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जोशीमठ में 80 मीटर गहराई तक भी नहीं ठोस चट्टान!

23/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

जोशीमठ पर देश के आठ प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों ने अपनी रिपोर्ट्स में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। क्या इस शहर का अस्तित्व सच में खत्म होने वाला या यहां फिर से जिंदगियां आबाद होने वाली हैं… वैज्ञानिकों ने इन सभी सवालों के जवाब दे दिए हैं। चिंताओं के बीच समाधान का रास्ता भी सुझाया है। वैज्ञानिकों का यह अध्ययन भले ही एक पर्वतीय शहर पर केंद्रित क्यों न हो, परंतु इसने हिमाचल और उत्तराखंड के पर्वतीय शहरों के अस्तित्व पर गहराते संकट से जुड़े सवालों के जवाब देने की भी कोशिश की है।उत्तराखंड का ऐतिहासिक, धार्मिक और सामरिक महत्व का शहर जोशीमठ! एक जाना-पहचाना नाम। जनवरी और फरवरी 2023 में काफी चर्चाओं में रहा। चमोली जिले के जोशीमठ में भू-धंसाव वैसे तो काफी समय से हो रहा था, लेकिन जनवरी में यह काफी बढ़ गया। भू-धंसाव के कारण सैकड़ों भवनों में भयंकर दरार आ गईं। जोशीमठ की जड़ में जेपी कॉलोनी जमीन के भीतर से पानी का पव्वारा फूट पड़ा था।उस दौरान देशभर की मीडिया का जमावड़ा यहां लगा था। भू-धंसाव से बेहाल इस शहर को लेकर कुछ दिन मीडिया में खूब तमाशा चला। कुछ मामलों में इन सब हरकतों की आलोचना भी हुई, लेकिन इस मीडिया कवरेज की वजह से तब सरकार का विशेष ध्यान जोशीमठ पर गया। हालांकि कुछ दिन बाद जोशीमठ की जनता को अपने हाल पर छोड़कर सब खामोश हो गए। तकरीबन आठ-नौ महीनों के दरमियान जोशीमठ की मुश्किलों का दौर थमा नहीं। जमीन धंसने के कारण किसी ने अपना घर गंवाया तो किसी ने होटल और दुकान। किसी को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा तो किसी को अपनों की खातिर शहर छोड़कर जाना पड़ा। दरारे वाले घरों को छोड़कर महीनों लोगों को कैंप में रहने को मजबूर होना पड़ा। इस बीच उत्तराखंड सरकार ने वैज्ञानिक संस्थानों को जोशीमठ को लेकर रिपोर्ट तैयार करने को कहा, ताकि इस शहर के विस्थापन या ट्रीटमेंट की दिशा में काम हो सके। साथ ही यह तस्वीर भी साफ हो जाए कि इस शहर के धंसने की असली वजह क्या है।इस दरमियान मानसून सीजन में हिमाचल के कई शहरों में भूस्खलन की बड़ी घटनाओं ने लोगों के होश उड़ा दिए। उत्तराखंड में ही नैनीताल, कर्णप्रयाग समेत कुछ और शहरों में भी भूस्खलन और भूधंसाव की घटनाओं ने पर्वतीय शहरों के अस्तित्व को लेकर उपजी चिंताओं के दायरे को बढ़ा दिया।और फिर से पहाड़ के आबादी वाले इलाके चर्चा में आ गए।तमाम वैज्ञानिक संस्थानों से बहुत पहले ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी, लेकिन यह सार्वजनिक नहीं हुई। इस मामले में याचिका दायर कर रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की थी। नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश पर उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से 25 सितंबर 2023 को इन रिपोर्ट्स को सार्वजनिक करते हुए वेबसाइट पर अपलोड किया गया। इन वैज्ञानिक रिपोर्ट का विश्लेषण स्थानीय समाचार पत्रों में हाल के दिनों में प्रकाशित हुआ है। इस बीच वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विज्ञानियों ने जोशीमठ में जमीन खिसकने को लेकर चौंकाने वाली जानकारी दी है। यहां की जमीन हिमालय के उत्तर से दक्षिण की तरफ सरकने की दर से दोगुनी रफ्तार से खिसक रही है। इससे आने वाले समय में इस पूरे क्षेत्र का नक्शा ही बदल सकता है। सरकार के विशेषज्ञ सर्वेक्षण दल में शामिल वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की के अनुसार, जोशीमठ क्षेत्र का सर्वे सेटेलाइट के माध्यम से कराया गया। इसमें इस विशिष्ट भूक्षेत्र के खिसकने की दर का आकलन किया गया। पता चला कि यहां का भूभाग सालाना 85 मिलीमीटर की दर से खिसक रहा है। वहीं, उत्पत्ति के समय से ही हिमालय के खिसकने की दर सालाना 40 मिलीमीटर के करीब है। इस दर में वर्तमान में कितना बदलाव आया है, इसका पता लगाने के लिए दोबारा से सर्वे कराया जाएगा। जिससे जोशीमठ क्षेत्र में भूधंसाव को लेकर पल-पल की जानकारी मिलती रहे। ऐसे में आशंका है कि निर्माण के चलते किसी जलधारा ने भूगर्भ में रूट बदल दिया हो। यह भी संभव है कि रूट बदलने के कारण भूगर्भ में पानी जमा होता रहा, जिसका जलाशय अब फटकर धारा के रूप में बाहर निकल रहा है। हालांकि, बिना जांच अभी किसी भी परिणाम तक पहुंचना जल्दबाजी होगा। विभिन्न अध्ययन यह बात भी आंशिक रूप से सामने आई है कि पूरा जोशीमठ क्षेत्र मलबे के ढेर पर बसा है। जिसके भीतर कहीं भी हार्ड राक नहीं हैं। जब ग्लेशियर पीछे खिसके तो वह मलबा छोड़ गए और समय के साथ उसकी ठोस परत पर बसावट होने लगी।  यूं तो बदरीनाथ धाम के अहम पड़ाव जोशीमठ की जमीन सालों से धंस रही है, लेकिन वर्ष 2022-23 के दरम्यान यहां धंसाव की गंभीर स्थिति सतह पर देखने को मिली। विभिन्न क्षेत्रों में यह धंसाव कुछ सेंटीमीटर से लेकर 14.5 मीटर तक भी पाया गया।अब तक यही बात कही जा रही थी कि जोशीमठ पुराने भूस्खलन के मलबे के ऊपर बसा है। जिस कारण यहां की जमीन धंस रही है। लेकिन, वाडिया हिमालु भूविज्ञान संस्थान के नए अध्ययन से इस अवधारणा को पूरी तरह बदल दिया है। जिसमें विज्ञानियों के कहा कि समूचा जोशीमठ क्षेत्र भूस्खलन के मलबे पर नहीं, बल्कि ग्लेशियरों की ओर से पीछे छूटे मलबे के ढेर पर बसा है। जोशीमठ की इस स्थिति को लेकर पूछे गए सवाल पर एनडीएमए के सदस्य ने कहा कि जांच अभी गतिमान है। इसके पूरे होने का इंतजार किया जाना चाहिए और सभी प्रक्रिया पर बारीकी से नजर रखी जानी आवश्यक है। ताकि जो भी काम हों, वह वैज्ञानिक रूप से पुख्ता हों। जोशीमठ में भूधंसाव क्यों हो रहा है, इसके ठोस कारणों का पता लगाने को लेकर एक बार फिर से विज्ञानियों को मोर्चे पर लगाया गया है, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह कि पिछले 47 सालों में जो रिपोर्ट आईं, उन कितना अमल हुआ।इस अवधि में पांच बार इस क्षेत्र का विज्ञानियों की संयुक्त टीम से सर्वे कराया गया, पर विडंबना यह कि विज्ञानियों की संस्तुतियां सरकारी फाइलों से बाहर नहीं निकल पाईं।विज्ञानियों ने जोशीमठ पर मंडराते खतरे को लेकर हर बार आगाह किया, लेकिन इसके बाद जियो टेक्निकल व जियो फिजिकल अध्ययन कराने की ओर से आंखें फेर ली गईं। इसके चलते उपचारात्मक कार्य नहीं हो पाए और आज स्थिति सबके सामने है।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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