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युद्ध के साए में महावीर स्वामी शांति की किरण

महावीर जयंती पर विशेष

29/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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प्रो. रवि जैन
जो शस्त्र उठाए उसे वीर कहते हैं, और जो शस्त्र त्याग दे उसे महावीर कहते हैं। मानव इतिहास में कुछ महान व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं जिनके विचार समय और परिस्थितियों की सीमाओं से परे जाकर सम्पूर्ण मानवता को दिशा देते हैं। जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ऐसे ही महान व्यक्तित्वों में से एक हैं। उन्होंने सत्य, अहिंसा, करुणा और आत्मसंयम के माध्यम से एक ऐसे नैतिक जीवन का मार्ग दिखाया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना लगभग ढाई हजार वर्ष पहले था। महावीर जन्मकल्याणक केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह उन मूल्यों को स्मरण करने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का अवसर भी है, जो मानव समाज को शांति और संतुलन की दिशा में ले जा सकते हैं। भगवान महावीर का जन्म लगभग 599 ईसा पूर्व में वर्तमान बिहार के वैशाली के निकट कुंडलपुर में हुआ था। उनके पिता राजा सिद्धार्थ और माता रानी त्रिशला थीं। भगवान महावीर के पांच प्रमुख नाम हैं, भगवान महावीर यह उनका सबसे प्रसिद्ध नाम है । जन्म के समय उनका नाम वर्धमान रखा गया। ऐसा कहा जाता है कि उनके जन्म के साथ ही राज्य की समृद्धि और विकास में वृद्धि हुई, इसलिए उनका नाम वर्धमान पड़ा, जिसका अर्थ है निरंतर बढ़ने वाला या प्रगति करने वाला।

बाल्यकाल से ही भगवान महावीर में असाधारण साहस, धैर्य और आत्मबल दिखाई देता था। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने निर्भीकता और संयम का परिचय दिया। इसी कारण लोग उन्हें वीर कहने लगे। आगे चलकर उनकी अद्वितीय आध्यात्मिक साधना और असाधारण साहस के कारण उन्हें महावीर की उपाधि मिली, जिसका अर्थ है महान वीर। उनके धैर्य, सहनशीलता और कठोर तपस्या के कारण उन्हें अतिवीर और उनके उपदेशों से समाज में उत्पन्न सद्बुद्धि के कारण सन्मतिवीर भी कहा जाता है। भगवान महावीर के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनका त्याग और तप है। उन्होंने लगभग बारह वर्षों तक कठोर तपस्या और साधना की। इस अवधि में उन्हें अनेक शारीरिक और मानसिक कष्टों का सामना करना पड़ा, किंतु उन्होंने धैर्य, संयम और अहिंसा का मार्ग कभी नहीं छोड़ा। अंततः उन्होंने अपने मन, इंद्रियों और सांसारिक मोह पर पूर्ण विजय प्राप्त की और मानवता को आत्मज्ञान तथा नैतिक जीवन का मार्ग दिखाया।

महावीर स्वामी ने जीवन को सही दिशा देने के लिए सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को आधार बताया। इसके साथ ही उन्होंने पांच महान व्रत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का उपदेश दिया। ये सिद्धांत केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नैतिक और संतुलित जीवन की सार्वभौमिक नींव हैं।
आज के समय में जब विश्व के कई हिस्सों में युद्ध, तनाव और संघर्ष की स्थितियाँ दिखाई देती हैं, तब भगवान महावीर के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उनके आदर्श केवल आध्यात्मिक या धार्मिक शिक्षाएं नहीं हैं, बल्कि वैश्विक शांति मानवीय सह-अस्तित्व के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन भी प्रदान करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्तिशाली देशों जैसे ईरान, रूस, इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच मतभेद, सैन्य प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय संघर्ष देखने को मिल रहा है और हम सब विश्व युद्ध की कगार पर बैठे हैं। हमारा भविष्य विश्व के लालची और स्वार्थी नेताओं के हाथ में है। इन परिस्थितियों में मानवता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि शांति और प्रेम की स्थापना कैसे की जाए। ऐसे अनिश्चितता के वातावरण में भगवान महावीर के सिद्धांत अहिंसा, अनेकांतवाद अपरिग्रह और जियो और जीने दो का संदेश मानवता को शांति और संतुलन की दिशा दिखाते हैं।

अहिंसा: भगवान महावीर का सबसे महत्वपूर्ण संदेश अहिंसा है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाना मानवता के विरुद्ध है। यदि राष्ट्र हिंसा और युद्ध के स्थान पर संवाद, कूटनीति और पारस्परिक समझ को प्राथमिकता दें, तो अनेक संघर्षों से बचा जा सकता है।

अनेकांतवाद: भगवान महावीर अनेकांतवाद का सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि सत्य को केवल एक दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता। हर विषय के अनेक पक्ष होते हैं। यदि राष्ट्र और समाज एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करें, तो टकराव कम हो सकते हैं और सहयोग की भावना विकसित हो सकती है।

अपरिग्रह:महावीर स्वामी का अपरिग्रह का सिद्धांत भी आधुनिक विश्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज कई संघर्ष संसाधनों, शक्ति और प्रभुत्व की इच्छा के कारण उत्पन्न होते हैं। अपरिग्रह का संदेश यह सिखाता है कि अत्यधिक लालच और अधिकार की भावना से दूर रहना चाहिए। यह सिद्धांत संतुलित और जिम्मेदार नीतियों की प्रेरणा देता है।

अचौर्य: दूसरे की वस्तु, धन, समय या अधिकार को बिना अनुमति नहीं लेना । यह सिद्धांत भगवान महावीर के पांच महाव्रतों में से एक है, जो विश्व की मानव जाति को ईमानदार और नैतिक जीवन जीने की शिक्षा देता है।

जियो और जीने दो संदेश:
भगवान महावीर का प्रसिद्ध संदेश जियो और जीने दो आज भी उतना ही सार्थक है जितना उनके समय में था। यह विचार बताता है कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक राष्ट्र को शांति, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। यदि विश्व समुदाय इस सिद्धांत को अपनाए, तो संघर्ष की जगह सहयोग और मानवीय सह-अस्तित्व का वातावरण बन सकता है।
अतः, यदि मानव समाज महावीर स्वामी के इन सिद्धांतों अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह और सत्य को अपने जीवन में अपनाए, तोआज विश्व युद्ध की स्थिति को टालकर एक शांतिपूर्ण, सौहार्दपूर्ण और संतुलित विश्व और समाज का निर्माण संभव है।

महावीर जन्मकल्याणक का यह पावन अवसर हमें यह स्मरण कराता है कि उनके संदेश को केवल स्मरण करने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे अपने जीवन और आचरण में भी उतारा जाए। यदि व्यक्ति, और समाज राष्ट्र अहिंसा, सहिष्णुता और करुणा के मार्ग पर चलें, तो निश्चित ही एक प्रेम और विश्वास का वातावरण सृजन किया जा सकता है । इस प्रकार भगवान महावीर का संदेश किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए एक सार्वभौमिक मार्गदर्शन है। आज के अशांत विश्व में उनके विचार हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि शांति, करुणा और सह-अस्तित्व के मार्ग पर चलकर ही मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल बनाया जा सकता है।

सर्व जीव दयालुं तं शान्तमूर्तिं निरामयम्। लोक कल्याण कर्तारं वन्दे वीरं महाप्रभुम्

( लेखक तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी,मुरादाबाद में कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में सीनियर फैकल्टी एवम् जैनोलॉजी के मनीषी हैं )

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