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समय के अनुसार बदल रहा है भिटौली का स्वरूप

21/03/20
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड देवभूमि को लोक संस्कृति तथा लोक पर्वो के लिए जाना जाता है। उत्तराखंड में कई महत्वपूर्ण पर्व मनाये जाते है, इनमे से एक और लोक संस्कृति में आधारित, पवित्र त्यौहार भिटोली के रूप में मनाया जाता है यह त्यौहार, चैत के पूरे महीने में मनाया जाता हैं। उत्तराखण्ड राज्य में कुमाऊं.गढवाल मण्डल के पहाड़ी क्षेत्र अपनी रंगीली लोक परम्पराओं और त्यौहारों के लिये शताब्दियों से प्रसिद्ध हैं। यहाँ प्रचलित कई ऐसे तीज.त्यौहार हैं जो केवल उत्तराखण्ड में ही मनाये जाते है। वही इसे बचाए रखने का बीड़ा उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र और यहाँ पर रहने वाले पहाड़ी लोगों ने उठाया है। इन्होंने आज भी अपनी परंपरा और रीति- रिवाजों को जिन्दा रखा है।
उत्तराखण्ड की ऐसी ही एक विशिष्ट परम्परा है भिटौली। उत्तराखण्ड में चैत का पूरा महीना भिटोली के महीने के तौर पर मनाया जाता है। स्व० गोपाल बाबू गोस्वामी जी के इस गाने मे भिटोला महीना के बारे मे वर्णन है।
बाटी लागी बारात चेली, बैठ डोली में,
बाबु की लाडली चेली, बैठ डोली में
तेरो बाजू भिटोयी आला, बैठ डोली में
भिटौली का शाब्दिक अर्थ है, भेंट-मुलाकात करना। प्रत्येक विवाहित लड़की के मायके वाले भाई, माता-पिता या अन्य परिजन चैत्र के महीने में उसके ससुराल जाकर विवाहिता से मुलाकात करते हैं। इस अवसर पर वह अपनी लड़की के लिये घर में बने व्यंजन जैसे खजूर आटे-दूध-घी-चीनी का मिश्रण, खीर, मिठाई, फल तथा वस्त्रादि लेकर जाते हैं। शादी के बाद की पहली भिटौली कन्या को वैशाख के महीने में दी जाती है और उसके पश्चात हर वर्ष चैत्र मास में दी जाती है। लड़की चाहे कितने ही सम्पन्न परिवार में ब्याही गई हो उसे अपने मायके से आने वाली भिटौली का हर वर्ष बेसब्री से इन्तजार रहता है। इस वार्षिक सौगात में उपहार स्वरूप दी जाने वाली वस्तुओं के साथ ही उसके साथ जुड़ी कई अदृश्य शुभकामनाएं, आशीर्वाद और ढेर सारा प्यार-दुलार विवाहिता तक पहुंच जाता है। पहाड़ों पर चैत के महीने में एक चिड़िया घुई-घुई बोलती है। इसे घुघुती कहते हैं। घुघुती का उल्लेख पहाड़ी दंतकथाएं और लोक गीत में भी पाया जाता हैं। विवाहित बहनों को चैत का महिना आते ही अपने मायके से आने वाली भिटौली की सौगात का इंतजार रहने लगता है। इस इन्तजार को लोक गायकों ने लोक गीतों के माध्यम से भी व्यक्त किया है।
न बासा घुघुती चैत की, याद ऐ जांछी मिकें मैत की।
भिटौली प्रदेश की लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसके साथ कई दंतकथाएं और लोक गीत भी जुड़े हुए हैं। पहाड़ में चैत्र माह में यह लोकगीत काफी प्रचलित है। वहीं भै भुखो मैं सिती नाम की दंतकथा भी काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बहन अपने भाई के भिटौली लेकर आने के इंतजार में पहले बिना सोए उसका इंतजार करती रही। लेकिन जब देर से भाई पहुंचा, तब तक उसे नींद आ गई और वह गहरी नींद में सो गई। भाई को लगा कि बहन काम के बोझ से थक कर सोई है, उसे जगाकर नींद में खलल न डाला जाए। उसने भिटौली की सामग्री बहन के पास रखी। अगले दिन शनिवार होने की वजह से वह परंपरा के अनुसार बहन के घर रुक नहीं सकता था और आज की तरह के अन्य आवासीय प्रबंध नहीं थे, उसे रात्रि से पहले अपने गांव भी पहुंचना था, इसलिए उसने बहन को प्रणाम किया और घर लौट आया। बाद में जागने पर बहन को जब पता चला कि भाई भिटौली लेकर आया था। इतनी दूर से आने की वजह से वह भूखा भी होगा। मैं सोई रही और मैंने भाई को भूखे ही लौटा दिया। यह सोच.सोच कर वह इतनी दुखी हुई कि भै भूखो मैं सिती, यानी भाई भूखा रहा और मैं सोती रही, कहते हुए उसने प्राण ही त्याग दिए।
कहते हैं कि वह बहन अगले जन्म में वह घुघुती नाम की पक्षी बनी और हर वर्ष चैत्र माह में भै भूखो.मैं सिती की टोर लगाती सुनाई पड़ती है। पहाड़ में घुघुती पक्षी को विवाहिताओं के लिए मायके की याद दिलाने वाला पक्षी भी माना जाता है। पर्वतीय लोक जीवन में कई अनूठी परम्पराएं पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही हैं। इन्हीं में इसी माह का एक खास रिवाज भिटौली जो प्रकृति में ऋतु परिवर्तन लाने वाले चैत्र माह में मनाई जाती है।
प्राचीन समय में पहाड़ के लोगों को अपनी पहाड़ जैसी जिदगी में खेती.बाड़ी, पशु पालन जैसे कामों से फुरसत नहीं मिल पाती थी। दूर गांव में ब्याही बहू.बेटी भी अपने ससुराल के कामों में इतनी व्यस्त रहती कि उन्हें भी मायके जाकर उनसे मुलाकात का समय नहीं मिल पाता था। तब आज की तरह न तो आने जाने की सुविधा थी और न बातचीत के तरीके थे, ऐसे अभावों के कारण यहां पूर्वजों ने इसका हल निकालते हुए वर्ष में एक बार आवश्यक रूप से अपनी बेटी से मिलने उसके घर जाने की प्रथा बनाई गई। इस शुभ कार्य के लिए चैत में ठंड विदा होने व गर्मी की शुरुआत होने और पहाड़ में इन दिनों काम कुछ कम रहने के कारण भिटौली को चुना गया।
लेकिन मौजूदा आधुनिक युग में भिटौली का स्वरूप नकदी के रूप में परिवर्तित हो रहा है। इसके कारण जहां भावनात्मक लगाव कम हो रहा हैए वहीं पीहर के हाथों से बनी सामाग्रियों के स्वाद से भी बेटियां वंचित हो रही हैं। संस्कृति को जन्म देना आसान है लेकिन इसे संरक्षित करना बहुत मुश्किल है। भावनात्मक लगाव के प्रतीक इस त्योहार की मान्यता है कि चैत को काला महीना कहते हैं। इस कारण नवविवाहिता को शादी के पहले वर्ष में चैत के पांच दिन ससुराल से बाहर रहने की रीति है। इसलिए शादी के बाद पहली भिटौली वैशाख में भेंट की जाती है। आधुनिक युग में भिटौली देने के तरीके बदल रहे होए लेकिन यह परंपरा आज भी जैसी की तैसी बनी है, जिसका केंद्र भाव प्रेमए स्त्री का मान ही है।

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