण की संभावनाएँ खुलती हैं। हंस फाउंडेशन परियोजना प्राकृतिक जल स्रोतों का उपयोग करती है और यह तथ्य कि स्यूंराकोट नौला एक संरक्षित स्मारक है, नौलों की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत को संरक्षित करने के नेक इरादों का उदाहरण है। लोगों के ये व्यवहार उत्प्रेरक के रूप में नौलों की स्थायी प्रकृति और समुदाय में सांस्कृतिक गतिविधियों का मुख्य आधार बनते हैं। भारत के उत्तराखंड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में जल संरक्षण की प्राचीन पद्धति, जिसे अब नौला के नाम से जाना जाता है, एक युगांतकारी आविष्कार था जिसका इतिहास सदियों पुराना है। नौला प्रणाली कुमाऊँ में तो बहुत प्रचलित है, लेकिन गढ़वाल में यह कम ही जानी जाती है। केवल नौला ही नहीं, बल्कि धार और नौला जैसे जनहितकारी जल निर्माण भी प्राचीन काल में पुण्य का कार्य माने जाते थे। आज भी प्रचलित नौले कत्यूरी और चंद राजवंशों के समय कुमाऊँ में ही बनाए गए थे। उदाहरण के लिए, सूर्यकोट (अल्मोड़ा) में मौजूद 1,000 साल पुराना नौला, गंगोलीहाट में हाट कालिका मंदिर के पास राजा रामचंद्र देव द्वारा स्थापित 700 साल पुराना नौला, बागेश्वर जिले में 7वीं शताब्दी में बना गढ़शेर नौला और राजा थोरचंद द्वारा 1272 में बनवाया गया बालेश्वर नौला। रानीधारा नौला (अल्मोड़ा), पट्टियानी नौला और शीलगांव (अल्मोड़ा) का तुलारामेश्वर नौला और पहाड़पानी नौला (नैनीताल) कुछ अन्य उदाहरण हैं। कुछ नौले पत्थर पर बहुत ही कुशलता और खूबसूरती से उकेरे गए थे। ऐसा ही एक उदाहरण चंपावत जिले के ढकना गांव में एक हथिया नौला है। नौलों की उपस्थिति को दर्शाने वाली देवी-देवताओं की मूर्तियां, जीवनदाता के रूप में जल के प्रति समुदाय की आस्था का संकेत हैं। उत्तराखंड क्षेत्र में जल प्रबंधन प्रणाली की एक विशेषता नौले थे, खासकर कुमाऊँ क्षेत्र में। समुदाय ने इन संरचनाओं के रखरखाव और संरक्षण की ज़िम्मेदारी ली, और इस प्रकार ये उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक भलाई का एक अभिन्न अंग बन गए।नौलों के डिज़ाइन और निर्माण में जलवायु और भूगोल की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया था और डिज़ाइनों को पर्यावरण के अनुकूल माना गया था, जिससे यह स्पष्ट होता था कि वे समुदाय के जल विज्ञान और पर्यावरणीय स्थिरता के ज्ञान का परिणाम थे। नौलों का निर्माण सटीकता के साथ किया गया था, जिससे उनमें पत्थरों के भंडार और भूलभुलैया जैसी नक्काशी या नक्काशी का समावेश था जो न केवल सुंदरता प्रदान करती थी बल्कि उस समय की संस्कृति को भी दर्शाती थी।यह तथ्य कि नौले समुदाय के लिए पेयजल और अन्य घरेलू उपयोगों का मुख्य स्रोत थे, यह एक वास्तविकता थी कि लोग सदियों तक इनका उपयोग करते रहेंगे और इनका रखरखाव भी करते रहेंगे। नौलों के निर्माण और रखरखाव की परंपरा आने वाली पीढ़ियों को विरासत में मिली, इसलिए समुदाय के सदस्य इनकी देखभाल में सक्रिय रूप से शामिल रहे। नौले की रक्षा करने वाले एक लाल साँप की पौराणिक कथा, इस मूल भाव के सांस्कृतिक पहलू को और भी गहरा करती है और इस अवधारणा को नया महत्व देती है कि इन संरचनाओं के रखरखाव की ज़िम्मेदारी समुदाय की ही होनी चाहिए। समुदाय का मूल भाव जल के प्रति उनके गहरे सम्मान को दर्शाता है, क्योंकि उनकी मान्यता है कि जल एक दिव्य जीवनदायी संसाधन है। उत्तराखंड में इन नौलों और धारों का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्व है. यहां के पहाड़ी इलाकों में कई नौले अत्यंत प्राचीन हैं. उत्तराखंड में विवाह और अन्य विशेष अवसरों पर नौलों-धारों में जल पूजन की भी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा दिखाई देती है, जो एक तरह से मानव जीवन में जल के महत्व को इंगित करती है. जरूरत है तो इन नौलों के संरक्षण की, जिससे पर्यावरण का सतत विकास तो होगा ही, साथ ही सांस्कृतिक विरासत के तौर पर हिमालय की यह पुरातन परंपरा आगे कई पीढ़ी तक पहुंच सकेगी.उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में सदियों से लोग पीने के पानी के लिए नौले का उपयोग करते आए हैं. यह पहाड़ों में भूमिगत जल स्रोतों के संरक्षण की एक बहुत पुरानी परंपरा है, नौले को विशेष आकार और तकनीक से बनाया जाता था और पहाड़ी सभ्यता के लोग इन नौले में एकत्रित शुद्ध जल को पीने के पानी के रूप में उपयोग करते हैं. इन पर पूरे गांव की आबादी आज भी निर्भर रहती है. हर गांव का अपना एक नौला होता है, जिसके संरक्षण का जिम्मा भी गांव के लोगों पर ही रहता है.पहाड़ों में कभी नौले और धारे ही पीने के पानी के मुख्य साधन हुआ करते थे. आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के लोग पीने के पानी के लिए इन नौलों पर ही निर्भर हैं. एक तरफ जहां ग्रामीण क्षेत्रों में यह नौले आज भी संरक्षित हैं, तो वहीं पिथौरागढ़ शहर में बढ़ती आबादी और शहरीकरण से नौले का पानी प्रदूषित हो गया है. उसके बाद एक बड़ा प्रश्न उठने लगा है की क्या उत्तराखंड के शहरी इलाकों से शुद्ध पेयजल के लिए बनी भूमिगत जल संरक्षण की सबसे पुरानी तकनीक गायब हो जाएगी. उत्तराखंड में इन नौलों और धारों का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्व है. यहां के पहाड़ी इलाकों में कई नौले अत्यंत प्राचीन हैं. उत्तराखंड में विवाह और अन्य विशेष अवसरों पर नौलों-धारों में जल पूजन की भी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा दिखाई देती है, जो एक तरह से मानव जीवन में जल के महत्व को इंगित करती है. जरूरत है तो इन नौलों के संरक्षण की, जिससे पर्यावरण का सतत विकास तो होगा ही, साथ ही सांस्कृतिक विरासत के तौर पर हिमालय की यह पुरातन परंपरा आगे कई पीढ़ी तक पहुंच

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