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उत्तराखंड के नौले धारे – जल संस्कृति और जल विज्ञान की लुप्त होती राष्ट्रीय धरोहर

28/07/19
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड
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डा.हरीश चंद्र अन्डोला
यह तो सर्वविदित है कि जल की मनुष्य की उत्पत्ति के समय से ही अपरिहार्य आवश्यकता रही है। क्योंकि जल का महत्व मानव जीवन के लिए वायु के समान ही है, भोजन से भी अधिक अनिवार्य आवश्यकता जल की है। मनुष्य ने अपने रहने के ठिकाने भी उन्हीं स्थानों पर बसाये जहां की आस.पास आसानी से पानी उपलब्ध हो जाए। धीरे.धीरे उन्हीं स्थानों पर रहते हुए जब परिवार बढ़ते गये और कबीले का रूप धारण कर लिया और बाद में धीरे.धीरे घर बढ़ते गये व गांवों का शिलान्यास हुआ। खेती करना भी मनुष्य ने जब प्रारम्भ कर दिया तो खेत भी पानी वाली जगह के आस.पास बनाये गये। पहाड़ों में वर्षा का जल भूमि के अन्दर भूमिगत हो जाता है तथा बाद में किसी स्थान से धीरे.धीरे इस पानी का रिसाव कम या अधिक मात्रा में तब तक होता रहा है, जब तक ये भूमिगत जल भण्डार समाप्त नहीं हो जाता।
प्राचीन काल में मानव अपनी जल की आवश्यकता को या तो नदियों से पूरा किया करते थे या फिर किसी स्त्रोत वाले धारा के रूप में बहने वाला जल अपने उपयोग में लाया करते थे। इसके अतिरिक्त वर्षा का जल भी कहीं एकत्र करके उपयोग में लाया जाता था। नौलाः यह मध्य पहाड़ी भाषा का शब्द है, जिसका सीधा सम्बन्ध नाभि से हैं अथार्त जैसे नाभि नल से नवजात बच्चे को गर्भाशय में पोषण मिलता हैं उसी तरह से नौला के पानी के जरिये माँ धरती हमको पोषित करती हैं । नौला उत्तराखंड में भूमिगत जलस्त्रोत के लिए सीढ़ीदार जल मंदिर प्रकोष्ठ के किया जाता था जिसका निर्माण एक विशिष्ट वास्तु.विधान के अन्तर्गत किया गया होता है। नौलों की आवश्यकता मनुष्य को तब महसूस हुई जब पहाड़ी और उचाई वाले क्षेत्रों में नदियां तो निचली धारा में बहती है और धारा रूप प्रवाह भी हर जगह मिलना मुश्किल होता है। किसी.किसी स्थान पर पानी बहुत कम मात्रा में निकलता है।
ऐसे में उस पानी को नौले के रूप में को इकट्ठा करने की आवश्यकता हुई। आरम्भकाल में जल एकत्रीकरण के लिए जमीन को खोदकर गड्डेनुमा आकार बनाया गयाए बाद में उसी पानी को पीनेए नहानेए कपड़े धोने व जानवरों को पिलाने के लिए उपयोग किया गया। मानव का भी निरन्तर विकास होने के कारण खुले गड्डों का पानी उतना साफ नहीं रहने लगा। पानी भरते समय जल में कम्पन के कारण मिट्टी भी पानी के साथ मिल जाती व खुले होने के कारण आस.पास का कूड़ा.करकट भी उसमें चला जाता। जंगली पशु.पक्षी भी पानी को गंदा कर सकते थे। इन्हीं गड्डों के चारों तरफ पत्थर लगाये गये और फर्श पर भी पत्थर लगाये गये दीवारें खड़ी करके छत भी पत्थरों द्वारा बना दी गयी, यहीं जल मंदिर नौला कहलाई। नौले बनाने की प्रथम शुरूआत कब और किसने की इसका निश्चित समय तो ज्ञात नहीं है। किन्तु कई हजार वर्ष पूर्व नौलों का निर्माण आरम्भ हो चुका था। स्थानीय मान्यतानुसार अधिकतर प्राचीन नौले पाण्डवों के काल में ही बने हुए देखने को मिलते हैं। पुरे कुमाऊँ क्षेत्र में बाद में कत्यूरी वंश के शासको द्वारा लगभग हर गांव व देवालय में पेयजल की सुविधा के लिए नौले का निर्माण कराया। नौलों को वहीं महत्व दिया जाता था जो देवालयों को दिया जाता था। देवालयों के वास्तु के अनुरूप ही इनका निर्माण भी विशिष्ट वास्तु विधान के अन्तर्गत किया जाता था। भारतीय संस्कृति में तथा हमारे वेद पुराणों में जल को विष्णु स्वरूप समझा जाता है। गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, कावेरी आदि नदियों की तरह ही भगवान श्री विष्णु को समर्पित नौला बहुत पवित्र स्थल समझा जाता था। अतः लोग इन जल मंदिर नौलों की पूजा किया करते थे ।
द्वाराहाट क्षेत्र में नौलों के पास बने मंदिर व उनके अन्दर पत्थरों पर विष्णु की आकृति इस बात को प्रमाणित करती है। इनकी पवित्रता को अक्षुण्य रखने के लिए जलदेवता के रूप में शेषशायी विष्णुनारायण की प्रतिमाओं को तो प्रमुखता से स्थान दिया गया है कुछ में इन्हीं खड़ी मुद्राओं में भी दिखाया गया है कुछ में इन्हें खड़ी मुद्राओं में भी दिखाया गया है। कहीं.कहीं सूर्य की रथिकाओं में स्थापित किए गये हैं। कुछ नौले तो आकर्षक सूर्य प्रतिमाओं से सुसज्जित हैं। ष्ष्स्तम्भों पर शस्त्र लिए द्वारापाल, अश्वरोही, नृत्यांगनाएं, मंगलघट, कलशधारिणी गंगा.यमुना तथा सर्प, पक्षी की आकृतियों का प्रचुरता से प्रयोग हुआ है। प्रवेश द्वारा के स्तम्भों को द्वाराशाखाओं से भी सुसज्जित करने की परम्परा भी प्रचलित थी स्यूनराकोट अल्मोड़ा के नौले में वीणावादिनी सरस्वती, दशावतार एवं महाभार के दृश्य उल्लेखनीय है। नौलों के आस.पास सिलिंग, पीपल, बड़ जैसे दीर्घजीव धार्मिक दृष्टि से पवित्र माने जाने वाले वृक्ष लगाये जाते थे। यहां के ग्राम्य जीवन के लिए नौला कितना महत्वपूर्ण माना जाता था। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि विवाह के उपरान्त जब नव वधु अपने ससुराल में आती है तो सर्वप्रथम उसे नौला पूजन के लिए भेजा जाता है।
नौलापूजन उत्तराखंड की सांस्कृतिक परम्परा का एक लौकिक अनुष्ठान है। इसमें विवाह संस्कार सम्पन्न हो जाने के बाद जब नवविवाहिता वधू अपने ससुराल पहुंचती है तो वह उस दिन या दूसरे दिन प्रातः अपने ससुराल के गांव की कन्याओं और कुछ सौभाग्यवती महिलाओं साथ अपने गांव के जलाशय.नौला व धारा के पास जाकर रोली, अक्षत, पुष्प से उसका पूजन करती है और इसके उपरान्त घर लौटते समय एक जलपात्र में वहां से पानी भरकर उसे अपने सिर पर रखकर घर लाती है और उसे सभी बड़ों को व इष्ट मित्रों को पिलाती है और उनसे चिर सौभाग्य का आर्शीवाद प्राप्त करती है। इस नौला पूजन अनुष्ठान का उत्तराखंड के सभी अंचलों में अनुपालन किया जाता है। कालान्तर में मनुष्य ने विकास की तीव्र गति के पथ पर कदम रखा छोटे गांवों की आबादी बढ़कर बड़े गांव बन गये पानी की भी आवश्यकता बढ़ती गयी।
सुविधा की दृष्टि से भी पानी नदियों में रोककर पाइप लाइन द्वारा गांव.गांव व घर.घर पहुंचा दिया गया। नौले घरों से दूर हुआ करते थे वहां से पानी का बरतन सिर पर रखकर लाना पड़ता था। जो समय के साथ लोगों को असुविधाजनक लगने लगा। और धीरे.धीरे नालों पर पानी के लिए लोगों की निर्भरता कम होने लगी। हालांकि कई गांवों में अब भी नौलों से पानी लाने का प्रचलन चालू है। कई पुराने नौलों का जीर्णोद्वार भी कराया गया। वर्ष 1990 के बाद वर्षा में भी निरन्तर कमी होती गयी व अधिकतर नौले सूखते गये। नौलों के सूखने का एक अन्य कारण भी रहा, भूकम्प के झटकों के कारण पानी रिसाव का मार्ग जो कि स्त्रोत के रूप में नौलों तक पहुंचता था वो अवरूह् हो गया या फिर उसने कोई और दिशा पकड़ ली और नौलों तक पानी नहीं पहुंचा और इससे नौलों का अस्तित्व लुप्त प्रायः होने लगा। उत्तराखंड की जल समस्या को लेकर मैंने पिछली अपनी पोस्टों में परम्परागत जलप्रबंधन और वाटर हार्वेस्टिंग से जुड़े गुल, नौलों और धारों पर जल विज्ञान की लेखमाला के रूप में चर्चा चलाई है।किन्तु जलसंकट की यह समस्या दिन प्रतिदिन भीषण रूप धारण करती जा रही है।गर्मी के महीने शुरु होते ही उत्तराखंड के गांव गांव में पेयजल की आपूर्ति एक भीषण समस्या के रूप में उभरने लगती है। इसी संदर्भ में परम्परागत नौलों और उनसे उभरती जलसंस्कृति के बारे में कुछ खास जानकारी मित्रों के साथ शेयर करना चाहता हूं।

कुमाऊं, गढ़वाल के अलावा हिमाचल प्रदेश और नेपाल में भी जल आपूर्ति के परंपरागत प्रमुख साधन नौले ही रहे हैं। ये नौले हिमालयवासियों की समृद्ध.प्रबंध परंपरा और लोकसंस्कृति के प्रतीक हैं। कौन नहीं जानता है कि अल्मोड़ा नगर, जिसे चंद राजाओं ने 1563 में राजधानी के रूप में बसाया था, वहां परंपरागत जल प्रबंधन के मुख्य स्रोत वहां के 360 नौले ही थे। इन नौलों में चम्पानौला, घासनौला, मल्ला नौला, कपीना नौला, सुनारी नौला, उमापति का नौला, बालेश्वर नौला, बाड़ी नौला, नयाल खोला नौला, खजांची नौला, हाथी नौला, डोबा नौला, दुगालखोला नौला आदि प्रमुख हैं। लेकिन अपनी स्थापना के लगभग पांच शताब्दियों के बाद अल्मोड़ा के अधिकांश नौले लुप्त हो कर इतिहास की धरोहर बन चुके हैं और इनमें से कुछ नौले भूमिगत जलस्रोत के क्षीण होने के कारण आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।जल संकट की वर्त्तमान परिस्थितियों में आज भूमिगत जलविज्ञान की इस महत्त्वपूर्ण धरोहर को न केवल सुरक्षित रखा जाना चाहिए, बल्कि इनके निर्माण तकनीक के संरक्षण व पुनरुद्धार की भी महती आवश्यकता है।

दरअसल नौले उत्तराखंड की ग्राम संस्कृति तथा लोकसंस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं। लेकिन हममें से बहुत से लोग ऐसे हैं जो नौलों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते खासकर नई पीढ़ी के युवावर्ग को इनके बारे में कम ही जानकारी है। जल वितरण की नई व्यवस्था के कारण इन नौलों का प्रचलन अब भले ही बंद हो गया है किन्तु जल संकट के समाधान की दृष्टि से इन पुराने नौलों की उपादेयता आज भी बनी हुई है। नौलों का निर्माण भूमिगत पानी के रास्ते पर गड्डा बनाकर उसके चारों ओर से सीढ़ीदार चिनाई करके किया जाता था। इन नौलों का आकार वर्गाकार होता है और इनमें छत होती है तथा कई नौलों में दरवाजे भी बने होते हैं। जिन्हें बेहद कलात्मक ढंग से बनाया जाता था। इन नौलों की बाहरी दीवारों में देवी.देवताओं के सुंदर चित्र भी बने रहते हैं। ये नौले आज भी स्थापत्य एवं वास्तुशिल्प का बेजोड़ नमूना हैं।

नौलों का भूमिगत जलस्रोत अत्यन्त संवेदनशील जल नाड़ियों से संचालित रहता है।इसलिए विकासपरक गतिविधियों तथा समय.समय पर होने वाले भूकम्पीय झटकों से इन नौलों के जलप्रवाह जब बाधित हो जाते हैं तब ये नौले भी सूखने लगते हैं। उत्तराखण्ड हिमालय में अन्धाधुन्ध विकास एवं कंकरीट की सड़कें बनने के कारण भी अधिकांश नौले जलविहीन होने से सूख गए हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार नौलों के लिए प्रसिद्ध कुमाऊ के द्वाराहाट स्थित अधिकांश नौले इसी प्राकृतिक प्रकोप के कारण सूख गए।वराहमिहिर के जल विज्ञान से प्रेरणा लेकर उत्तराखण्ड में नौले के चारों ओर विभिन्न प्रकार के वृक्षों को लगाया जाता था जिनमें आंवला, बड़, खड़िक, शिलिंग, पीपल, बरगद, तिमिल, दुधिला, पदम, आमला, शहतूत आदि के वृक्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन वृक्षों की सहायता से नौलों में भूमिगत जल नाड़ियां सक्रिय होकर द्रुतगति से जल को रिचार्ज करती रहती हैं।

उत्तराखण्ड के जल प्रबन्धन के सांस्कृतिक स्वरूप को जानने के लिए पीपल्स साइन्स इन्स्टिट्यूट, देहरादून से प्रकाशित डॉ.रवि चोपड़ा की लघु पुस्तिका जल संस्कृति ए वाटर हारवेस्टिंग कल्चर भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस लघु पुस्तिका में उत्तराखण्ड के इन ऐतिहासिक नौलों के बारे में जो महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है, उससे लगता है कि उत्तराखंड में 13.14 सौ वर्ष प्राचीन नौला आज भी सुरक्षित है और वह नौला है बागेश्वर जिले के गडसर गांव में स्थित बद्रीनाथ का नौला, जो उत्तराखंड में अब तक का सबसे प्राचीन नौला माना जाता है। कत्यूरी वंश के राजाओं ने 7वीं शताब्दी ई. में इस नौले का निर्माण किया था। जल विज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर बना होने के कारण यह नौला आज भी जल से भरपूर रहता है।

दरअसलएउत्तराखण्डवासियों के लिए नौले जल आपूर्ति के साधन मात्र ही नहीं हैं बल्कि धार्मिकएसांस्कृतिक तथा सामाजिक सन्निवेश के रूप में भी इनकी खास पहचान बनी हुई है।इन नौलों के माध्यम से उत्तराखंड में प्रचलित अत्यन्त उत्कृष्ट स्तर की स्थापत्य कला और वास्तुकला का निदर्शन हुआ है।भारतीय परम्परा के अनुसार जलाशय के निकट ही देवमन्दिर तथा देव प्रतिमाओं का भी निर्माण किया जाता है ताकि इन जल निकायों की शुद्धता और पवित्रता बनी रहे और भारतीय परम्परा में जल को जो ईश्वर तुल्य आस्थाभाव प्राप्त है उसे ही नौलों और धारों के माध्यम से मूर्त रूप दिया जा सके।

उत्तराखंड में ज्यादातर नौलों का निर्माण कत्यूर व चंद राजाओं के समय में किया गया था।जैसा कि मैंने बताया है कि नौलों के इतिहास की दृष्टि से बागेश्वर स्थित बद्रीनाथ का नौला उत्तराखण्ड का सर्वाधिक प्राचीन नौला माना जाता है जिसकी स्थापना सातवीं शताब्दी ईण्में हुई थी।

चंपावत के बालेश्वर मंदिर का नौला उत्तराखंड का सर्वोत्कृष्ट सांस्कृतिक वैभव सम्पन्न नौला है। इस नौले की स्थापना 1272 ईण् में चंदवंश के राजा थोरचंद ने की थी। इस पर उत्कीर्ण शिलालेख बताते हैं कि राजा कूर्मचंद ने1442 ईण्में इसका जीर्णोद्धार किया।चम्पावत की सांस्कृतिक पहचान बना यह नौला उत्तराखंड की वास्तुकला और स्थापत्य कला का भी एक अद्भुत नमूना प्रस्तुत करता है।बड़ी बड़ी प्रस्तर शिलाओं पर सुंदर नक्काशियां उकेरी गई हैं। यहां अनेक देवमूर्तियाँ के ध्वंशावशेष हैं जिसमें एक मूर्ति भगवान बुद्ध से बहुत मिलती जुलती है।

चम्पावत.मायावती पैदल मार्ग पर ढकन्ना गांव में स्थित एकहथिया नौला भी एक सांस्कृतिक महत्त्व का नौला है।इस नौले की दीवारों में ऊपर से नीचे तक अनेक देव आकृतियां अंकित हैं। एकहथिया नौला कुमाऊं की प्राचीन स्थापत्य कला का एक अनुपम उदाहरण है। लोगों का विश्वास है कि इस नौले का निर्माण एक हाथ वाले शिल्पी ने किया था। इसके अलावा अल्मोड़े का पंथ्यूरा नौला, रानीधारा नौला, तुलारामेश्वर नौला, द्वाराहाट का जोशी नौला, गंगोलीहाट का जाह्नवी नौला, डीडीहाट का छनपाटी नौला आदि अनेक प्राचीन नौले भी अपनी अद्भुत कलाकारी के बेजोड़ नमूना हैं।

अल्मोड़ा के निकट 14.15वीं शताब्दी के लगभग निर्मित स्यूनारकोट का नौला आज भी मौजूद है। बावड़ी के चारों ओर बरामदा हैए जिसमें प्रस्तर प्रतिमाएं लगी हुई हैं। मुख्य द्वार के सामने दो नक्काशीदार स्तम्भ बने हुए हैं।बावड़ी की छत कलात्मक रूप से विचित्र है।इसकी दीवारों में देवताओं और उनके उपासकों के चित्र अंकित हैं। यह अल्मोड़ा जनपद का सबसे प्राचीन एवं कला की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ नौला माना जाता है।

गढ़वाल में भी टिहरी नरेशों द्वारा नौलोंए धारों और कुंडों का निर्माण किया गया था। गढ़वाल के प्रसिद्ध नौलोंएधारों और कुंडों में रुद्रप्रयाग जिले में गुप्तकाशी स्थित श्गंगा.यमुना धाराश् तथा नारायणकोटि स्थित श्नवग्रह मंदिर धाराश् और श्बहकुंडश् ;ब्रह्मकुंडद्ध स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना हैं।किन्तु विडम्बना यह है कि उत्तराखंड के परंपरागत सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर स्वरूप अधिकांश ये नौले समुचित रख.रखाव न होने के कारण जलविहीन हो गए हैं और इन नौलों के माध्यम से आविर्भूत पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक वैभव भी हमारी लापरवाही के कारण नष्ट होने के कगार पर है। पुरातत्व विभाग की उदासीनता के कारण भी नौलों की पुरातन जल संस्कृति आज बदहाली की स्थिति में है।ऐतिहासिक धरोहर स्वरूप इन नौलों की रक्षा करना और इन्हें संरक्षण देना क्षेत्रीय जनता और उत्तराखंड सरकार दोनों का साझा दायित्व है।

दरअसलए नौलों और गधेरों के जलस्रोतों के साथ हमारे उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति और लोक साहित्य के गहरे सांस्कृतिक स्रोत भी जुड़े हुए हैं। वर्त्तमान हालात में नौलों और जलधारों के सूखने का मतलब है एक जीवंत पर्वतीय जल संस्कृति का लुप्त हो जाना। इसलिए जल की समस्या महज एक उपभोक्तावादी समस्या नहीं बल्कि जल, जमीन और जंगलों के संरक्षण से जुड़ी एक पर्यावरणवादी समस्या भी है। हम यदि अपनी देवभूमि को हरित क्रांति से जोड़ना चाहते हैं तो हमें अपने पुराने नौलों, धारों, खालों, तालों आदि जलसंचयन के संसाधनों को पुनर्जीवित करना होगा। पारंपरिक जल.स्रोत यथा नोले, धारे, चाल, खाल बचाने की मुहिम जलसंचेतना की दिशा में अच्छी पहल है।आज आवश्यकता है चीड़ के स्थान पर चौड़ी पत्तियों वाले बाँज, बुरांश, उतीस आदि वृक्षों को लगाए जाने की ताकि भूमिगत जल रिचार्ज हो सके।प्रदेश शासन को इस मुहिम में अपना भरपूर योगदान देना चाहिए।जल समस्या का सबसे बड़ा समाधान है जल के प्रति जनसामान्य के बीच जागरूकता पैदा करना। हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई और भी न जाने कितने ही धर्म के लोग ख़तरे की दहलीज़ पर खड़े हैं। यह ख़तरा धार्मिक नही बल्कि स्वजनित है। यह ख़तरा पानी का है। पीने के साफ़ पानी की अनुपलब्धता ने भारत के कई राज्यों में दस्तक दे दी है। पिछले साल ही गर्मियों में हिमाचल प्रदेश में पानी की भारी क़िल्लत देखी गई जिस वजह से न सिर्फ सैलानियों को दिक्कत का सामना करना पड़ा बल्कि स्थानीय लोगोंए अस्पतालों व होटलों को भी खासी मुसीबत झेलनी पड़ी। जिसके चलते लोगों ने प्रशासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया व पानी की कालाबाज़ारी होते देख जाम भी लगाया। इस वर्ष जून माह में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में जल संकट देखने को मिला जिसके चलते 100 हॉस्टल बंद करने पड़े। स्थानीय लोगों को पीने के पानी के लिए घंटों लाइन लगाकर इंतज़ार करना पड़ा।
हरियाणा के 11 गाँवों के किसान भाखड़ा नहर से साफ पानी की मांग को लेकर 20 जून से धरने पर बैठे हैं। उन्होंने अर्धनग्न होकर विरोध प्रदर्शन किया और सिर तक मुंडवा दिया, अब ये किसान ज़हरीला पानी पीने की जगह इच्छामृत्यु चाहते हैं। उन्हें लगता है कि हरियाणा सरकार पीने व सिंचाई के लिए साफ़ पानी उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है। अगर सरकार इन किसानों की मॉंगों पर ग़ौर नहीं करती तो वो आगामी विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करेंगे। किसानों ने धमकी दी है कि यदि साफ़ पानी मुहैया नहीं कराया गया तो वो पंजाब में भी शामिल हो सकते हैंण् महाराष्ट्र के लातूरए मराठवाड़ा और विदर्भ में सूखे की मार व किसानों की आत्महत्या एक आम ख़बर सी बन गई है। महाराष्ट्र सरकार के आँकड़ों के अनुसार 2015 से 2018 के बीच 12000 किसानों ने आत्महत्या की है। कहीं न कहीं सूखे की मार व क़र्ज़ के बोझ ने किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर किया हैण्
गर्मी बढ़ने के साथ ही राजस्थान हर साल पानी की समस्या से जूझने लगता है। इस साल अब तक 9 जिले सूखे की चपेट में आ चुके हैं जहॉं लोगों को बूँद.बूँद पानी के लिए मोहताज होना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश तक फैले बुंदेलखंड के 13 जिलों में पानी को लेकर हाहाकार मचना हर वर्ष की बात है। ट्रेन द्वारा पानी की सप्लाई किया जाना दर्शाता है कि बुंदेलखंड जल संकट के किस दौर से गुज़र रहा हैण् उत्तराखंड जल संस्थान की रिपोर्ट पर अगर ग़ौर किया जाए तो लगभग 500 से अधिक जलस्रोत राज्य में सूखने की कगार पर हैंण् 1544 क्षेत्र जल संकट के लिए चिन्हित किये गए हैं जिनमें सबसे ज़्यादा देहरादून, नैनीताल व टिहरी में हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 तक चेन्नई पानी की भयावह समस्या से जूझता नजर आएगा। 2020 तक देश के 11 शहर ;जिसमें बैंगलुरू, दिल्ली, हैदराबाद शामिल हैं पूरी तरह भूजल विहीन हो जाएँगे। 2030 तक 40ः भारतीयों के पास पीने के साफ पानी की उपलब्धता नहीं होगी। 2040 तक पूरे भारत में पीने के पानी की अनुपलब्धता हो जाएगी।
पानी की समस्या सिर्फ भारत तक सीमित हो ऐसा नहीं है। दुनिया के कई बड़े शहरों में पानी की समस्या ने दस्तक दे दी है। दक्षिण अफ़्रीका का शहर केपटाउन पानी की समस्या को लेकर बुरी तरह जूझ रहा हैण् हालात इतने बिगड़े हुए हैं कि जब भारतीय क्रिकेट टीम 2018 में टेस्ट मैच खेलने केपटाउन गई तो खिलाड़ियों को सख़्त हिदायत दी गई की पानी का कम से कम इस्तेमाल करें और नहाने के लिए शॉवर का इस्तेमाल 2 मिनट से ज़्यादा न करें। इसी तरह चीन का बीजिंग शहर प्रदूषित जल की मार झेल रहा है। सरकारी ऑंकड़ों के अनुसार बीजिंग में पानी इतना प्रदूषित है कि वह खेती के लिए भी इस्तेमाल करने योग्य नहीं है। नील नदी के किनारे बसे मिस्र का शहर काहिरा भी जल संकट से जूझ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मिस्र उन देशों की फ़ेहरिस्त में शामिल है जहां जल प्रदूषण से संबंधित मृत्युदर सबसे अधिक है। रूस के मॉस्को शहर का हाल यह है कि यहां पीने के पानी के स्रोत के 35 से 60 फ़ीसदी स्वच्छता मानकों पर खरे नहीं उतरते। मैक्सिको शहर में 20 फ़ीसदी जनता को दिन में सिर्फ कुछ घंटों के लिए पानी उपलब्ध कराया जाता है। ब्रिटेन का लंदन शहर आबादी के हिसाब से अपनी क्षमता पूरी कर चुका है। शहर 2025 तक गंभीर पानी की समस्या से जूझने लगेगा और 2040 तक हालात बेहद ख़राब हो जाएँगे। इसके अलावा दुनिया के बहुत से छोटे.बड़े शहर हैं जो साफ पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। पीने के साफ पानी व दैनिक इस्तेमाल होने वाले पानी के पूरी तरह समाप्त हो जाने की स्थिति को ज़ीरो डे कहा जाता है। भारत में हम ज़ीरो डे की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहे हैं। पानी की अनुपलब्धता एक गंभीर समस्या हो सकती है जिसे हम अभी स्वीकार करने में समय लगा रहे हैं। किसी भी चीज़ की असल क़ीमत उसके समाप्त होने के बाद ही पता चलती है। ऐसा पानी को लेकर न हो तो बेहतर होगा। हम अपनी दैनिक दिनचर्या में बिना सोचे समझें हज़ारों लीटर पानी यूँ ही बहा देते हैं। उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में पानी की उपलब्धता अधिक है तो बहुत से किसान साल भर में 3 से 4 फ़सल उगाने से भी नहीं हिचकिचाते। धान की फ़सल का साल में दो बार उत्पादन का मतलब हैं लाखों लीटर पानी की बर्बादी। भूजल स्तर लगातार कम होता जा रहा है और उस पर भी जल संचय के लिए बने तालाबों को लगभग हर गॉंव, शहर, क़स्बे में पाट दिया गया है। अब गाँवों में तालाब बहुत कम देखने को मिलते हैं जिनकी वजह से भूजल का स्तर कभी ऊँचा रहता था। अनुपम मिश्र ने अपनी पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब में बताया है कि देश में कहॉं.कहॉं कितने तालाब थे और उनकी वर्तमान में क्या गति हुई। उन्होंने जल संरक्षण के लिए तालाबों की महत्ता का विस्तृत वर्णन किया है। समय आ गया है कि हम जल संचय को लेकर गंभीर हो जाए। पानी के दुरुपयोग से बचें और कम से कम पानी में अधिक से अधिक काम चलाएं। दुनिया में पीने योग्य मीठा पानी सिर्फ 3 प्रतिशत है और इसी पानी पर दुनिया की पूरी आबादी निर्भर है। मंगल पर पानी की खोज जारी है। ऐसा न हो कि मंगल के पानी की आस में पृथ्वी का पानी भी समाप्त हो जाए।

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संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
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