
हरेंद्र बिष्ट
थराली/देवाल।
श्री नंदादेवी बड़ी जात यात्रा में सम्मिलित हों रहें यात्रीगण दुनिया के रहस्यमई स्थानों में सुमार रूपकुंड की सुंदरता एवं यहां पर मौजूद नरकंकालों को देख अचंभित हुए बगैर नही रह पाएं। कई वर्षों बाद जिस तरह से वेदनी बुग्याल, रूपकुंड,शीला समुद्र होमकुंड़ आदि उच्च हिमालई क्षेत्रों में मौसम साफ हैं और कई किलोमीटर दूर तक हवाई रेंज से दिखने वाले दृश्यों को देख कर यात्रियों में खुशी का ठिकाना नही हैं।
आम तौर पर नंदा देवी राजजात,छोटी जात अथवा लोकजात यात्रा अगस्त के दूसरे पखवाड़े से शुरू होते हुए सितंबर के पहले अथवा दूसरे सप्ताह में समाप्त हो जाती हैं। इस दौरान मौसम बेहद खराब होने के कारण यात्राओं में सामिल होने वाले यात्रियों को अपेक्षाकृत प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत होने का अधिकार मौका नही मिल पाता हैं। जिससे देवी नंदा के भक्त उनकी पूजा अर्चना कर प्रकृति के द्वारा इस क्षेत्र में बिखेरें प्राकृतिक सौंदर्य अभिभूत किए बगैर ही मन मार कर वापस लौट पड़ते हैं। किंतु कई वर्षों के बाद इस बार सिद्धपीठ कुरूड़ से 5 सितंबर को शुरू हुई श्री नंदादेवी बड़ी जात यात्रा सितंबर माह के दूसरे पखवाड़े में उच्च हिमालई क्षेत्रों में चलते हुए होमकुंड के पास पहुंचने वाली हैं। 17 सितंबर को बड़ी जात यात्रा समुद्र सतह से करीब 11200 फीट की ऊंचाई पर स्थित एशिया के सबसे बड़े एवं सुंदरतम बुग्यालों में सुमार वेदनी बुग्याल पहुंची, तो साफ मौसम में चहुं ओर दिखने वाले दृश्यों को देख यात्रियों को लगने लगा कि वें किसी और ही दुनिया में आ गए,यात्री भुपेंद्र बिष्ट भुप्पी, डॉ. कृपाल भंडारी आदि ने बताया कि 17 सितंबर की रात जिस तरह से साफ मौसम में आसमान में चांद एवं तारें चमक रहें थे वह अपने आप में अद्भुत नजारा था। इसके बाद 18 सितंबर को प्रातः काल से ही मौसम बेहद खुशगवार बना हुआ था। यहां से दूर तक फैले प्राकृतिक सौंदर्य के अनमोल खजाने को देख यात्रियों में उत्साह हिलोरें मारने लगी। इस का भरपूर लाभ उठाते हुए देर तक यात्री अपने नजरों एवं कैमरों में अद्भुत एवं अनमोल प्राकृतिक सौंदर्य को कैद करने में जुटे रहें।इसी दौरान बधाण की नंदादेवी की डोली भी लोकजात यात्रा करने के लिए वेदनी पहुंची तो उसमें सामिल यात्री भी प्राकृतिक सौंदर्य को देख कर प्रफुल्लित हो उठें। हालांकि बधाण की डोली तों वेदनी में जात कर वापस लौट गई परंतु बड़ी जात यात्रा करीब 12.500 की फीट की ऊंचाई पर स्थित पातरनचौनिया, 14.500 की हाईट पर स्थित केलवाविनायक,इसी ऊंचाई के आसपास स्थित बगुवावासा पहुंच गए यहां से भी दिखने प्राकृतिक सौंदर्य को देख यात्रियों का खुशी का कोई ठिकाना नही रहा। इसके बाद शनिवार को बड़ी जात यात्रा 15 वें पड़ाव पातरनचौनिया जो कि दूसरा निर्जन पड़ाव था को छोड़ कर 16 वें एवं तीसरे निर्जन पड़ाव शीला समुद्र के लिए रवाना हुई,जब यात्रा एवं यात्री करीब साढ़े 16 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित दुनिया के रहस्यमई स्थानों में से एक रूपकुंड पहुंचे तो रूपकुंड की सुंदरता को देख वें इस स्थान की तारीफ करते नही थके। सबसे बड़ी बात रूपकुंड के चहुं ओर बिखरे पड़े नरकंकालों को देख यात्री अचंभित हुएं बगैर भी नही रह सकें, यात्रियों ने यहां पर भी जमकर फोटोग्राफी करते हुए अपने को धन्य माना कि उन्हें मां नंदा की कृपा से बेहद खूबसूरत मौसम में उच्च हिमालई क्षेत्र एवं इसकी खूबसूरती को इतने करीब से देखने का मौका मिला।











