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शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता का प्रश्न

19/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यह युवा शक्ति ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती है। देश के लाखों विद्यार्थी हर वर्ष कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं, विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों और व्यावसायिक प्रशिक्षणों से गुजरते हैं। वे अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। परिवार अपनी बचत, समय और उम्मीदें उनकी शिक्षा पर खर्च करते हैं। लेकिन जब फर्जी डिग्रियों, पेपर लीक, नकल माफिया और शैक्षणिक भ्रष्टाचार की खबरें सामने आती हैं, तब केवल कुछ संस्थानों या व्यक्तियों की साख नहीं गिरती, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर से भरोसा डगमगाने लगता है। यही कारण है कि शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता का प्रश्न आज केवल अकादमिक बहस का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुका है।हाल के वर्षों में भारत में अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और प्रशिक्षण संस्थानों पर अनियमितताओं के आरोप लगे। कहीं फर्जी अंकपत्र जारी किए गए, कहीं बिना पर्याप्त पढ़ाई और मूल्यांकन के डिग्रियां बांटने की शिकायतें मिलीं, तो कहीं भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में धांधली के आरोप लगे। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में योग्यता आधारित है या फिर उसमें ऐसे छेद पैदा हो चुके हैं, जिनका लाभ उठाकर कुछ लोग अनुचित तरीके से आगे बढ़ रहे हैं। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र देना नहीं होता। शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान, कौशल, विवेक और जिम्मेदारी प्रदान करती है। एक डॉक्टर की डिग्री केवल एक कागज नहीं होती, बल्कि यह प्रमाण होती है कि उसने मानव जीवन की रक्षा करने योग्य ज्ञान और प्रशिक्षण प्राप्त किया है। एक इंजीनियर की डिग्री यह भरोसा देती है कि वह सुरक्षित भवन, पुल और तकनीकी संरचनाएं तैयार करने की क्षमता रखता है। एक शिक्षक की डिग्री इस बात की गारंटी मानी जाती है कि वह नई पीढ़ी को सही दिशा देने में सक्षम है। यदि इन डिग्रियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगें, तो समाज का पूरा विश्वास तंत्र कमजोर पड़ने लगता है।सबसे बड़ी समस्या यह है कि फर्जी डिग्रियों का नुकसान केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहता, जो इन्हें हासिल करते हैं। इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। यदि कोई अयोग्य व्यक्ति डॉक्टर बन जाए, तो मरीजों का जीवन खतरे में पड़ सकता है। यदि किसी तकनीकी पद पर अयोग्य इंजीनियर पहुंच जाए, तो सार्वजनिक परियोजनाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। यदि शिक्षा संस्थानों में अयोग्य शिक्षक नियुक्त हो जाएं, तो आने वाली पीढ़ियों की बौद्धिक क्षमता पर असर पड़ सकता है। इसलिए यह केवल धोखाधड़ी का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा और सामाजिक विश्वास का भी प्रश्न है। भारत में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। यह आवश्यक भी था क्योंकि करोड़ों युवाओं को शिक्षा उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन कई बार विस्तार की गति गुणवत्ता नियंत्रण से अधिक तेज रही। परिणामस्वरूप कुछ संस्थान केवल डिग्री वितरण केंद्र बनकर रह गए। शिक्षण, शोध, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और प्रशिक्षित शिक्षकों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। जब शिक्षा को सेवा के बजाय व्यवसाय के रूप में देखा जाने लगता है, तब ऐसे संकट पैदा होना स्वाभाविक है।पेपर लीक की घटनाओं ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की खबरें आती रही हैं। लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं, लेकिन कुछ लोग पैसे और प्रभाव के बल पर प्रश्नपत्र हासिल कर लेते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन प्रतिभाशाली युवाओं को होता है, जो ईमानदारी से मेहनत कर रहे होते हैं। उनकी मेहनत का मूल्य कम हो जाता है और उनके मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है। युवा पीढ़ी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी योग्यता साबित करे, लेकिन यदि व्यवस्था निष्पक्ष न हो, तो प्रतिभा हतोत्साहित होती है। जब किसी मेहनती छात्र को यह महसूस होने लगे कि सफलता योग्यता से नहीं, बल्कि संपर्क, भ्रष्टाचार या जालसाजी से मिल सकती है, तब उसकी प्रेरणा कमजोर पड़ती है। यही स्थिति धीरे-धीरे सामाजिक असंतोष को जन्म देती है। कई प्रतिभाशाली युवा देश छोड़ने का निर्णय लेते हैं या फिर व्यवस्था से निराश होकर अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं।भारत की वैश्विक पहचान लंबे समय से उसके ज्ञान और प्रतिभा पर आधारित रही है। भारतीय मूल के हजारों वैज्ञानिक, इंजीनियर, चिकित्सक और तकनीकी विशेषज्ञ विश्व की अग्रणी संस्थाओं में कार्यरत हैं। वे केवल अपने व्यक्तिगत करियर का निर्माण नहीं कर रहे, बल्कि भारत की प्रतिष्ठा भी बढ़ा रहे हैं। विदेशों में कार्यरत भारतीय हर वर्ष बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। यदि भारतीय डिग्रियों और प्रमाणपत्रों की विश्वसनीयता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेह बढ़ता है, तो इसका प्रभाव रोजगार, वीजा और वैश्विक अवसरों पर पड़ सकता है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कुछ संस्थानों या व्यक्तियों की गलतियों के आधार पर पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को खारिज नहीं किया जा सकता। भारत में अनेक उत्कृष्ट विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और पेशेवर शिक्षण केंद्र हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतरते हैं। लाखों छात्र पूरी ईमानदारी और कठिन परिश्रम से अपनी योग्यता अर्जित करते हैं। समस्या यह है कि कुछ नकारात्मक उदाहरण पूरी व्यवस्था की छवि को नुकसान पहुंचा देते हैं। इसलिए दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करना उतना ही आवश्यक है, जितना कि ईमानदार और गुणवत्तापूर्ण संस्थानों को प्रोत्साहित करना।शिक्षा में सुधार के लिए सबसे पहले पारदर्शिता को मजबूत करना होगा। सभी डिग्रियों और प्रमाणपत्रों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए, जिसे किसी भी नियोक्ता या संस्था द्वारा सत्यापित किया जा सके। डिजिटल सत्यापन प्रणाली फर्जी दस्तावेजों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे छात्रों, संस्थानों और नियोक्ताओं के बीच विश्वास भी बढ़ेगा। दूसरा महत्वपूर्ण कदम विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की नियमित शैक्षणिक समीक्षा है। केवल भवन और बुनियादी सुविधाओं के आधार पर मान्यता देने के बजाय वास्तविक शिक्षण गुणवत्ता, शोध कार्य, परीक्षा प्रणाली और विद्यार्थियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन होना चाहिए। जो संस्थान मानकों का पालन नहीं करते, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।तीसरा, परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित और तकनीक आधारित बनाना होगा। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, साइबर सुरक्षा और दोषियों के खिलाफ त्वरित दंड व्यवस्था आवश्यक है। पेपर लीक जैसी घटनाओं को सामान्य अपराध नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ के रूप में देखा जाना चाहिए। चौथा, रोजगार और भर्ती प्रक्रियाओं में कौशल आधारित मूल्यांकन को बढ़ावा देना होगा। केवल डिग्री पर निर्भरता कम करके वास्तविक क्षमता और व्यावहारिक ज्ञान को महत्व दिया जाए। इससे प्रमाणपत्रों की अंधी दौड़ कम होगी और सीखने की संस्कृति मजबूत होगी। इसके साथ ही समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अभिभावकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं है। यदि डिग्री केवल रोजगार का टिकट बनकर रह जाए और ज्ञान का महत्व कम हो जाए, तो शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य नष्ट हो जाता है। इसलिए सीखने, शोध करने और कौशल विकसित करने की संस्कृति को बढ़ावा देना आवश्यक है।राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे को दलगत दृष्टिकोण से ऊपर उठकर देखने की आवश्यकता है। फर्जी डिग्री, नकल, पेपर लीक और शैक्षणिक भ्रष्टाचार किसी एक राज्य, एक सरकार या एक विचारधारा तक सीमित नहीं हैं। यह समस्या वर्षों से विभिन्न रूपों में मौजूद रही है। इसलिए इसका समाधान भी सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक जागरूकता से ही संभव है। आज जब युवा शिक्षा व्यवस्था में सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करते हैं, तो उनकी आवाज को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। यह मांग किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न है। यदि शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर होगा, तो उसका प्रभाव केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा। यह अर्थव्यवस्था, रोजगार, सामाजिक विश्वास और राष्ट्रीय विकास को भी प्रभावित करेगा।भारत को यदि विश्व की अग्रणी ज्ञान अर्थव्यवस्था बनना है, तो उसे अपनी शिक्षा व्यवस्था को निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना होगा। डिग्री का अर्थ केवल कागज का एक टुकड़ा नहीं होना चाहिए, बल्कि योग्यता, परिश्रम और नैतिकता का प्रमाण होना चाहिए। जब तक शिक्षा व्यवस्था में ईमानदारी और गुणवत्ता सर्वोच्च मूल्य नहीं बनेंगे, तब तक प्रतिभा और अवसर के बीच की खाई पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। देश का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में है और युवाओं का भविष्य शिक्षा पर निर्भर करता है। इसलिए फर्जी डिग्रियों और शैक्षणिक भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष केवल व्यवस्था सुधार का अभियान नहीं, बल्कि भारत के भविष्य को सुरक्षित करने का संकल्प है। यही वह रास्ता है, जो शिक्षा में भरोसा लौटाएगा, प्रतिभा को सम्मान देगा और भारत को विश्व मंच पर और अधिक मजबूत बनाएगा।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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