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लम्बकेश्वर महादेव में भक्तों को मिलती है आध्यात्मिक एवं दिव्य ऊर्जा

28/02/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
गंगोलीहाट के आसपास शिवालयों एवं दैवीय शक्तिपीठों की भरमार है जिनमें चामुण्डा मंदिर, लमकेश्वर, महादेव मंदिर, रामेश्वर मंदिर, विष्णु मंदिर, गोदीगाड मंदिर के अलावा पाताल भुवनेश्वर, भोलेश्वर, शैलेश्वर, मर्णकेश्वर, लमकेश्वर, हटकेश्वर, चमडुगरा आदि प्रसिद्व शिवालय हैं।
बताते हैं कि गंगोलीहाट का काली मंदिर संस्कृति के महाकवि कालीदास की भी तपस्थली रही है। कालिदास के वंशज कौशल्य गोत्र के ब्राह्मण कैलाश यात्रा पथ में रहते हैं। इनके घरों में कालिदास के मेघदूत व रघुवंश की पाण्डुलिपियां मिलती हैं। भवप्रीता कल्याण रूपा सत्यानंद स्वरूपिणी माता भगवती महाकालिका का यह दरबार अनगिनत, असंख्य अलौकिक दिव्य चमत्कारों से भरा पडा है।  हिमालय को महादेव का वासस्थल माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मस्त-मलंग शिव-शंकर, भोलेनाथ को हिमालय में रमना प्रिय है. लिहाजा उत्तराखण्ड की देव भूमि में सर्वाधिक लोकप्रिय भगवान शिव ही हैं. उत्तराखण्ड में शिव के कई रूपों की पूजा की जाती है.इन्हीं में एक हैं लम्बकेश्वर देवता जिन्हें स्थानीय ग्रामीण लमकेश्वर देवता भी कहते हैं. शिव के लम्बकेश्वर रूप का जिक्र पुराणों में भी मिलता है. पिथौरागढ़ जिले के बेड़ीनाग और गंगोलीहाट के बीच एक गाँव है झलतोला. झलतोला पहुँचकर 4-5 किमी की चढ़ाई चढ़ने के बाद शिव के लम्बकेश्वर रूप का एक मंदिर आता है. मंदिर में शिव का ज्योतीर्लिंग स्थापित है. बेरीनाग, चौकोड़ी और इसके आस-पास का समूचा क्षेत्र हिमालय के नयनाभिराम दृश्यों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. यहाँ से हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं जितनी विस्तृत, नजदीक और स्पष्ट दिखाई देती हैं वैसी हिमालय से इतनी ही दूरी और इतनी कम ऊंचाई वाली जगह पर कहीं और से नहीं दिखाई देती हैं. लम्बकेश्वर से हिमालय का और भी ज्यादा विस्तृत और विराट रूप दिखाई पड़ता है. यह कहना ग़लत नहीं होगा कि हिमालय का ऐसा नयनाभिराम दृश्य पूरे उत्तराखण्ड में किसी अन्य जगह से नहीं दिखाई देता.झलतोला और इसके आस-पास के गाँवों में कुथलिया बोरा जाति के लोगों की बहुतायत है. कुथलिया बोरा समुदाय को भांग के पौंधे के रेशों से कुथले तथा घराटों के पाट बनाने के लिए भी जाना जाता है. लम्बकेश्वर की पहाड़ी पर इन्हीं कुथलिया बोरों द्वारा लम्बकेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की गयी है. मंदिर के बारे में जीआईसी, चौड़मन्या के अध्यापक और मंदिर की देखभाल करने वाले बताते हैं कि यह मंदिर कितना पुराना है इस सम्बन्ध में कुछ ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता मगर हमारे बाप-दादाओं ने हमेशा से इस मंदिर को देखा है. वे बताते हैं कि मंदिर का वर्तमान में जो आकार है वह मात्र 60-70 साल ही पुराना है मगर यह मंदिर बहुत पुराना है. यह मंदिर सदियों से स्थानीय ग्रामीणों की आस्था का केंद्र भी है. कई सालों से यहाँ पर्व-त्यौहारों के मौके पर गंगोलीहाट के पास के गाँव मातोली के जोशी और जाड़ापानी गाँव के कोठ्यारियों द्वारा पूजा-अर्चना करने की परम्परा रही है. इस मंदिर में कभी कोई स्थायी पुजारी नहीं रहा. स्थानीय ग्रामीण ही मिल-जुलकर इस मंदिर की देखभाल किया करते थे. 1960 में राजस्थान से एक महात्मा निर्मल दास बाबा यहाँ आये. उन्होंने 40 सालों तक घने जंगल से घिरे इस निर्जन में अकेले ही तपस्या की. बताया जाता है कि उस समय स्थानीय ग्रामीण भी यहाँ यदा-कदा ही आया करते थे. पीने के पानी और भोजन का कोई भी साधन तब यहाँ पर नहीं था. निर्मल बाबा ने तब ग्रामीणों को बताया कि जंगली जानवर ही उनके संगी-साथी हैं और उनके लिए कंद-मूल इत्यादि के रूप में भोजन की व्यवस्था भी यही जंगली जानवर करते हैं. निर्मल बाबा की प्राकृतिक मृत्यु पर उनके शरीर को भी उन्हीं की इच्छा के अनुरूप इन जंगली जानवरों के लिए छोड़ दिया गया था. देश की आजादी में झलतोला क्षेंत्र का विशेष योगदान रहा है।यहाँ का राम मंदिर काफी लोकप्रिय है, झलतोला से लंमकेश्वर महादेव का पैदल सफर शुरु होता है। यह सफर बेहद निराली अनुभूति प्रदान करता है, तीज त्यौहारों के अवसरों पर इस मार्ग में काफी चहल-पहल रहती है। क्षेत्र से बाहर रहने वाले लोग जब अपने इष्ट देवताओं की पूजा अर्चना के लिए अपने घर आते हैं तो बाबा लंमकेश्वर महादेव के दरबार में जाना कभी नहीं भूलते भगवान शिव के प्रति शिव भक्तों की यह मधुर निष्ठा लंमकेश्वर महादेव की विराट आभा को दर्शाती है। भगवान शिव के इस दरबार के प्रति अनेक रहस्यमयी कथाएं जनमानस में काफी लोकप्रिय है। कल्याण के देवता लंमकेश्वर महादेव जी की महिमा का वर्णन स्कंद पुराण के मानस खंड में भी मिलता है। यहाँ के पर्वत की चोटी से हाट कालिका का दरबार, नाग पर्वतों की श्रृंखलाएं, पाताल भुवनेश्वर की पहाड़ियां, बरबस ही आगंतुकों का मन मोह लेती है। बृद्ध भुवनेश्वर, धुर्का देवी, बिनसर महादेव,आदि मदिरों की भांति ही लमकेश्वर महादेव को प्रकाश में लानें का श्रेय गौ माता को जाता है, गौ कृपा से ही यह क्षेत्र प्रकाश में आया कहा जाता है, कि लमकेश्वर महादेव जी के पिण्डी के आखिरी छोर का कोई अता-पता नही है, कि यह जमीन में कहां तक है।
कल्याण उत्पादक लंमकेश्वर महादेव जी के इस पावन क्षेत्र में अनेक साधकों ने अपनी साधना को फलीभूत किया प्राचीन काल में ऋषि मुनियों की तपस्या आराधना का केन्द्र भगवान शिव का यह दरबार परम पूजनीय है। क्षेत्रीय लोग अनाज की अपनी पहली फसल लंकेश्वर महादेव जी के चरणों में अर्पित करके क्षेत्र की सुख-समृद्धि व मंगल की कामना करते हैं यह परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है समय-समय पर यहां लगने वाले मेले बेहद आकर्षण का केन्द्र रहते है।
नमस्तेऽस्तु लमकेश्वर नमस्ते परमेश्वर। नमः शिवाय देवाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे॥ नमोऽस्तु ते महेशाय नमः शान्ताय हेतवे। प्रधानपुरुषेशाय योगाधिपतये नमः माघ मास के मंगल और शिव के सावन में भी यहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. महाशिवरात्रि के पर्व पर यहाँ विराट मेला आयोजित किया जाता है. इस मेले में दूर-दूर से 20 से 30 हजार तक श्रद्धालु इकठ्ठा होते हैं. फ्रांस, जापान और अमेरिका आदि देशों से भी लोग यहाँ पर आते हैं और योग ध्यान करते हैं. इस जगह के धार्मिक पर्यटन स्थल और योग ध्यान केंद्र के रूप में विकसित होने की बहुत अधिक संभावनाएं हैं. सरकारी संरक्षण के अभाव में यह जगह अपना वह मुकाम नहीं बना पायी है जिसकी कि यह हकदार है. इस दिशा में पहलकदमी लेते हुए स्थानीय ग्रामीणों द्वारा 2002 में मंदिर समिति की स्थापना कर सरकारी अमले का ध्यान इस तरफ खींचने की कोशिश भी की गयी मगर कोई सफलता नहीं मिली.लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरतहैं।

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