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उत्तराखंड में मिलेट कौणी दुनिया का सबसे पुराना मिलेट है

27/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
प्रदेश में न सिर्फ खेती सिमट रही, बल्कि पारंपरिक फसलों पर भी संकट गहरा रहा है। पहाड़ से चार पारंपरिक फसलों की छह प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं।पहाड़ी ढ़लानों पर सीढ़ीदार खेतों की मेडों पर लहराती कौंणी की फसल बला की खूबसूरत लगती है। सियार की सुनहरी पूंछ सी खेतों के किनारे हिलती-डुलती रहती है। कौणी विश्व की प्राचीनतम फसलों में से एक है। चीन में तो नवपाषाण काल में भी इसके उपयोग के अवशेषमिलतेहैं।यह बाजारा की ही एक प्रजाति है। जिसे अंग्रेजी में फाॅक्सटेल मिलेट कहा जाता है। इसकी बाली को देखकर ही संभवतः इसे अंग्रेजी में यह नाम दिया गया हो। खेतों में जब यह पककर तैयार होती है तो किसी पूंछ की तरह कौंणी की पौध से लहराती रहती है।कौणी पोएसी परिवार का पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम सेतिरिया इटालिका है। इसको संस्कृत में कंगनी तो गुजराती में कांग नामों से जाना जाता है। यह भारत, रूस, चीन, अफ्रीका और अमेरिका आदि देशों में उगाया जाता है। विश्वभर में कौंणी की लगभग 100 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।कौंणी गर्म मौसम में उपजने वाली फसल है। इसलिये उत्तराखण्ड में इसकी खेती ज्यादातर धान के साथ ही की जाती है। इसको धान व झंगोरा के साथ खेतों में बोया जाता है। धान के खेतों के किनारे-किनारे कौणी और झंगोरा बोया जाता है। कोणी की जड़े काफी मजबूत और मिट्टी को बांधे रखती है इसलिये यह खेतों के किनारों को भी टूटने या मिटटी के बहने से रोकती है। इसकी कटाई सितम्बर-अक्टूबर में होती है।उतराखण्ड में इसको खीर व भात बनाकर खाया जाता है। कौणी की खीर और कौणी का खाजा-बुखणा किसी दौर में बहुत प्रचलित था। इसका खाजा कटाई के दौरान ही भूनकर तैयार किया जाता है। लेकिन विकास और आधुनिकता की दौड़ ने पहाड़ के रहवासियों ने इसको मुख्य खाने से किनारे कर लिया है।इसमें डाइबिटिज के रोगियों के लिये बहुत उपयुक्त माना जाता है। इस वजह से भी धीरे-धीरे बाजार में इसकी मांग बढ़ रही है। इसके बिस्कुट, लड्डू इडली-डोसा और मिठाइयां काफी पसंद की जा रही है। इसके अलावा ब्रेड, नूडल्स, चिप्स तथा बेबी फूड, बीयर, एल्कोहल तथा सिरका बनाने में भी प्रयुक्त किया जा रहा है।संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की सन् 1970 की रिपोर्ट तथा अन्य कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार कौंणी में क्रूड फाइबर, वसा, फाइवर, कार्बोहाईड्रेड के अलावा कुछ अमीनो अम्ल होने की वजह से आज विश्वभर में कई खाद्य उद्योगों में इसकी मांग हो रही है। सुगर के मरीजों के लिये यह वरदान जैसा है। इससे तमाम बिमारियों में होने वाली थकान से मुक्ति मिलती है। तंजानिया में तो एड्स रोगियों के बेहतर स्वास्थ्य के लिये कौंणी से बनाये गयेभोजन को परोसा जाता है।श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय द्वारा किये गये एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि कौंणी के सेवन से यह खून में ग्लूकोज की मात्रा 70 प्रतिशत तक कम कर देता है। संभवतः इसीलिये पारम्परिक घरेलू नुस्खों में इसको तमाम व्याधियों में सेवन की बात की जाती है।
कौणी में 9 प्रतिशत तक तेल की मात्रा भी पाई जाती है। विश्व के बहुत से देश इसी वजह से कौंणी को तिलहन के तौर पर भी उपयोग करते हैं। जिसकी वजह से विश्व के कई देशो में कौंणी से तेल का उत्पादन भी किया जाता है।
कौणी की पौष्टिकता और औषधीय उपयोगिता की वजह से विश्वभर में बेकरी उद्योग की पहली पसंद बनता जा रहा है। कौंणी से तैयार किये ब्रेड में अन्य अनाजों से तैयार किये ब्रेड से प्रोटीन की मात्रा 11.49 की अपेक्षा 12.67, वसा 6.53 की अपेक्षाकृत कम 4.70 तथा कुल मिनरल्स 1.06 की अपेक्षाकृत अधिक 1.43 तक पाये जाते हैं।संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन ने सन 2023 को मिलेट इयर मनाने की घोषणा की है। भारत सरकार के सुझाव पर यह कदम उठाया गया है। यूएन ने इसकी उपयोगिता, औषधीय गुणों और पौष्टिकता को देखते यह कदम उठायाहै।कितनी अजीब बात है कि पौष्टिकता और औषधीय गुणों के बावजूद कौंणी आज उत्तराखण्ड में विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुका है। विश्व और भारत के स्तर पर इसको लेकर किये जा रहे प्रयास कितने कारगर होंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है। कौणी समेत सभी मोटे अनाज पौष्टिकता से भरपूर हैं। कम लागत, कम पानी में कौणी तैयार हो जाती है। कौणी को किसी भी प्रकार के कीट, रोग नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। इनको पोषक तत्व अनाज मोटे अनाज की श्रेणी में रखते हैं। इनकी खेती बहुत ही लंबे समय से पर्वतीय अंचल उत्तराखंड, हिमाचल, और उत्तर भारतीय राज्य में होती है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक कृषि करने वाले किसान कई फसलों का उत्पादन करते आ रहे हैं. बावजूद इसके अब धीरे-धीरे किसानों ने भी आधुनिकता की इस दौड़ में खुद को पिछड़ता हुआ देख खेती किसानी के तरीकों में बदलाव किया है. किसान अधिक आय वाली फसलों पर जोर दे रहे हैं, जिसमें नकदी फसलें शामिल हैं. ऐसे में उत्तराखंड में पारंपरिक तरीके से की जाने वाली फसलों का उत्पादन कम होता जा रहा है. जिसे पौष्टिकता का खजाना माना जाता है और जिनका उत्पादन अब नाम मात्र ही हो रहा है. जबकि सरकार इसको बढ़ावा देने के लिए पुरजोर ढंग से लगी हुई है. उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के काश्तकारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए सरकार मिलेट पॉलिसी के तहत मोटा अनाज को बढ़ावा दे रही है. इसके लिए किसानों को मोटे अनाज उत्पादन के बीज और उर्वरक में 80 फीसदी अनुदान दे रही है. वहीं इसकी बुवाई को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को 4000 रुपये से 1500 प्रति हेक्टेयर धनराशि भी दे रही है जिससे कि किसान अधिक से अधिक मोटा अनाज उत्पादन कर सके. उत्तराखंड में कई धान की प्रजाति ऐसी हैं जिसे सिर्फ कम पानी यानी बरसार के पानी पर ही पैदा कर लेते हैं। उसे अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। उसे स्थानीय भाषा में उखड़ी चावल के नाम से जाना जाता है। एक अनाज है-चिंणा, इसकी पैदावार भी कहीं खो गई है। इसको भून कर बुखणा बनाया जाता था। स्थानीय भाषा में चिंणा के बीजों को भून कर उसे कूट कर भुने दाने को बुखणा कहा जाता है। इन भुने दानों को वर्ष भर रखा जा सकता है। और उसको चबाने में विशेष स्वाद आता है। ऐसी सारी परंपरायें लुप्त हो रही हैं। मई-जून में अगर कौणी की फसल को लगाया जाता है तो अगस्त-सितंबर माह तक यह तैयार हो जाती है. उन्होंने बताया  कि उत्तराखंड में बारिश आधारित खेती होती है, लेकिन फॉक्सटेल मिलेट के लिए न अधिक पानी की आवश्यकता होती है, न ही अधिक तापमान की आवश्यकता होती है. उन्होंने बताया  कि ऐसे में कौणी की खेती उत्तराखंड के किसानों के लिए उपयुक्त है. साथ ही बाजार में महंगे दामों पर यह बिकती भी है. कौणी या फॉक्सटेल मिलेट देखने में बिल्कुल लोमड़ी की पूंछ की तरह लगती है. यही कारण है कि इसे फॉक्सटेल के रूप में जाना जाता हैं. जानकारी हैं कि उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में फॉक्सटेल की खेती विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी है. ऐसे में अगर किसान फिर से शुरुआत कर फॉक्सटेल मिलेट की खेती करें तो यह फायदेमंद साबित हो सकती है, क्योंकि उत्तराखंड होने वाले कौणी की पैदावार में हाई वैल्यू पोषक तत्व  पाये जाते हैं.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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