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दून घाटी में विराजमान लक्ष्मण सिद्ध

28/01/21
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देवभूमि उत्तराखंड जिसकी दिव्यता का वर्णन वेदों और पुराणों में भी मिलता हैए वेद.पुराणों में उत्तराखंड को ऋषि.मुनियों एवं देवी.देवताओं की तपस्थली कहा गया है। राज्य के कोने.कोने में स्थित अनगिनत मंदिर उत्तराखंड के आज भी देवभूमि होने की सार्थकता को सिद्ध करते हैं। यहां के बहुत से मंदिर तो अपने रोचक रहस्यों, अद्भुत परम्पराओं एवं चमत्कारों के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। देहरादून में लक्ष्मण सिद्ध, कालू सिद्ध, मानक सिद्ध व माढ़ू सिद्ध मंदिर ये चार सिद्ध हैं, जहां कई हजारों साल पहले संतों ने कठोर तप किया था। इन चारों सिद्घ की विशेषता है कि यहां केवल गुड़ का ही प्रसाद चढ़ाया जाता है। यह चारों सिद्ध भीड़.भाड़ से दूर एकांत में स्थित है। पूरे देश में दशहरे का पर्व धूमधाम से मनाया गया। देशभर में जगह.जगह रावण को जलाया गया।

भगवान राम ने जहां रावण का वहीं उनके भाई लक्ष्मण ने मेघनाद का वध किया था। इसके बाद ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए दून में संत के रूप में लक्ष्मण ने तपस्या की थी। देहरादून स्थित आज वह तपस्या स्थल 84 सिद्धों में से एक के रूप में प्रख्यात है। देहरादून के लक्ष्मण सिद्ध मंदिर में संत लक्ष्मण के समाधि स्थल पर मत्था टेकने लोग दूर .दूर से आते हैं। देहरादून का लक्ष्मण सिद्ध मंदिर ऋषि पीठ ऋषि दत्तात्रेय के चौरासी सिद्धों में से एक है। मान्यता है कि राजा दशरथ के बेटे लक्ष्मण ने जब मेघनाद का वध करने के बाद ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति चाही तो इसी स्थान को उन्होंने तपस्या के लिए चुना था। उन्होंने यहीं पर समाधि ली। तब से इस मंदिर का नाम लक्ष्मण सिद्धपीठ मंदिर पड़ गया। बता दें कि तपस्या स्थल पर प्राचीन काल से निरंतर अखंड धुना जल रहा है।

बताया जाता है कि इस अखंड धुने में कभी मुंह से फूंक नहीं मारी जाती है। यहां पर बनाये गये भोजन का ही भोग मंदिर में लगाया जाता है। धुने की राख को प्रसाद के तौर पर श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है। मंदिर की ख़ासियत है कि यहां गुड़ का प्रसाद ही चढ़ाया जाता है। लोगों का मानना है कि जो भी यहां सच्चे मन से कामना करता है, उसे आत्मीय शांति मिलती है। साथ ही उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। इस स्थल में लोगों की गहरी आस्था है। यहां आकर प्राकृतिक खूबसूरती का दीदार तो होता ही है, साथ ही लोगों को आत्मीय शांति भी मिलती है। देवभूमि में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं जहां आकर लोगों के मन के शांति मिलती है।

विश्व के 84 सिद्ध पीठों में से चार सिद्ध पीठ उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी मौजूद है। जिसमें लक्ष्मण सिद्ध, कालू सिद्ध, मानक सिद्ध और मांडू सिद्ध मंदिर शामिल है। वहीं लक्ष्मण सिद्ध मंदिर का अपना अलग ही इतिहास है और ऐसी मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें जरूर पूरी होती है। देहरादून से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लक्ष्मण सिद्ध मंदिर हरे भरे जंगलों के बीच बसा है। प्रदेश के आसपास के इलाकों व दूसरे राज्यों के लोग यहां आशीर्वाद लेने आते हैं। देहरादून की खासियत यह है कि इस नगर के चारों कोनों में साल के जंगलों के बीच चार सिद्ध विराजमान हैं। पूर्वोत्तर दिशा में कालू सिद्ध, दक्षिण पूर्व में लक्ष्मण सिद्ध, पश्चिमोत्तर दिशा में माड़ू सिद्ध और पश्चिम दक्षिण की ओर मानक सिद्ध हैं। यह चारों सिद्ध यहां के लोक में आज भी आस्था के केन्द्र बने हुये हैं। देहरादून के ग्रामीण किसान अपनी खेती से प्राप्त उपज का एक हिस्सा सामुहिक रूप से एकत्र कर हर साल यहां भण्डारा करते हैं। दुधारू पशुओं के ब्याहने के बाद अपने प्रयोग से पहले दूध को यहां भेंट करते हैं और खेती व जानवरों की सलामती की मंगत मांगते हैं। स्थानीय देवी देवताओं से आस्थावान लोग वैसे भी परलोक की जगह इसी लोक की बात करते नजर आते हैं।

गढ़वाल से नाथ और सिद्धों का गहरा रिश्ता रहा है। राजाओं द्वार दून उपत्यका के कुछ गांवों का राजस्व धर्मस्व में दिया हुआ था जो गोरखा शासन काल में भी ज्यों का त्यों चलता रहा। इसमें डोभाल वाला गांव का राजस्व बद्रीनाथ मंदिर को, प्रेमपुर जाखन का राजस्व केदारनाथ मंदिर को ऋषिकेश, तपोवन का भरत मंदिर तथा जोगीवाला व गोरखपुर गांव का राजस्व गोरखनाथ मंदिर को जाया करता था। श्रीमद् भगवत् पुराण के तेरहवें व चौदहवें अध्याय में त्रेता युग के सिद्ध पीठों का वर्णन है जिनमें से एक लक्ष्मण सिद्ध पीठ भी है। लक्ष्मण सिद्ध परिसर में तीन मुखी और पंचमुखी दो रुद्राक्ष के वृक्ष हैं, जो श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। सिद्धपीठ से चार सौ मीटर की दूरी पर एक चमत्कारी कुआं भी तीन से चार फुट की गहराई पर ही पानी मौजूद है। कहा जाता है कि पहले इस पानी का रंग दूध के समान था, लेकिन समय के साथ.साथ अब इसका रंग बदल गया है। इस कुएं पानी स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त ही लाभकारी है जिसकी वजह इस स्थान पर प्राकृतिक जड़ी बूटियों का होना बताया जाता है।गुड़ की भेली के प्रसाद के बारे में कहा जाता है कि पुराने जमाने में मीठे के रूप में गुड़ ही हुआ करता था इसलिए कालांतर में गुड़ ही यहाँ के प्रसाद के रूप में वर्तमान में भी गुड़ ही प्रचलित है।

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